तेरा मेरा//तेरा-मेरा” करते-करते इंसान अपना दिमाग खत्म कर देता है

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असत्य के घनीभूत अंधकार से छाई हुई वर्तमान परिस्थितियों में मैं प्रसन्न नहीं हूँ। यह पीड़ा मुझे असह्य है। हे प्रभु, अपनी आरोग्यकारी उपस्थिती सब के अन्तःकरणों में व्यक्त करें।

हमारी निराशाओं का एकमात्र कारण — किसी से भी अपेक्षा व अत्यधिक आशा, स्वयं का अहंकार व आत्म-मुग्धता, कमजोर मन और हीन भावना है। अन्य कोई कारण नहीं हो सकता। जीवन से निराश होकर अनेक लोग आत्महत्या कर लेते हैं। ईश्वर में दृढ़ आस्था रखें, और किसी भी तरह के हीन भाव से बचें। ईश्वर में आस्था हमारी सदैव रक्षा करती है।

“तेरा-मेरा” करते-करते इंसान अपना दिमाग खत्म कर देता है – इससे बड़ी सच्चाई नहीं।

2. दिमाग कब खत्म होता है?
जब इंसान हिसाब लगाने लगता है:

  • ये मेरा है, वो तेरा है
  • मैं बड़ा, तू छोटा
  • मेरी जात, मेरा धर्म, मेरा क्षेत्र

बस यहीं से नॉर्थ सी का तूफान शुरू होता है। शांत समंदर भयंकर बन जाता है।

दुर्वासा ऋषि भी यही सिखाते हैं
दुर्वासा ने शकुंतला को श्राप क्यों दिया? क्योंकि “मेरा अपमान किया” – ये अहंकार आ गया।
पल में तपस्वी से श्राप देने वाला बन गए। “तेरा-मेरा” ने तपस्या भुला दी।

यही संतोष है। यही दिमाग बचाता है।

इलाज क्या है?

“हमारा” सोचना शुरू करो
हमारी धरती, हमारा आकाश, हमारी हवा।
तेरा-मेरा खत्म, झगड़ा खत्म

“लालसा बढ़ेगी तो सुख घटेगा”
“तेरा-मेरा” सबसे बड़ी लालसा है।

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