विवेक केवल बौद्धिक चतुरता का नाम नहीं है। यह अन्तःकरण का परम् निर्मल भाव है,

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विवेकी जीवन ही श्रेष्ठ जीवन है

विवेक केवल बौद्धिक चतुरता का नाम नहीं है। यह अन्तःकरण का परम् निर्मल भाव है, जो प्रत्येक परिस्थिति में धर्म और अधर्म, हित और अहित, सत्य और असत्य, जड़ और चेतन, शाश्वत और क्षणभङ्गुरता का सही निर्णय और न्याय की दिव्य दृष्टि अंत:करण में प्रतिष्ठित करता है। जहाँ निर्णय शास्त्रसम्मत, परम् पुण्य स्वरूप, दया करुणामय युक्त, निष्पक्ष, मंगलकारी परम् कल्याणमय और लोक हितकारी हो, इस प्रकार सभी गुणों व सत्संग से अपने अंत:करण में विवेक की प्रतिष्ठा सुदृढ़ स्थापित हो जाती है। केवल तर्क करना विवेक नहीं है; सत्य के अनुरूप जीवन निर्वहन ही वास्तविक विवेक है।

मनुष्य प्रायः संसार से सद्व्यवहार की अपेक्षा तो करता है, किन्तु स्वयं अविद्यायुक्त परिणामी, जड़ शरीरादि, अतः करण के अहंकार, अभिमान में सम्पूर्ण सत्य सदाचार मर्यादा का पालन नहीं करता।

मनुष्य चाहता है कि कोई उसके साथ असत्य न बोले, दुर्व्यवहार न करे, किन्तु अवसर आने पर स्वयं असत्य अन्याय अधर्म का आश्रय ग्रहण कर लेता है। वह सदा सर्वत्र सम्मान चाहता है, परन्तु अन्य सभी दूसरे लोगों का सम्मान आदर, प्रेम करना भूल जाता है। यही मूर्खता जड़ता अविवेक का स्वरूप है। धर्म का सनातन सिद्धान्त अत्यन्त सरल सुखमय मंगलकारी है, जिस आचरण को हम अपने प्रति स्वीकार नहीं कर सकते, उसे किसी अन्य के प्रति भी न करें। यही नीति का सार है, यही धर्म का मर्म है और यही विवेक का चरम सौन्दर्य है।

सनातन ज्ञान विकास