बांसुरी//भगवान श्रीकृष्ण जी की माया में बासुंरी सारे राज छुपा है ,जो इंसान उस रहस्यमय को समझ ता हैं ओह ज्ञान प्राप्त कर लेता है

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भगवान श्रीकृष्ण जी की माया में बासुंरी सारे राज छुपा है जो इंसान उसको समझ ता हैं ओह ज्ञान प्राप्त करलेता है

उनकी बांसुरी की धुन में इतनी शक्ति थी कि सबको आकर्षित कर लेती थी। और गुप्त लीला मय है, उनकी लीलाएं तो अनंत हैं, और बांसुरी तो जैसे उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम थी।

सारे लीला में परिवार दोस्त नाते बंधु व्यवसाय कर्म जुड़ा है
उनकी बांसुरी की धुन में इतनी शक्ति है कि वह सबको आकर्षित कर लेती है, और उनके प्रेम में डूबा देती है। यह माया ही है जो हमें उनके प्रति आकर्षित करती है, और उनकी लीलाओं में डूबने के लिए प्रेरित करती है।

श्रीकृष्ण की बांसुरी में सारे माया छुपे हुए हैं, और वह हमें उनके प्रेम में डूबने के लिए प्रेरित करती है। की लीला को समझना सबके बस की बात नहीं है। उनकी लीलाएं इतनी गूढ़ और रहस्यमय होती हैं कि उन्हें समझने के लिए एक विशेष दृष्टि और भाव की आवश्यकता होती है।

श्रीकृष्ण की लीलाएं तो अनंत हैं, और उन्हें समझने के लिए हमें अपने मन को शुद्ध और भावपूर्ण बनाना होता है। तभी हम उनकी लीलाओं का आनंद ले सकते हैं और उनके प्रेम को महसूस कर सकते हैं।
जो भगवान की लीला को समझ लेता है, वह सारे दुख, सुख, और शांति को पा लेता है। वह जीवन के उतार-चढ़ाव में भी शांत और स्थिर रहता है, क्योंकि वह जानता है कि सब कुछ भगवान की लीला है।

उसके लिए जीवन एक आनंदमय यात्रा बन जाता है, जहां वह हर पल को भगवान के साथ बिताता है। वह सारे बंधनों से मुक्त हो जाता है और आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह किसी को पूरा शांति नहीं देते, जहां शांति है वहां अशांति भी पैदा करते हैं। यह उनकी लीला है, जो हमें यह समझाती है कि जीवन में शांति और अशांति दोनों साथ-साथ चलते हैं।

यह हमें यह भी सिखाती है कि हमें शांति और अशांति दोनों को स्वीकार करना चाहिए, और जीवन के उतार-चढ़ाव में स्थिर रहना चाहिए।


गीता का चतुर्थ अध्याय “ज्ञान कर्म संन्यास योग” है । इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान, कर्म, और संन्यास के बारे में विस्तार से बताया है। उन्होंने कहा है कि ज्ञान ही सबसे बड़ा साधन है, और कर्म को ज्ञान के साथ करना चाहिए। इस अध्याय में भगवान ने अपने अवतार के बारे में भी बताया है, और कहा है कि वह समय-समय पर धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं।
द्वारिका के समुद्र में डूबने के बाद सिर्फ श्रीकृष्ण की बांसुरी ही ऊपर उठी थी। यह एक प्रतीक है कि भगवान की भक्ति और प्रेम कभी नहीं मरते, वे हमेशा अमर रहते हैं।

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