जन्म ले लेना एक बिलकुल ही प्राकृतिक घटना है जिसका कोई बहुत बड़ा मूल्य नहीं है।
करोड़ोंकोमिलता_है जन्म। बस इतना ही मूल्य है कि जन्म से जीवन मिल सकता है। लेकिन करोड़ों में किसी एक को जीवन मिलता है। हम सब लोग जीवित नहीं हैं। हम सब लोग मरे हुए जीते हैं और एक दिन मरे हुए ही मर जाते हैं। अर्थात् हम सब लोग बेहोशी में जीते हैं और बेहोशी में ही मर जाते हैं। जन्म और मरण के बीच जो फासला है–उसे ही हम जीवन समझ बैठे हैं।
जब तक हम स्वयं को नहीं जानते, हमारा सारा जानना, हमारा सारा पाना क्या अर्थ रखता है ? यह प्रश्न पैदा हो जाये तो हमारे जीवन में धर्म की शुरुआत हो जाती है। धार्मिक व्यक्ति स्वर्ग-नर्क की बात नहीं करता। ईश्वर के विषय में चर्चा नहीं करता। शास्त्र-पुराण के विवरण नहीं देता। इन सब बातों से उसका कोई प्रयोजन नहीं है। उसके सामने एक ही प्रश्न और एक ही जिज्ञासा रहती है और वह यह कि "मैं कौन हूँ ? मैं क्यों हूँ ? मेरा अस्तित्व है, मगर किस लिए ? यदि मैं न होता, तो हर्ज़ क्या था ? और अगर हूँ तो प्रयोजन क्या है ?"
धार्मिक व्यक्ति यही जानना चाहता है कि मेरे होने की आवश्यकता क्या है ? मैं क्यों हूँ ? हम किसलिए साँस ले रहे हैं, किसलिए सोते हैं, किसलिए जागते हैं ? किसलिए रोते हैं, किसलिए हाय-हाय करते हैं ? जीवन एक प्रश्न बनना चाहिए। जीवन एक जिज्ञासा बननी चाहिए। जीवन एक खोज और शोध का विषय होना चाहिए। जिसे हम जीवन समझते हैं, वह जीवन बिलकुल नहीं है। वह मरने से भी बदतर है। उसका जीवन से कोई सरोकार नहीं है। जीवन तो कुछ और ही है। यह लाइफ नहीं, लिविंग है। यह तो केवल रोजी-रोटी कमाना है, केवल आजीविका है।
'क्या यही है जीवन ?' दूसरों से यह प्रश्न पूछना सरल है क्योंकि एक बंधा-बंधाया उत्तर मिल जायेगा। मगर स्वयं से यह प्रश्न करना बड़ा कठिन है। क्योंकि यहाँ बंधे-बंधाये उत्तर नहीं मिलते। यहां प्रश्न पूछने का मतलब है--अर्थ और यहाँ प्रश्न पूछने का मतलब है--एक लंबे श्रम से गुजरना, एक लम्बी साधना से गुजरना।
कोई पंडित, शास्त्री, विद्वान या दार्शनिक यह कहता है कि शरीर का जीवन, जीवन नहीं है, तो संभव है कि वह व्यक्ति किसी पुस्तक से पढ़कर या गुरु से सुनकर यह कह रहा हो। अगर ऐसी बात है तो जीवन एक धोखा है, छलावा है, व्यर्थ है। कौन जानता है--आत्मा है या नहीं है ? स्वयं ही जानना पड़ेगा। दूसरे से सुनकर या पुस्तक से पढ़कर उत्तर पाने से काम नहीं चलेगा। कौन कहता है कि शरीर के साथ सब कुछ नष्ट हो जाता है? जो जानता है, वही कह सकता है। लेकिन उसके जानने की उपयोगिता दूसरे के लिए क्या है ? कोई कहता है--आत्मा है। बनी रहे आत्मा। हम भी कहते हैं--आत्मा है। मगर इससे आपका क्या लाभ ? शब्द कहा, आकाश में गूंजा और विलीन हो गया। हम वहीँ के वहीँ रह गए। हम शरीर ही रह गए। 'आत्मा' शब्द सुनकर आत्मा नहीं हो गए। यह संभव है मनुष्य उस शब्द को सुनकर याद कर ले। कोई प्रश्न करे तो कहने लगे-'-मैं आत्मा हूँ। मैं अमर हूँ।' मगर यह सब बकवास है। जो ऐसा कह रहा है, वह दुनियां को तो धोखा दे ही रहा है, अपने को भी धोखा दे रहा है।
आत्मा को स्वयं जानना पड़ेगा। परमात्मा को स्वयं जानना पड़ेगा। यह सब तभी संभव होगा, जब हमारे प्राणों में तीर की तरह धंस जायेगा यह प्रश्न। हमारा कण-कण पूछने लगेगा--"मैं कौन हूँ ? मैं किस लिए हूँ ?
बचपन, जवानी, बुढ़ापा–सब देखा। मगर सब बदल गया।
हमारेभीतरजोउन्हेंदेखनेवालाथा, वह नहीं बदला। उसी ने बचपन देखा, उसी ने युवावस्था देखी, उसी ने बुढ़ापा भी देखा। उसी ने सुख-दुःख, सफलता-असफलता देखी। उसी ने जन्म देखा, उसी ने मृत्यु भी देखी। मगर सब बदल जाता है, केवल वही एक नहीं बदलता–जो सब कुछ देखता रहता है, सब कुछ अनुभव करता रहता है, सबका साक्षी बना रहता है।
इसी सूत्र को जिसमें सारे मनके पिरोये होते हैं, योग-शास्त्र 'आत्मा' कहता है। केवल आत्मा 'सत्य' है।
जिस समय हम अपने को इन तमाम मनकों से हटा लेंगे, और आत्मा रूपी सूत्र से अपने को मुक्त कर लेंगे, जान लेंगे कि हम सूत्र हैं, हम आत्मा हैं, वही सतत साक्षीभाव हम ही हैं, वह 'चैतन्य' भी हम ही हैं--यह प्रतीति सघन अनुभव बन जाती है तब हम 'कैवल्य' को उपलब्ध् हो जाते हैं।
मात्र केवल आत्मा ही जानने और पाने योग्य है। हम उस 'एक' को खोकर सब कुछ गँवा बैठते हैं। सपनों को पकड़ते हैं और पकड़ भी नहीं पाते। रात सपने में देखा कि करोड़पति हो गए, मगर सवेरा होते ही देखते हैं कि मुट्ठी ख़ाली-की-ख़ाली है। इसी प्रकार जीवन में देखा कि हम यह हो गए हैं, हम वह हो गए हैं, लखपति हो गए, एम् एल ए बन गए, मंत्री बन गए, मगर मृत्यु के समय पता चलता है कि मुठ्ठी ख़ाली-की- ख़ाली है। सब सपना-सपना-सा लगता है। योग की दृष्टि में सपने का मतलब सिर्फ इतना ही है कि जहाँ-जहाँ परिवर्तन है, वहां-वहां 'सत्य' नहीं है।
वह 'सत्य' हमें फिर कहाँ मिलेगा ? कहाँ उसके दर्शन होंगे ?
उस एकमात्र 'सत्य' को खोजना होगा अपने भीतर। तभी द्रशाभाव से मिलेगी वह 'सूत्रबद्धता'। वह 'सातत्य' जो एक है, उसे ही कहा है--'कैवल्य'। उसी को जान लेना है, उसी को समझ लेना है। जिसका फल होगा हम देह रहते हुए भी और देह के मृत हो जाने पर भी उस एक का अनुभव करेंगे।
कैसे जान पाएंगे उस 'एक' को ? जानने की प्रक्रिया क्या है ?
जानने की प्रक्रिया है--सारे विकल्पों से शून्य हो जाना। विकल्प का अर्थ है--जिन-जिन वस्तुओं में विपरीतता है, वे सब विकल्प हैं, जैसे दुःख-सुख, शान्ति-अशान्ति, त्याग-आसक्ति, जैसे--घृणा-लगाव, सफलता- असफलता।
विकल्प का मतलब है--द्वन्द्व। यह जगत् द्वंद्वमय है। जहाँ हर चीज के दो विकल्प हों, दो पहलू हों। जिसने एक को चाहा, वह दूसरे में उलझेगा। बचने का कोई रास्ता नहीं है। सुख चाहते हैं तो दुःख उसका विपरीत है, वह झेलना पड़ेगा। शान्ति चाहते हैं तो अशान्ति उसके विपरीत है, उसे प्राप्त करना होगा। त्याग चाहते हैं तो आसक्ति के सागर में डूबना पड़ेगा। प्यार चाहते हैं तो घृणा सहनी होगी।
हम बच नहीं सकते दूसरे से। अगर बचने का कोई रास्ता है तो यही कि हम दोनों को छोड़ दें। दोनों को छोड़ना ही विकल्प-शून्यता है जिसका अर्थ है--जहाँ-जहाँ द्वन्द्व है, वहां-वहां चुनाव न करें। बस, चुनाव करना ही छोड़ दें। सुख की, शान्ति की, सफलता की, प्यार की। बस, अलग रहें दोनों से।
काफी कठिन यह समस्या दोनों से अलग रह पाने की। सब कुछ समझ में आ जाता है, मगर समस्या वहीं रहती है द्वन्द्व की। यदि हम मुक्ति चाहते हैं तो बन्धन में पड़ते रहेंगे। क्योंकि द्वन्द्व तो वहां भी है। विकल्प तो स्वयम् बन जाता है। जो शान्ति मांगता नहीं, अशान्ति भी मांगता नहीं, जो मुक्ति मांगता नहीं, बन्धन भी मांगता नहीं--वह व्यक्ति पूर्णरूप से शान्त हो जाता है। फिर उसी व्यक्ति के जीवन में 'उस एक' के पुष्प खिलते हैं और महकते हैं।
हमें संसार से कुछ नहीं माँगना है, न कुछ चाहना है और न कोई आशा-अपेक्षा ही रखना है। यही सही मायने में सन्यास है। सन्यास का मतलब गेरुआ वस्त्र पहन लेना नहीं है। सन्यास संसार के विपरीत नहीं है। जिन लोगों ने सन्यास को संसार के विपरीत समझा है, वे बराबर संसार में ही फंसे रहते हैं। उन्होंने संसार को सन्यास के विपरीत समझा है। यही समझना द्वन्द्व में पड़ना है। संसार को त्यागने वाले सन्यासियों ने संसार को मन में बसा रखा है। संसार छोड़ कर भागे तो क्या ? संसार को तो मन में बसा रखा है। हम संसार में बने रहें, कोई बात नहीं। मगर संसार हमारे मन में नहीं रहना चाहिए। वास्तव में सन्यास का अर्थ है--निर्द्वन्द्व हो जाना, विकल्प-शून्य हो जाना, चुनाव-रहित हो जाना। जो सच्चा सन्यासी होता है, वह हर परिस्थिति से अप्रभावित रहते हुए गुजर जाता है। उसके जीवन में जो घट जाता है, उसे वह अलिप्त भाव से ईश्वरेच्छा समझ कर स्वीकार कर लेता है। जो नहीं घटता, उसकी वह मांग नही करता। इसी एकमात्र भाव का नाम है 'सन्यास'। यदि हमने इस भाव को जीवन में उतार लिया तो हम भी वही सन्यासी हैं। वस्त्र बदलने, सिर मुड़ाने, दण्ड-कमण्डल हाथ में लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। यही बात उपनिषद का यह सूत्र कहता है--
अज्ञान ह्रदय ग्रन्थि निःशेष विलयस्तदा।
समाधिना$विकल्पेन यदा अद्वेता$त्मदर्शनम्।।
अर्थात्--जिसने समाधि या किसी और माध्यम से अज्ञान रूपी ग्रंथि का संपूर्ण रूप से प्रणाश कर् लिया है और सारे विकल्पों और द्वंद्वों को छोड़कर एक उस अद्वैत रूपी आत्मा का दर्शन कर लिया है, वही सच्चा सन्यासी है, साधक है।
















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