दक्षिण भारतीय सिनेमा के ‘थलाइवा’ रजनीकांत कभी बहुत तंगहाली में थे। उन्होंने अपने जीवन में कुली और बस कंडक्टर के रूप में काम किया था, आज वे इंडस्ट्री के सबसे बड़े और महंगे सितारों में गिने जाते हैं।
बस कंडक्टर के रूप में काम करते हुए टिकट काटने और सीटी बजाने का उनका अनोखा स्टाइल यात्रियों के बीच काफी मशहूर हुआ।
अभिनय की शुरुआत
थिएटर का शौक: नौकरी के दौरान ही उन्हें नाटकों और अभिनय का शौक लगा। उनके दोस्त राज बहादुर ने उन्हें एक्टिंग में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और मद्रास फिल्म संस्थान (Madras Film Institute) में दाखिला लेने के लिए आर्थिक मदद की।
पहला ब्रेक: फिल्म निर्देशक के. बालाचंदर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपनी 1975 में आई तमिल फिल्म ‘अपूर्व रागंगल’ (Apoorva Raangangal) में एक छोटा सा रोल दिया। यही से उनका नाम ‘शिवाजीराव गायकवाड़’ से बदलकर ‘रजनीकांत’ रखा गया।
खलनायक से सुपरस्टार का सफर
नेगेटिव रोल: शुरुआत में उन्हें ज्यादातर फिल्मों में विलेन (खलनायक) या साइड रोल मिले, जिन्हें दर्शकों और समीक्षकों ने खूब सराहा।
नायक के रूप में पहचान: धीरे-धीरे वह मुख्य अभिनेता बने। 1978 में आई फिल्म ‘भैरवी’ से उन्हें मुख्य हीरो के तौर पर बड़ी सफलता मिली और निर्देशक भास्कर ने उन्हें ‘सुपरस्टार’ का दर्जा दिया।
ट्रेडमार्क स्टाइल: सिगरेट उछालना, चश्मा घुमाना और दमदार संवाद बोलने की उनकी खास शैली ने उन्हें युवाओं के बीच आइकन बना दिया। उन्होंने ‘बिल्ला’ (1979), ‘बाशा’ (1995), ‘शिवाजी: द बॉस’ (2007) जैसी कई ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं।
सम्मान और उपलब्धियां
भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण (2000), पद्म विभूषण (2016) और भारत सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार (2021) से सम्मानित किया जा चुका है।
दक्षिण भारत में लोग उन्हें सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि भगवान की तरह पूजते हैं।











