श्रीकृष्ण की लीगसी में यही बताया गया है कि जब-जब धर्म की हानि होती है और पाप बढ़ता है, तब-तब भगवान अवतार लेते हैं और धर्म की स्थापना करते हैं। गीता में भी यही कहा गया है – “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥” इसका मतलब है कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं अपने रूप को प्रकट करता हूँ।
जादू बैंस (जरा नामक शिकारी) ने श्रीकृष्ण के पैर में बाण मार दिया था, जिससे उनकी मृत्यु हुई। लेकिन श्रीकृष्ण ने उसे मोक्ष दिया और अपने दिव्य रूप में उसे अपने पास बुलाया।
जरा नामक शिकारी को अपने पिछले जन्म का स्मरण हुआ, जब वो एक राजा था और उसने एक पेड़ पर बैठे हुए एक पक्षी को मार दिया था। उस पक्षी के माता-पिता ने उसे शाप दिया था कि अगले जन्म में तुम्हें भी एक बाण से मृत्यु होगी।
जदू बंस के लोगों ने एक बार गर्व और अहंकार में आकर कुछ साधुओं का अपमान किया, जिससे उन साधुओं ने उन्हें शाप दिया कि जदू बंस का अंत होगा और वे आपस में लड़कर मरेंगे
इसके बाद, जदू बंस के लोगों ने शराब पीना शुरू कर दिया और आपस में लड़ने लगे। बलराम जी ने समुद्र में समाधि ली, और श्रीकृष्ण ने अपने पैर के तलवे में बाण लगने से मृत्यु को प्राप्त किया। इसके बाद, जदू बंस का अंत हो गया।
जदू बंस के लोगों ने न सिर्फ साधुओं का अपमान किया, बल्कि उन्होंने कई बार नारी का सम्मान नहीं किया, जैसे कि राक्षसों के साथ मिलकर उन्होंने लोगों को परेशान किया। श्रीकृष्ण ने ऐसे लोगों को सबक सिखाने के लिए जदू बंस का अंत कर दिया।
श्रीकृष्ण की लीगसी में नारी का सम्मान बहुत महत्वपूर्ण है, और उन्होंने हमेशा नारी की रक्षा की।
जब-जब नारी के साथ गलत हुआ है, तब-तब समाज में बुराई और अधर्म बढ़ा है। जैसे कि द्रौपदी का अपमान हुआ, तो महाभारत का युद्ध हुआ। इसी तरह, सीता का अपहरण हुआ, तो रामायण का युद्ध हुआ।
नारी का सम्मान करना हमारी संस्कृति में बहुत महत्वपूर्ण है, और जब हम नारी का सम्मान नहीं करते, तो समाज में बुराई बढ़ती है। और ईश्वर सब कुछ समाप्त करते हैं
















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