कालचक्र// समय बराबर कभी किसी का यहाँ नहीं चलता है,कभी सूर्य द्युतिमान तो कभी दीपक भी जलता है।यदि सुख नहीं टिका तो दुख भी अधिक न टिक पायेगा_ डॉ देवी सहाय पाण्डेय अयोध्या

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महामहोपाध्याय वेदभाष्यकार डाॅ देवीसहाय पाण्डेय जी द्वारा लिखा कालजयी हिन्दी महाकाव्य द्रोणोच्छ्वास महाकाव्य से………

🌞 कालचक्र 🌞

समय बराबर कभी किसी का यहाँ नहीं चलता है,
कभी सूर्य द्युतिमान तो कभी दीपक भी जलता है।
यदि सुख नहीं टिका तो दुख भी अधिक न टिक पायेगा,
डूबा सूर्य सांध्य बेला का प्रातः उतरायेगा।

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डॉ देवी सहाय पाण्डेय अयोध्या

काल-चक्र-धुर में दुख-सुख का क्रम आता-जाता है,
संध्या का प्रातः, प्रातः का संध्या से नाता है।
नहीं टिक सकी यदि सावन की रिमझिम मन्द फुहारें,
नहीं टिकेंगी ज्येष्ठ मास की बहती तप्त लुबारें।

कौन अभी तक काल-करों के कौतुक जान सका है,
उसकी अप्रत्याशित गति-विधियों को पहचान सका है।
वही द्रोण जिनको कि द्रुपद ने रज-कण ज्यों ठुकराया,
उन्हें भीष्म ने सिर पर रखकर जीवन धन्य बनाया।

मिला विपुल धन, धरणि-धाम अभिलषित उच्च सुस्थान,
हय-गय स्यन्दन अनुचर अगणित और अतुल सम्मान।
उच्च स्तर-प्रस्तर निर्मित चित्रित विस्तृत आवास,
सुधा-लिप्त अति उच्च सुखद शुचि शोभित ज्यों कैलास।

अब वे द्रोण नहीं थे जिन पर दरिद्रता गुर्राती,
तिरस्कार हो आँख दिखाता सत्ता हो ठुकराती।
अब थे द्रोण कि जिनके घर में वैभव-नद बहता था,
मत्त गजों के दान-वारि से द्वार सिक्त रहता था।

भूप-मणि-मुकुट श्रद्धा-नत अब चरण चूमते रहते,
विश्रुत-विशद विरुद वैतालिक विस्मित स्वर में कहते।
राजकुमार बना विचरण करता था अश्वत्त्थामा,
विपुल दासियों द्वारा सेवित महल मध्य थी वामा।

द्रोण दिव्य सज्जित प्रकोष्ठ पर थे शोभित ज्यों भूप,
देख रहे थे धरा-गगन का ज्योत्सना-स्नात स्वरूप।
कृष्णा रजनी चन्द्र-स्तन से दुग्ध-धार बरसाती,
अवनि और अम्बर को थी वह क्षीर-समुद्र बनाती।

खड़ा हो गया नयनों के आगे वह दृश्य पुराना,
चुल्लू भर पय-हेतु पुत्र-पत्नी का अश्रु बहाना।
याचन हेतु विवश हो अपना द्वार-द्वार पर जाना, किन्तु साथ में लिए निराशा खाली हाथों आना।

पत्नी पिष्ट श्वेत तण्डुल का घोल बनाया जाना,
रुदित पुत्र को यत्नपूर्वक इस प्रकार बहलाना।
सारा दृश्य सोचकर दृग से बही अश्रु की धारा,
पोंछ उसे अंशुक से अपने मन में यही विचारा

होंगे कितने अश्वत्त्थामा अभी विवश बिलखाते,
होंगे कितने विवश द्रोण अब भी आँसू पी जाते।
कितनी शारद्वती विवश होंगी सुत को बहलातीं,
घर की दीन-दशा पर विह्वल विलख सिसक रह जातीं।

होंगे कितने धनिक अभी उन सबकी हँसी उड़ाते,
सुरा-सुन्दरी पर पानी-सा सञ्चित द्रव्य बहाते।
सञ्चित धन पर एक मात्र यह वैयक्तिक अधिकार,
अपनी ही लघु सीमा में व्यय का संकुचित विचार।

कुछ विशिष्ट पिण्डों में ही अपनत्व भाव कर पाना,
और शेष के प्रति शोषण का दृष्टिकोण अपनाना।
संग्रह और परिग्रह चालित जीवन में धन-सञ्चय,
पीढ़ी दर पीढ़ी तक स्थिर कर देने का निश्चय।

कर देता मानव-समाज में विषम विकार प्रसारण,
देश-देह में बन जाता है जो विष-व्रण का कारण।
इस प्रकार प्रिय पुष्ट राष्ट्र-तन घोर रुग्ण बन जाता,
पीड़ायें बढ़ने लग जातीं अमन-चैन छिन जाता।

स्वार्थ अहं मद-दम्भ कुपथ्यों को लख मन ललचाता,
लोभ अपहरण अनाचार उत्कोच अधिक मन भाता।
रुग्ण समाज-शरीर हो रहा हो जब ग्रस्त विकार,
उसे निरोग बना सकता तब सिद्ध दान-उपचार।

दानशीलता इस निसर्ग का शाश्वत् उपयोगी क्रम,
जो कहता विपरीत अनृत वह है निश्चित उसमें भ्रम।
ग्रह-नक्षत्र गगन-घन-धरणी सरित-सिन्धु वन-उपवन,
तृण से गिरि तक देखो तो वसुधा में सबका जीवन।।

         - डॉ देवीसहाय पाण्डेय 'दीप'
            (द्रोणोच्छ्वास महाकाव्य से )

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