हमारा कर्ताभाव ही आध्यात्म में हमारे पतन का एकमात्र कारण है _कृपा शंकर

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हमारा कर्ताभाव ही आध्यात्म में हमारे पतन का एकमात्र कारण है। परमात्मा को ही एकमात्र कर्ता बनायें, और निरंतर ब्राह्मी-स्थिति (कूटस्थ-चैतन्य/ब्रह्म-चैतन्य) में बने रहें। भगवान को अर्पित किये बिना कुछ भी खाना — “चोरी” और “पाप का भक्षण” है।
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वे कौन हैं ? — जो आपके पैरों से चल रहे हैं? आपके हाथों से काम कर रहे हैं? आपकी आँखों से देख रहे हैं? आपके हृदय में धड़क रहे हैं? आपके कानों से सुन रहे हैं? आपकी नासिकाओं से सांस ले रहे हैं? और आपके अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को चैतन्य बनाये हुए हैं। परमात्मा ही आपके प्राण हैं। उनका प्राण-तत्व ही आपकी चेतना से निकल गया तो आपकी देह मृत है। एकमात्र अस्तित्व उन्हीं का है। उनके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं है। अतः अभी से उन्हें जानने और पाने का प्रयास करें। वे निकटतम से भी अधिक निकट और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हैं।
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आप भोजन करते हैं, उसे कौन ग्रहण करता है और पचाता है? उसे भगवान ही ग्रहण करते हैं और भगवान ही पचाते हैं। इसका प्रमाण गीता में भगवान का यह कथन है —
“अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१५:१४॥”
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: “मैं (परमात्मा) वैश्वानर रूप (जठराग्नि या पाचनाग्नि) धारण करके सभी प्राणियों के शरीर में स्थित होकर, प्राण और अपान वायु के संयोग से चार प्रकार के भोजन को पचाता हूँ।”
चार प्रकार के भोजन (चतुर्विधं अन्न:) चुष्ट (चबाकर खाए जाने वाले): रोटी, फल, सब्जियाँ। भक्ष्य (चबाए बिना निगलने वाले): दूध, दही, तरल पदार्थ। लेह्य (चाटने वाले): घी, शहद, मक्खन। भोज्य (पीने वाले): पानी, जूस।
ब्रह्म ही सब कुछ है, और जीव का शरीर भी उसी की लीला है।
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आहार वो ही ग्रहण करें जिसे हम भगवान को अर्पित कर सकते हैं (यानि जिसका भोग/प्रसाद भगवान को लगा सकते हैं)। हम भोजन करते हैं, यह एक ब्रह्मकर्म है। इसका प्रमाण गीता में भगवान का बताया हुआ यह भोजन-मंत्र है —
“ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥४:२४॥”
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भगवान को अर्पित किए बिना कुछ भी खाना — “चोरी” और “पाप का भक्षण” है। हम भोजन करते हैं, यह एक यज्ञ है। इस यज्ञ से देवता तृप्त होते हैं। वे तृप्त हुए देवता ही हमारा कल्याण करते हैं। गीता में भगवान कहते हैं —
“देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥३:११॥”
अर्थात् — “तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतागण तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुये परम श्रेय को तुम प्राप्त होगे॥
“इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥३:१२॥”
अर्थात् — “यज्ञ द्वारा पोषित देवतागण तुम्हें इष्ट भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिये हुये भोगों को जो पुरुष उनको दिये बिना ही भोगता है वह निश्चय ही चोर है॥
“यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥३:१३॥”
अर्थात् — यज्ञ के अवशिष्ट अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो लोग केवल स्वयं के लिये ही पकाते हैं वे तो पापों को ही खाते हैं॥
“अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥३:१४॥”
अर्थात् — समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं अन्न की उत्पत्ति पर्जन्य से। पर्जन्य की उत्पत्ति यज्ञ से और यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होता है॥
यानि — सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है।
इससे आगे भगवान कहते हैं कि — जो मनुष्य इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों में रमण करनेवाला अघायु (पापमय जीवन बितानेवाला) मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है।
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भगवान ने आत्माराम यानि जो व्यक्ति सदैव आत्मा में रमण करता है, को जीवन मुक्त बताया है, और कहा है कि उसका कोई सांसारिक दायित्व नहीं है। वह जीवन मुक्त है। जब तक हम आत्मा में रमण नहीं करते तब तक हम सांसारिक दायित्वों से बंधे हैं।
“नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥३:१८॥”
अर्थात् — इस जगत् में उस पुरुष का कृत और अकृत से कोई प्रयोजन नहीं है और न वह किसी वस्तु के लिये भूतमात्र पर आश्रित होता है॥
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ॐ तत् सत्। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
कृपा शंकर
11मई 2026

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