बूँद की उत्पत्ति ही समुद्र से हुई है और समुद्र में मिलकर ही उसकी यात्रा की परिपूर्णता होगी।

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|| जीवन की परिपूर्णता ||

जीवन यात्रा के वास्तविक लक्ष्य का बोध होना ही मानव जीवन की वास्तविक उपलब्धि है। बूँद भले कहीं भी गिरे पर उसका अंतिम लक्ष्य समुद्र ही है और जन्म भले कहीं भी हो पर मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य परमात्मतत्व में एकाकार ही है। बूँद गिरती है, नष्ट होती है और उसके गिरने व नष्ट होने का यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि किसी बड़ी नदी का सहारा प्राप्त होकर वह समुद्र में समाहित न हो जाये।

बूँद की उत्पत्ति ही समुद्र से हुई है और समुद्र में मिलकर ही उसकी यात्रा की परिपूर्णता होगी। मानव जन्म का उद्देश्य और सार्थकता ही प्रभु चरणों की प्राप्ति है। जीवन यात्रा के पथ में मोह वश विलासिता की चकाचौंध में डूबकर मानव मन भटक जाता है और अपने गंतव्य को पाने के लिए बार-बार जन्म-मरण के चक्र में घूमता रहता है। कर्म के प्रति सजगता, पवित्रता और निष्कपटता ही जीवात्मा को परमात्मा के निकट पहुँचाती है।

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