यह अपना घर नहीं है..
जैसे बालक मिट्टीका घर बनाकर खेलते हैं, ऐसे ही लोग अपना-अपना घर बनाकर खेल रहे हैं, राजी हो रहे हैं! यह नहीं सोचते कि यह घर कितने दिन रहनेवाला है? हमारा इसमें कितने दिन रहना होगा ? रह सकोगे नहीं! यह याद ही नहीं कि हम किस घरके हैं।
जैसे मुसाफिर रातमें धर्मशालामें ठहरता है, आराम करता है, पर मनमें यह बात बनी रहती है कि यह हमारा घर नहीं है, ऐसे आपको भी याद रहना चाहिये कि यह अपना घर नहीं है, अपना स्थान नहीं है, अपना मुहल्ला नहीं है, अपना देश नहीं है। यहाँ चाहकर भी रह सकोगे नहीं, इसलिये आगे अपनी जगह बना लो। जहाँ जानेके बाद फिर लौटना नहीं पड़ता, वही अपना असली घर है। जबतक अपना घर नहीं आयेगा, तबतक लौटना ही पड़ेगा। कहीं भी ठहर सकोगे नहीं।
याद करो कि आप किस घरानेके हो। आप मामूली, साधारण नहीं हो, प्रत्युत साक्षात् परमात्माके अंश हो। वे परमात्मा अपने हैं। उस परमात्माको याद करो और ‘हे नाथ! हे मेरे नाथ!’ पुकारो। जब अपना सच्चा घर मौजूद है, तो फिर उसके रहते हम दुःख क्यों पायें ? उस घरका दरवाजा सबके लिये हर समय खुला है! अभी आप पराये लोकमें बैठे हो। जब पराये लोकमें भी आपका काम चलता है, तो फिर अपने लोकमें, अपने घरमें कितना आनन्द होगा। सदा के लिये निश्चिन्त, निर्भय हो जाओगे !
राम !………………..राम!!………………..राम !!!
परम् श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदास जी महाराज, नये रास्ते नयी दिशाएँ पृ०-४७
















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