हे पुराण पुरुष, आपका यह जीवन कृतार्थ और कृतकृत्य हो
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मुझे सब कुछ असहज सा लग रहा है। आने वाले दिनों में कुछ असामान्य सा होने वाला है। कुछ भी हो, एक बात तो निश्चित है कि इस सृष्टि में और इससे परे समान रूप से व्याप्त सब कुछ भगवान वासुदेव पुरुषोत्तम ही हैं, जिनकी अनुभूति मुझे कूटस्थ में निरंतर होती है। दूसरे शब्दों में उन्हें परमशिव भी कह सकते हैं।
“सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे। तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः॥”
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साधना के सर्वश्रेष्ठ प्रयास विफल हो रहे हैं। चारों ओर निराशा का अन्धकार व्याप्त है। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। अपनी सारी समस्याओं, आशंकाओं और स्वयं का अस्तित्व — पुरुषोत्तम को समर्पित है। वे ही सब कुछ हैं। कर्ता और भोक्ता भी वे ही हैं। दुःखी भी वे है और सुखी भी वे ही हैं। उनसे दूरी ही मेरी सब वेदना और पीड़ाओं का कारण हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ वे ही हैं।
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दो विपरीत ध्रुवों के प्रबल आकर्षणों के मध्य में होने वाली हलचल ही यह संसार है। इस से ऊपर उठना होगा, अन्यथा यूं ही पिसते रहेंगे। जो होना है वह तो हो कर ही रहेगा। मार्गदर्शन तो सबको प्राप्त है। यदि कोई यह कहे कि उसे कुछ पता नहीं था, तो वह झूठ बोल रहा है। वास्तव में संसार है ही नहीं, केवल पुरुषोत्तम हैं, जो यह आत्म-तत्व और समस्त सृष्टि बन गये हैं।
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हे पुराण पुरुष, आपका यह जीवन कृतार्थ और कृतकृत्य हो। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
२५ जुलाई २०२६
दो विपरीत ध्रुवों के प्रबल आकर्षणों के मध्य में होने वाली हलचल ही यह संसार है। एक बात तो निश्चित है कि इस सृष्टि में और इससे परे समान रूप से व्याप्त सब कुछ भगवान वासुदेव पुरुषोत्तम ही हैं _कृपा शंकर
















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