“अति गर्व से हती लंका, अति मान से कौरव वंश”
- “अति गर्व से हती लंका”
रावण बहुत बड़ा विद्वान, बहुत शक्तिशाली था। सोने की लंका उसका राज्य था।
लेकिन अति गर्व — “मैं ही सबसे बड़ा हूँ, मुझे कोई हरा नहीं सकता”
परिणाम: इसी गर्व के कारण सीता हरण किया, और अंत में पूरी लंका जल गई, रावण का कुल नाश हो गया। - “अति मान से कौरव वंश”
दुर्योधन और कौरव “मान-सम्मान” के लिए पागल थे।
“हम राजा हैं, हमारी बात ही आखिरी बात है” — इस अति अहंकार, अति मान के कारण पांडवों को 5 गांव भी नहीं दिए।
परिणाम: कुरुक्षेत्र युद्ध में पूरे 100 कौरवों का वंश खत्म हो गया।
इससे क्या सीख मिलती है?
“अति” हर चीज़ बुरी होती है।
- गर्व करो — लेकिन अति गर्व करने से पतन निश्चित है।
- मान रखो — लेकिन अति मान के लिए अंधे हो जाओगे तो सर्वनाश होगा।
- नम्रता ही सबसे बड़ी शक्ति है — राम जीते, पांडव जीते क्योंकि वे नम्र थे।
रावण हो या कौरव — अति की तो मति मारी जाती है
“अहंकार पशु की प्रकृति है” — इस बात में बहुत गहराई है।
क्यों कहा गया है ऐसा?
- पशु में विवेक नहीं, सिर्फ वृत्ति होती है 🐂
भूख लगी तो खाना छीन लिया, डर लगा तो भाग गया, ताकत दिखी तो लड़ पड़ा।
पशु “मैं” के अलावा कुछ नहीं सोचता — यही अहंकार है। - इंसान और पशु में फर्क क्या?
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं: “आहार, निद्रा, भय, मैथुन — ये पशु और मनुष्य में समान हैं। धर्म ही एकमात्र अंतर है”।
धर्म = विवेक, नम्रता, दूसरों का ख्याल।
जब इंसान में अहंकार आ जाता है — वो विवेक खो देता है, फिर वो पशु जैसा ही बन जाता है। - रावण और दुर्योधन का उदाहरण
रावण महापंडित था, दुर्योधन राजकुमार था — फिर भी पशु बन गए।
क्यों? क्योंकि “मैं ही सबसे बड़ा” इस अहंकार ने विवेक मार दिया।
यही “अति गर्व से हती लंका” का असली मतलब है।
“तुलसी जे कीरति चहु, परिहरहु चारि विकार। छठौं काम अहंकार, मान अरु मत्सर विचार॥”
अर्थ: अगर कीर्ति चाहिए तो काम, अहंकार, मान और ईर्ष्या छोड़ दो।
अहंकार तो पशु का ही स्वभाव है — इंसान का गहना है नम्रता।
















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