(प्रश्न) : वास्तव में ज्ञानी कौन है?
(उत्तर) : श्रीमद्भगवद्गीता में समत्व (स्थितप्रज्ञता) को ही ज्ञान कहा गया है। जो समत्व में स्थित है, जो सुख-दुःख, हानि-लाभ, यश-अपयश, मान-अपमान आदि में समभाव रखता है, और राग-द्वेष व अहंकार से परे है, वह ही ज्ञानी कहलाने का अधिकारी है।
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गीता के सातवें अध्याय के महात्म्य में एक कथा आती है कि पाटलिपुत्र में शंकुकर्ण नाम का एक ब्राह्मण था, जिसने वैश्य-वृत्ति का आश्रय लेकर बहुत धन कमाया। उसने न तो कभी पित्तरों का तर्पण किया और न देवताओं का पूजन। एक बार आधी रात के समय जब वह सो रहा था, तब एक सर्प ने कहीं से आकर उसकी बाँह में काट लिया। कुछ ही क्षणों में उसके प्राण पखेरु उड़ गये और वह प्रेत बना। बहुत समय के बाद वह सर्पयोनि में उत्पन्न हुआ। उसका चित्त धन की वासना में बँधा था। सांप की योनि से पीड़ित होकर उसने एक रात्रि को स्वप्न में अपने पुत्रों के समक्ष अपना मनोभाव बताया। उसके पुत्रों ने सवेरे उठकर बड़े विस्मय के साथ एक-दूसरे से स्वप्न की बातें कही। मंझला पुत्र कुदाल हाथ में लिए घर से निकला और जहाँ उसके पिता सर्पयोनि धारण करके रहते थे, उस स्थान पर गया, और लोभबुद्धि से बाँबी को खोदना आरम्भ किया। तब उस बाँबी से बड़ा भयानक सांप प्रकट हुआ और बोला — ‘ओ मूढ़ ! तू कौन है? किसलिए आया है? यह बिल क्यों खोद रहा है? किसने तुझे भेजा है? ये सारी बातें मेरे सामने बता।’ पुत्रः “मैं आपका पुत्र हूँ। मेरा नाम शिव है। मैं रात्रि में देखे हुए स्वप्न से विस्मित होकर यहाँ का सुवर्ण लेने के कौतूहल से आया हूँ।” पुत्र की यह वाणी सुनकर वह सांप हँसता हुआ उच्च स्वर से इस प्रकार स्पष्ट वचन बोलाः “यदि तू मेरा पुत्र है तो मुझे शीघ्र ही बन्धन से मुक्त कर। मैं अपने पूर्वजन्म के गाड़े हुए धन के ही लिए सर्पयोनि में उत्पन्न हुआ हूँ।” पुत्रः “पिता जी! आपकी मुक्ति कैसे होगी? इसका उपाय मुझे बताईये, क्योंकि मैं इस रात में सब लोगों को छोड़कर आपके पास आया हूँ।” पिताः “बेटा ! गीता के अमृतमय सप्तम अध्याय को छोड़कर मुझे मुक्त करने में तीर्थ, दान, तप और यज्ञ भी सर्वथा समर्थ नहीं हैं। केवल गीता का सातवाँ अध्याय ही प्राणियों के जरा मृत्यु आदि दुःखों को दूर करने वाला है। पुत्र ! मेरे श्राद्ध के दिन गीता के सप्तम अध्याय का पाठ करने वाले ब्राह्मण को श्रद्धापूर्वक भोजन कराओ। इससे निःसन्देह मेरी मुक्ति हो जायेगी। वत्स ! अपनी शक्ति के अनुसार पूर्ण श्रद्धा के साथ निर्व्यसी और वेदविद्या में प्रवीण अन्य ब्राह्मणों को भी भोजन कराना।” सर्पयोनि में पड़े हुए पिता के ये वचन सुनकर सभी पुत्रों ने उसकी आज्ञानुसार तथा उससे भी अधिक किया। तब शंकुकर्ण ने अपने सर्पशरीर को त्यागकर दिव्य देह धारण किया और सारा धन पुत्रों के अधीन कर दिया। पिता ने करोड़ों की संख्या में जो धन उनमें बाँट दिया था, उससे वे पुत्र बहुत प्रसन्न हुए। उनकी बुद्धि धर्म में लगी हुई थी, इसलिए उन्होंने बावली, कुआँ, पोखरा, यज्ञ तथा देवमंदिर के लिए उस धन का उपयोग किया और अन्नशाला भी बनवायी। तत्पश्चात सातवें अध्याय का सदा जप करते हुए उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया।
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गीता के सातवें अध्याय में भगवान ने अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी चार प्रकार के भक्त बताए हैं, जिनमें से ज्ञानी भक्त को सर्वश्रेष्ठ बताया है।
“चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जु।
आर्तो जिज्ञासुरर्थाथीं ज्ञानी च भरतर्षभ॥७:१६॥”
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥७:१७॥”
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आज और कल गीता के सातवें अध्याय का गहराई से स्वाध्याय कर भगवान वासुदेव का ध्यान कीजिये। अब तक जो मैंने लिखा है उससे अधिक लिखने में असमर्थ हूँ। बहुत अधिक भाव-विह्वल हो गया हूँ।
आपको मंगलमय शुभ कामनाएँ।
कृपा शंकर
८ अगस्त २०२६
वास्तव में ज्ञानी कौन है_कृपा शंकर
















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