स्वयं से ही सम्पूर्ण अस्तित्व है। कोई भी या कुछ भी हमारे से पृथक नहीं है। परमात्मा ही हमारा अस्तित्व है। हम परमात्मा को कैसे प्राप्त हों_कृपा शंकरझुंझुनूं (राजस्थान)

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स्वयं से ही सम्पूर्ण अस्तित्व है। कोई भी या कुछ भी हमारे से पृथक नहीं है। परमात्मा ही हमारा अस्तित्व है। हम परमात्मा को कैसे प्राप्त हों?
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इस सृष्टि का नियम है कि हम अपनी भौतिक मृत्यु के समय जिस भी भाव का चिंतन करते हैं, अगले जन्म में हम उसी भाव को प्राप्त होते हैं। इसलिए हमें हर समय अनन्य भाव से परमात्मा का चिंतन करते रहना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण हमें मूर्धा में ओंकार के जप को कहते हैं। इस की विधि बड़ी सरल है। मेरुदण्ड को उन्नत और ठुड्डी को भूमि के समानांतर रखते हुए, सुख से अर्ध या पूर्ण खेचरीमुद्रा लगाकर बैठ जायें। ध्यान आज्ञाचक्र पर रखें। यदि सीधे बैठने में कोई असुविधा हो तो नितंबों के नीचे एक पतली सी गद्दी रख लें। मानसिक रूप से ओंकार का जप आरंभ कर दें। भगवान श्रीकृष्ण की परम कृपा से ध्यान स्वतः ही होने लगेगा। ध्यान में जो साधक “रां” बीज का जप करते हैं, उन्हें भी वही लाभ प्राप्त होता है, जो ॐ के जप से होता है।
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सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च |
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ||८:१२||
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् |
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ||८:१३|| (श्रीमद्भगवद्गीता)
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ध्यान — तेलधारा की भांति अखंड हो, यानी उसमें निरंतरता हो। ओंकार के ध्यान से देह के अभ्यंतर की अधोमुखी क्रियाएँ सुषुम्नापथ द्वारा ऊर्ध्वगामी हो जाती हैं। इसीलिए इसे “ओंकार” कहते हैं। यह ओंकार ही जब प्राण-तत्व को परमात्मा के चरणों में प्रणत करता है, तब इसे “प्रणव” कहते हैं। ओंकार का ध्यान ही चिदाकाश, दहराकाश, महाकाश, पराकाश और सूर्याकाश आदि से पार करा कर मह:, जन:, तप: और सत्यलोक से भी परे ले जाकर हमें ब्रह्ममय बना देता है। इसका कभी क्षय नहीं होता, अतः यह अक्षर या अक्षय है। यह साक्षात ब्रह्म साधना है जिसकी घोषणा सभी उपनिषद् और भगवद्गीता करती हैं। इसकी विधि बड़ी सरल है।
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सार की बात यह है कि अंत समय में जिसकी जैसी मति होती है वैसी ही उसकी गति होती है। महात्माओं ने बताया है कि इस देह में ग्यारह छिद्र हैं जिनसे जीवात्मा का मृत्यु के समय निकास होता है — दो आँख, दो कान, दो नाक, एक पायु, एक उपस्थ, एक नाभि, एक मुख और एक मूर्धा।
(१). यह मूर्धा वाला मार्ग अति सूक्ष्म है और पुण्यात्माओं के लिए ही है।
(२). नरकगामी जीव पायु यानि गुदामार्ग से बाहर निकलता है।
(३). कामुक व्यक्ति मुत्रेंद्रियों से निकलता है और निकृष्ट योनियों में जाता है|
(४). नाभि से निकलने वाला प्रेत बनता है|
(५). भोजन लोलूप व्यक्ति मुँह से निकलता है।
(६). गंध प्रेमी नाक से।
(७). संगीत प्रेमी कान से, और
(८). तपस्वी व्यक्ति आँख से निकलता है|
अंत समय में जहाँ जिसकी चेतना है वह उसी मार्ग से निकलता है और सब की अपनी अपनी गतियाँ हैं। अनेक बातें यहाँ नहीं लिख रहा, क्योंकि ये ज्ञान की बातें ऋषि याज्ञवल्क्य और राजा जनक के संवादों में मिल जायेंगी|
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जो ब्राह्मण संकल्प कर के और दक्षिणा लेकर भी यज्ञादि अनुष्ठान विधिपूर्वक नहीं करते/कराते वे ब्रह्मराक्षस बनते हैं| मद्य, मांस और परस्त्री का भोग करने वाला ब्राह्मण ब्रह्मपिशाच बनता है| इस तरह की कर्मों के अनुसार अनेक गतियाँ हैं| कर्मों का फल सभी को मिलता है, कोई इससे बच नहीं सकता|
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सबसे बुद्धिमानी का कार्य है परमात्मा से परम प्रेम, निरंतर स्मरण का अभ्यास और ध्यान। यह लेख कहीं लंबा न हो जाये इसलिए इसका यहीं समापन करता हूँ। आप सब पर परमात्मा की कृपा हो। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
झुंझुनूं (राजस्थान)
३० अप्रेल २०२६

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