विचार संजीवनी
असत संसार
सत्य की तरह
विचार करें, अभी जितने शरीर आदि दीखते हैं, ये सौ वर्ष पहले थे क्या ? और सौ वर्ष बाद रहेंगे क्या ? ये पहले भी नहीं थे और अंत मे भी नहीं रहेंगे; अतः ये बीच में भी नहीं नहीं हैं। परंतु परमात्मा सृष्टि के पैदा होने से पहले भी था, सृष्टि लीन होने के बाद भी रहेगा, अतः परमात्मा सृष्टि के समय भी ज्यों का त्यों परिपूर्ण है। जो पहले भी नहीं था, बाद में भी नहीं रहेगा, वह अभी भी नहीं है; और जो पहले भी था, बाद में भी रहेगा, वह अभी भी है।
अतः संसार मे जो ‘ है ‘-पना दीखता है, यह गलती है। परमात्मतत्व ही ‘ है ‘-रूप से दीखता है उस परमात्मतत्व की सत्यता से ही यह असत संसार मोह-(मूर्खता) के कारण सत्य की तरह दीखता है।
राम….राम….राम….राम….राम….राम
परम् श्रद्धये स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज, साधक संजीवनी 13/28 पृष्ठ 905















