द्रुपद द्वारा अपमानित गुरु द्रोण की अन्तर्वेदना
जिस पर चढ़कर आया सगर्व विध्वस्त मनोरथ का रथ था,
थी आह्निक ज्योति समाप्त परम तम-आच्छादित दुर्गम पथ था।
विद्युत्घर घन मणिधर अहि सम फुफकार रहा था बार-बार,
वह अंधकार-विवरस्थ व्योम से कर विष-बुन्दों का प्रसार।
था द्वन्द्वापूरित हृदय व्यग्र विद्रोही बना दिखाता था,
वह आज नियामक के प्रश्नों पर प्रश्न उठाता जाता था।
दुर्भाग्य-लक्ष्य यह मेरा ही जीवन क्या तुम्हें बनाना था,
क्या तूल-खिलौने पर पावक का दाहकत्व दिखलाना था।
कण्टकित नीड़ आक्षेपों का क्यों बना दिया जीवन मेरा,
चल मरघट अभिलाषाओं का निर्मम कुण्ठाओं का घेरा।
इस व्रणीभूत जीवन को पीड़ाओं का बना बसेरा क्यों,
फिर छिन्न-भिन्न कर निर्मम! कण्टक-पथ पर उसे बिखेरा क्यों।
कुछ को प्रहार करने, कुछ को सहने के लिए बनाया है,
यह कैसी विषम व्यवस्था है, यह कैसी तेरी माया है।
षट् रस में से तूने केवल कटुरस क्यों मुझे पिलाया है,
मेरी प्रतिभा के कृषि-दल पर विष-बादल क्यों बरसाया है।
नवनीत-कल्प साधक उर से इस भाँति क्रूर खिलवाड़ किया,
क्यों कोमल कमल-दण्ड ऊपर आरोपित विकट पहाड़ किया।
रे विधि! मम क्रूर नियति-लेखन पर कँपा नहीं क्या कर तेरा,
क्या अयस, अशनि, पाषाण-सार निर्मित निष्ठुर अन्तर तेरा।
क्या पक्षाघात-ग्रस्त निष्क्रिय है तेरा संवेदना-पक्ष,
कोमलता मृत, स्पन्दन हृत हृत्-पिण्ड-शून्य तब जरठ वक्ष।
भावुक संवेदनशील हृदय दे क्रमशः जीवन-क्रम मोड़ा,
अति भोले सरल मेमने को वृक-व्याघ्र-वृन्द में क्यों छोड़ा।
दारिद्र्य दिया विद्वानों को मूर्खों को धन-भण्डार दिया,
अति तिरस्कार पुण्याशय को पापाशय को सत्कार दिया।
पद-मद-पायी-सम्मुख विद्वद्-वाणी को अर्थ-विहीन किया,
सिंहनी-समक्ष खड़ी हरिणी-सम कम्पित दीन मलीन किया।
गुण-युक्त विषद् पर तूलोपम हलकी कर दी विद्वद्-वाणी,
सौंपा गुरुत्व मद-मूर्च्छित को लोष्टवत् भले हो अज्ञानी।
यह अनौचित्य का दुर्विधान यह मनमौजीपन मनमानी,
रे क्रूर निरंकुश विधि नृशंस! प्रतिपद तूने की नादानी।
प्रज्ञा अद्यावधि मानवता को पन्थ दिखाती आयी हैं,
लेकिन सत्ता उसको अब तक ठोकरें लगाती आयी हैं।
सत्ता ने बुद्धिजीवियों को अपने अनुसार नचाया है,
वैभव द्वारा तन, मन, लेखन पर निज अधिकार जमाया है।
इस सत्ता ने विद्वत्ता से है मनमाना व्यवहार किया,
जब चाहा तब सत्कार दिया जब चाहा तब दुत्कार दिया।
लक्ष्मी-पुत्रों के हाथों सौंपी वाणी-पुत्रों की नकेल,
वे उन्हें नचाते भाँति-भाँति तू बैठ मुदित देखता खेल।
विमला के विमल सुपुत्रों को कमला के मलिन पुत्र छलते,
प्रतिभा तृणवत् ठुकराते हैं अगणित टेढ़ी चालें चलते।
इस सत्ता ने विद्वत्ता को सर्वथा क्रीत-दासी माना,
निज को गिरि से गुरुतर लेकिन उसको तृण से लघुतर जाना।
क्यों उसके पथ में कण्टक हो जो सुमन बिछाता आया हो,
क्यों उसके पथ में फूल कि जो कण्टक बिखराता आया हो।
दम्भी कुटिलों का पथ प्रशस्त कण्टकाकीर्ण पथ ज्ञानी का,
कब अन्त भला होगा तेरी इस रचना से मनमानी का।
यदि कठिन परीक्षा लेनी थी पाषाणों से मेरी धाता,
तो कुसुम-हृदय क्यों दिया मुझे बतलाओ निष्ठुर निर्माता।
शास्त्रोक्त आचरण अद्यावधि सम्पादित करता आया था,
सुख ही का वितरण किया किसी का अन्तस् नहीं दुखाया था।
अपराध यही क्या है मेरा जो गरल न कभी निचोड़ा है,
निज सहज वृत्ति में रहा न अपना अभिनिवेश सत् छोड़ा है।
अदृष्ट अबध्य शक्ति मेरी उष्णत्वहीन ठोकर खायी,
साम्राज्य-विधात्री क्षमता का अनुमान न वसुधा कर पायी।
है छला गया सारल्य और आहत मेरा विश्वास हुआ,
हैं कुचली गयी आस्थायें भारी उनका उपहास हुआ।
धन ने उपहास किया पद ने तृणवत् मुझको ठुकराया है,
निर्मम जग ने प्रतिपद मेरे पद पर कण्टक बिखराया है।
💥 द्रुपद द्वारा अपमानित गुरु द्रोण की अन्तर्वेदना –
भाग 2💥
आजीवन रहा तिरस्कृत मैं, मिल सकी न स्नेहिल मृदुल छाँव,
यह क्रूर ग्रहों का है प्रकोप या कुटिल नियति का क्रूर दाँव।
रे समय! बड़ा ही निर्दय तू अति तीक्ष्ण दन्त तेरे दुरन्त,
पेलव मरन्दयुत सुमनों की करता अकरुण चर्वणा हन्त।
दावाग्नि बनूं वन दहन करूं यह लक्ष्य न कभी बनाया था,
हुतभुक् बन हरूं प्रदूषण को यह ही स्वरूप अपनाया था।
सह लिया घोर दारिद्र्य किन्तु अर्जन पर नहीं विचार किया,
सम्पत्ति-भेक हित मम पौरुष-अहि ने न कभी फुंकार किया।
द्विज-सुलभ अहिंसा शान्ति क्षान्ति संतोष आदि को धन माना,
सत्पात्रों को उन्नत अलभ्य शिक्षण देने का व्रत ठाना।
‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ सूक्ति का हो समाज में सञ्चालन,
संरक्षित हो सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान प्राप्त सत्-संरक्षण।
युग के मूर्द्धन्य मान्य गुरुओं से दुर्लभ विद्यायें लेकर,
संकल्प लिया उनका वितरण मैं किया करूंगा जीवन भर।
इस भाँति आर्ष-अर्जन अलभ्य सम्पूर्ण देश में भर दूंगा,
हो लुप्त न ज्ञान-स्रोत निर्मल अक्षुण्ण देश में कर दूंगा।
मैंने विद्या को अर्जन का माध्यम न बनाना चाहा था,
उसके द्वारा मानवता की जयकार मनाना चाहा था।
आचरण-शुल्क निज विद्या का निर्धारित करना चाहा था,
पावन विचार का कोष उसी के द्वारा भरना चाहा था।
मेरी इच्छा थी विद्या का कोई अनुचित न प्रयोग करे,
परस्वत्व-हरण परपीड़न में उसका न कभी प्रयोग करे।
स्वाधीन और निर्द्वन्द्व वृत्तिमय जीवन यह कर सकता था,
स्वप्निल रेखाओं में मर्यादित दिव्य रङ्ग भर सकता था।
मैंने देखा विज्ञान-शक्ति द्वापर में बढ़ती जाती थी,
मानवता की पहचान, किन्तु मानव में मिटती जाती थी।
बढ़ते विज्ञान मध्य मानवता दिशा-हीन हो जाती है,
भौतिकता-भँवर मध्य सत् की प्रेरक प्रज्ञा खो जाती है।
सन्तुलन परम आवश्यक था, भूगोल सुरक्षित बना रहे,
भौतिकता के ही साथ-साथ आध्यात्मिकता की धार बहे।
तप-त्याग परम आवश्यक था एकान्त वरण आवश्यक था,
स्वाधीनमनन चिन्तन लेखन जीवन-यापन आवश्यक था।
अन्वेषक साधक सुधी अगर राजाओं का आश्रय लेंगे,
होगी बन्दी विद्या उनकी अन्वेषण विक्रय कर देंगे।
लिप्सा-वश शासन-तन्त्र करेगा मनमाना उनका प्रयोग,
लोलुप करते ही जायेंगे आविष्कारों का दुरुपयोग।
प्रज्ञा के पुत्र ऋतोपासक इस हेतु अकिञ्चन बनते हैं,
सत्ता-पुत्रों से दूर बैठ स्वाधन साधना करते हैं।
इस हेतु रत्न-गर्भा भू सम एकान्त-वास का वरण किया,
लेकिन पत्नी के अश्रु और धनिकों ने उसका हरण किया।
तब आया था पाञ्चाल देश में यही व्यवस्था करने को,
आया था नहीं राज्य-हित या कञ्चन से अञ्चल भरने को।
कहनी चाही थी बात यही सामने द्रुपद के खड़ा-खड़ा,
सुन सका न सारी बातों को वह नीच बीच में बरस पड़ा।
तृणवत् समझा अभिमानी ने जी भर मेरा अपमान किया,
जो भर पायेगा कभी नहीं वह गहरा घाव प्रदान किया।
तप-त्याग तितिक्षा शिक्षा की जग देता भले दुहाई है,
व्यवहार रूप में सत्ता ही सत्कार कमाती आई है।
जिस काल निकलती राजमार्ग से होकर भूप-सवारी है,
द्विज बरबस रोक दिया जाता जो कुश-गङ्गा-जल-धारी है।
पूजा जाता है भूप खड्ग से भीति-भाव भरने वाला,
सेवक-सा समझा जाता है द्विज स्वस्ति-पाठ करने वाला।
मछली को मछली खा जाती हो पाती कहीं पुकार नहीं,
सच है ओछे जग में निर्बल को जीने का अधिकार नहीं।
मृगराज बना अति हिस्र जन्तु विषधर की पूजा की जाती,
गन्ने कोल्हू में पिस जाते बकरों की बलि दे दी जाती।
जङ्गल-विधान के विकृत रूप क्या नगर नहीं दिखलाते हैं,
रह जाते खड़े कुटिल, सीधे तरु पर आरे चल जाते हैं।
तप-त्याग समन्वित ब्राह्म तेज जब तक उग्रता न लाता है,
बल-गर्वित सत्ता के समक्ष तिनके-सा समझा जाता है।
गुरुवर भृगुवर में इसी हेतु नृप के प्रति रोष-भाव उमड़ा,
टेटुवा अनय-रत भूपों का बढ़कर सबसे पहले पकड़ा।
वह नीच दुराशय यदि मेरे आशय को ठीक समझ पाता,
दुर्भाग्य देश का टल जाता इतिहास भी स्यात् बदल जाता।
परिवर्तन सक्षम साधक का कष्टों पर कष्ट उठाना यह,
सूचक भावी परिवर्तन का आहुति में अग्नि लगाना यह।
मानव-इच्छायें हटा, विधाता की इच्छा आ जाती है,
है होनहार बलवान और भावी न कभी टल पाती है।
यह चक्र नियन्ता का अपनी ही गति से चलने वाला है,
ऐसा आभास हो रहा था इतिहास बदलने वाला है।
मेरे जीवन में चिन्तन का आयाम बदलने वाला था,
मान्यता बदलने वाली थी परिणाम बदलने वाला था।।
💥 द्रुपद द्वारा अपमानित गुरु द्रोण की अन्तर्वेदना –
भाग 3 💥
कृप! वज्रपात उस दिन का वह नयनों से नहीं उतरता है,
अन्यायी अपने साथ हाय! लाखों को लेकर मरता है।
उस सजल जलद ने सुप्त शीत पौरुष को उष्ण बनाया था,
उस दैन्यापूरित क्रान्त हृदय में क्रान्ति-ज्वाल भड़काया था।
पर्जन्य सजल के विकल हृदय से निर्गत वह संहार-ज्वाल,
लख शान्त सुप्त पौरुष मेरा जग उठा बना फुंकरित व्याल।
वह सहमा सिकुड़ा दैन्य भाव प्रतिशोध बना उठ खड़ा हुआ,
द्रुत वर्धमान मारुति समान स्वत्वाभिमान जग बड़ा हुआ।
गुरुता-विहीन पद-दलित-दीन रज भले तिरस्कृत पड़ी रहे,
पर जो गुरुत्व में अनुपमेय वह भूपर क्यों अपमान सहे।
मैं हूँ वह निर्विष व्याल नहीं, जिसमें कराल विष-दन्त न हो,
मैं वह निरीह केसरी नहीं, जिसमें नख-दन्त दुरन्त न हो।
भैंसें मिल मथ डालें जिसको समझो मत मुझको तुच्छ ताल,
जो पूरी धरा डुबो डाले मैं हूँ ऐसा वारिधि विशाल।
है धनुर्वेद का ज्ञान गूढ़ आचार्य रूप अधिकारी हूँ,
जानता व्यूह-रचना भेदन की गूढ़ क्रियायें सारी हूँ।
आशीविष निभ नाराचों की फुङ्कारों से हुङ्कारों से,
भर जायेगा भूतल समस्त कोदण्डों की टङ्कारों से।
कर में कराल कोदण्ड देख कँपकर वृत्तान्त रह जाता है,
दुर्दान्त दलों का बल-पौरुष बनकर श्रम-जल बह जाता है।
पवमान प्रबल पौरुष मेरा तृणवत् व्यवधान उड़ा सकता,
नाराचों की नोंकों पर मैं साम्राज्य नवीन बना सकता।
प्रज्वलित दृगों में ज्वाल देख सागर उबाल खा जायेगा,
पाताल तलातल वितल सुतल अम्बर तक थर्रा जायेगा।
डगमग डोलेगी धरा क्षुब्ध उछलेगा योजन भर समुद्र,
कम्पित गिरिराज समाज सहित देखने लगेंगे चकित रुद्र।
वरुणास्त्र विकट वायव्य सिद्ध आग्नेय अमित दिव्यास्त्र सिद्ध,
सूक्ष्माति-सूक्ष्म संधान सिद्ध पल भर में हों लक्षार्थ विद्ध।
ब्रह्मास्त्र मुष्टि में मेरे है संहार-शक्ति जिसकी कराल,
अनुमान लगाते ही जिसका थर्रा जाता है महाकाल।
है जामदग्न्य द्वारा प्रदत्त अद्भुत अलभ्य आयुध अखण्ड,
मारक क्षमता जिनकी प्रचण्ड है साक्षात् जो कालदण्ड।
रण में अव्याहत गति मेरी तूफान पिछड़ता जायेगा,
जिस ओर उठेगा धनुष-बाण मैदान उजड़ता जायेगा।
युद्धोन्मत्त आरक्त-नयन प्रज्वलित वदन-पावक कराल,
अवलोक खड़ा रह जायेगा अनिमिष आवाक् हो महाकाल।
शर-वमित-वह्नि-ऊष्मा-समक्ष सविता तक शीतल पड़ जाता,
बाणों से विनतानन्दन का मन का भी वेग पिछड़ जाता।
घनघोर वृष्टि विशिखों की कर भर दूँगा जब मैं दिग्-दिगन्त,
दुर्लघ्य बनेगी युद्ध-भूमि दुर्लघ्य बनेंगे वैजयन्त।
शर-छिन्न कोटि कर अम्बर में खगवत् उड़ते दिखलायेंगे,
अरि-मुण्ड झुण्ड के झुण्ड कटे कन्दुक ज्यों गिरते जायेंगे।
विध्वस्त बाजि-खुर-क्षिप्त विकट रथ-नेमि-समुत्त्थित धरणी रज,
पांसुलित करेगी जल थल नभ दृग-श्रवण केश ध्वजिनी के ध्वज।
जब कार्मुक-कोटि-बद्ध मौर्वी का होगा कर्णों तक कर्षण,
तृणवत् अरि-दल जल जायेंगे जब होगा शर-स्फुलिंग वर्षण।
जब दीर्घकाय योद्धाओं के तन विद्ध करेंगे शराघात,
तब रक्त-धार बह निकलेगी ज्यों भूधर से गैरिक-प्रपात।
संग्राम-भूमि बन जायेगी दुर्लघ्य रक्त-सागर दुरन्त,
बुदबुद् ज्यों बहते परिलक्षित होंगे तब रथ हय-गय अनन्त।
आकर्ण-तनित शिञ्जिनी-मुक्त फुङ्करित चलेंगे विशिख-व्याल,
तत्काल दुष्ट-दल डस लेंगे पहुँचा देंगे यमपुर कराल।।
🔥 द्रुपद द्वारा अपमानित गुरु द्रोणाचार्य की अन्तर्वेदना भाग 4 🔥
संग्राम-भूमि बन जायेगी दुर्लघ्य रक्त-सागर दुरन्त,
बुदबुद् ज्यों बहते परिलक्षित होंगे तब रथ हय-गय अनन्त।
आकर्ण-तनित शिञ्जिनी-मुक्त फुङ्करित चलेंगे विशिख-व्याल,
तत्काल दुष्ट-दल डस लेंगे पहुँचा देंगे यमपुर कराल।
बाणों की सन-सन की लय पर अनुकूल प्राप्त स्वर-ताल-बन्ध,
नर्तन-रत परिलक्षित होंगे युद्धोन्मत्त शत-शत कबन्ध।
नर्तित रुण्डों पर कर्तित हय-गय मुण्ड गिरेंगे जब जाकर,
रणभूमि धन्य हो जायेगी बहु हयग्रीव गजमुख पाकर।
रक्ताभ दृगों की विकट वह्नि वाणोत्क्षेपण की तीव्र त्वरा,
आतङ्कित कर देगी सङ्गर थर्रा देगी सम्पूर्ण धरा।
कोदण्ड उठेगा जब मेरा तब शूर-शून्य होंगे निकेत,
शर के प्रवाह में बह जायेंगे रथी सारथी रथ समेत।
क्षिति-क्षिप्त पांसुलित लहू-लिप्त बहु मुण्ड दृष्टि में आयेंगे,
धावित घोटक टापों द्वारा रह-रहकर कुचले जायेंगे।
भट-वक्षों से क्षत-जन्य विकट शोणित-कुल्यायें फूटेंगी,
गोमायु-गृध्र-पंक्तियाँ पान करने आतुर हो टूटेंगी।
विचरण करता है गज जैसे निर्भय बन वनज समूहों में,
युद्धोत्साह पूरित प्रवेश होगा मेरा गज-व्यूहों में।
शित शत शर-संकुल सकल सृष्टि उल्कामय उद्भासित होगी,
दिश-विदिश विकल विचलित अधीर कल्पान्त-दशा ज्ञापित होगी।
बहु प्रास-महोर्मि-भाल-पूरित रण-सागर में अवगाहन कर,
निकलेंगे आशुग मेद-मौक्तिक रक्त-प्रवाल-जाल को भर।
बहु परशु परिघ भालों ढालों तलवारों से उद्भूत चमक,
लाञ्छित होगी युगपत् समग्र लख मम सारङ्ग प्रभूत चमक।
जाम्बूनद पुङ्खित विशिख विकट वह्नित उद्भासित कनक-वर्ण,
होंगे प्रतीत ज्योतिष-पथ में ज्यों उरग-भोग-भोगी सुपर्ण।
मेदार्द्र गात्र रुधिरावसिक्त शर-ताड़ित क्षत-युत भट शरीर।
ज्यों सांध्य-मेघ-अवलिप्त सानु-स्थित हों उच्छल जलधि-तीर।
बहु अग्नि-शिखोपम विशिख विकट धड़ से सिर भाग उड़ा देंगे,
रज-लिप्त लहू-संसिक्त कबन्धों के दल भू पर उछलेंगे।
लुण्ठित अनन्त भट अवनी पर रुधिरोक्षित क्षत-परिपूर्ण वदन,
परिलक्षित होंगे मर्म-विद्ध व्याकुल हो करते रुधिर-वमन।
वल्गूष्णीष कुण्डल-मण्डित खण्डित कञ्चन किरीट-धर सिर,
केयूर-युक्त कर्तित बाँहें धरती पर दीखेंगी फिर-फिर।
गर्वीले भूपों के सीसों के मुकुटों के मणि-माल विखर,
टपके महूख-से बिछे हुए दिखलाई देंगे अवनी पर।
पथराई आँखें विकृत वदन जिह्वा बाहर निकली होगी,
इस भाँति सहस्रों कटे सिरों से पूरित रणस्थली होगी।
लक्षाधिक प्राण हरण करते जो अस्त्र भयावह छूट-छूट,
भूपर गिरते देखे जायेंगे वहीं तड़ातड़ टूट-टूट।
वातोद्धूत द्रुम-दण्ड सदृश बहु बाण-बिद्ध योद्धा अधीर,
सांध्याभ्र-सदृश होंगे प्रतीत क्षत और क्षतज-संयुत शरीर।
लाक्षा-रस सम शोणित-बूँदें टपकेंगी टप-टप कर तन से,
होंगी प्रतीत ज्यों वीरवधूटी टपक रही हों किंशुक से।
वैश्वानर जो कल्पान्त कल्प दिग्दाही प्रोज्वल भासमान,
एतादृश शोणित-रूषित शित शस्त्रापूरित वह आसमान।
अत्यधिक भयङ्कर दीखेगा ज्यों ताण्डव-रत शिवजटा-जाल,
प्रसरित हो, आच्छादित कर मुख रक्ताभ उच्छलित मुण्ड-माल।
जब संहारक-पद-भार-धार स्थित प्रज्वलित ओज होगा,
चीलों कौवों भूखे स्यारों श्वानों का वृहद् भोज होगा।
शर-वैद्युताग्नि से दग्ध भटाङ्गों से मांसों को नोच-नोच,
खायेंगे सुख से स्यार श्वान निर्भय निज पञ्जों से दबोच।
क्रव्याद चतुष्पद-द्विज-दारित किंद्विज चञ्च्वाघातित अधीर,
शोणित-कर्दम संलिप्त क्षिप्त जर्जरीभूत व्याकृत शरीर।
दुर्मद दुर्वृत्त सत्तामद के इति-वृत्त तथा घोषणा-पत्र,
प्रतिभा-पीड़न के कुफल बने परिलक्षित होंगे यत्र-तत्र।
करने वाले रण-संधुक्षण इस अवसर पर पछतायेंगे,
अपने-अपने दुष्कर्मों के परिणाम पूर्णतया पायेंगे।
युग का समस्त अर्जन जलकर जब भस्मसात् हो जायेगा,
तब साधक सुधी-अवज्ञा का परिणाम समझ में आयेगा।
अब मृतकों की परिगणना में यम के भी नाकों दम होगा,
बस इतना ही कह सकता हूँ जो कुछ भी होगा कम होगा।
उत्तरदायी होगा शासन उत्तरदायी होगा समाज,
शीतल हुत्भुक को भड़काया जिसने आहुतियाँ डाल आज।
💥द्रुपद द्वारा अपमानित गुरु द्रोणाचार्य की अन्तर्वेदना भाग-5 💥
अब तक सहता ही आया था अब नहीं सहन कर पाऊँगा,
निज पौरुष-पारावार-मध्य दुष्टों को दौड़ डुबाऊँगा।
पौरुष-अहि-पालित यह जीवन क्यों भेकों की ललकार सुने,
वञ्चित बहार से खड़ा-खड़ा कब तक काँटों के हार चुने।
शीतल पड़ गये अनल-मुख को हवि-दान नहीं मिल पाता है,
पौरुष-उष्मा से हीन पुरुष को मान नहीं मिल पाता है।
लोलुप कुत्सित कर से किसने अधिकार माँग कर पाया है,
शार्दूल विकट को उसको विक्रम ने मृगराज बनाया है।
जैसा मैं समझे बैठा था जग उस प्रकार से कहो कहाँ,
देवता-अमृत सब कल्पित हैं बहती विष-धार कराल यहाँ।
है असुर सुरा विष काग और बगुलों की ओछी चाल यहाँ,
है भरामार इन सबकी ही वह विमल विवेक मराल कहाँ।
मैं समझ गया जग का रहस्य कैसे मुझको चलना होगा,
जग के इस टेढ़े साँचे में मुझको टेढ़ा ढलना होगा।
काँटे से काँटा निकल सका विष ही विष का प्रतिकार यहाँ,
सीधी अंगुली से निकल नहीं पाता घी किसी प्रकार यहाँ।
सीमायें सहन-शक्ति की भी निर्धारित मानव-जीवन में,
परिलक्षित है सामान्य व्याप्ति सिद्धान्त सत्य जड़-चेतन में।
चण्डाँशु-प्रहारित सागर का भी विस्तृत वक्ष उबल उठता,
घर्षण-ऊष्मा से उत्तेजित शीतल चन्दन भी जल उठता।
तृणवत् जिसने समझा मुझको तृणवत् ही उसे उड़ाऊँगा,
रज-मलिन राजकुल-पाँसुल को शर-धारा-मध्य बहाऊँगा।
वह मित्र नाम पर है कलंक वह मानवता पर है कलंक
वह नृप-कुल-पाँसन नृप कलंक विधि के प्रपञ्च का कुटिल अंक।
इस दुर्मद द्रुपद दुराशय को दुरितों का मजा चखा दूँगा,
अविलम्ब आज पाञ्चाल देश की ईंट से ईंट बजा दूँगा।
अब अशिव शिवा-रुत परिपूरित प्रासाद भयङ्कर बन होगा,
वीरान बनेगा नगर सुघर घर-घर में कौशिक-स्वन होगा।
यदि भारद्वाज का पुत्र और यदि परशुराम का शिष्य सही,
दुवृत्त द्रुपद के हाथों से बरबस छीनूँगा पूर्ण मही।
प्रज्वलनशील अति दुर्निवार जब रौद्र रूप उत्पन्न हुआ,
थम गया सञ्चरणशील पवन आतङ्कित शिशु-सा सन्न हुआ।
मैं बढ़ा धनुष पर बाण चढ़ा उन्मद पाञ्चाल डुबाने को,
उस क्षत्र-बन्धु अन्यायी को यमपुर की राह दिखाने को।
पर उन्हीं क्षणों में आप और कौख्य भीष्म का ध्यान हुआ,
शिज्जिनी शिथिल पद रुद्ध क्रोध उतरा इस ओर पयान हुआ।
उन विषम क्षणों में भी मैंने भरसक निज पर संयमन किया,
दाहक अपमान हलाहल पी दारुण रोषानल दमन किया।
सागर मर्यादा खोता तो संसृति सम्पूर्ण डुबोता है,
क्या निहित नियन्ता के उर में देखो आगे क्या होता है।।
- डॉ देवीसहाय पाण्डेय
(द्रोणोच्छ्वास महाकाव्य से )
















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