३ लाख के कैमरे से कैद हुई शादी, लेकिन मात्र ११०० रुपये में नीलाम हो गया एक पंडित का स्वाभिमान
शादी की पूरी तैयारी हो चुकी थी। शहर का सबसे महँगा होटल, शानदार कैटरिंग, ढोल-नगाड़े और स्वागत में झालमुड़ी से लेकर बनारसी पान तक, हर चीज़ का सबसे ‘प्रीमियम’ पैकेज बुक हो चुका था।
तभी किसी ने आकर लड़की के पिता से कहा, “सर, दूल्हे के स्वागत के लिए जो विंटेज मर्सडीज़ कार आनी है, उसका मालिक ४०,००० रुपये मांग रहा है। क्या करूँ?”
लड़की के पिता ने बिना एक पल सोचे कहा, “अरे बुक करो भाई, कहीं कोई और न ले जाए! मेरी इकलौती बेटी की शादी है, कोई कसर नहीं रहनी चाहिए।”
सब कुछ शानदार था। लाखों पानी की तरह बहाए जा रहे थे। लेकिन जब बात उस ‘पंडित जी’ की आई, जिसके मंत्रों से दो आत्माओं का गठबंधन होना था, तो उसी अमीर पिता का लहज़ा बदल गया।
वे फोन पर किसी से कह रहे थे— “क्या? राजू, एक दिन की शादी कराने के ११,००० रुपये चाहिए? ये पंडित पागल तो नहीं हो गया है? इन लोगों ने तो धर्म के नाम पर लूट मचा रखी है। उसे साफ बोल दो कि दक्षिणा तो श्रद्धा का विषय है, हम अपने हिसाब से दे देंगे।”
रात हुई। बारात आई। दूल्हे की एंट्री पर करीब २ लाख रुपये के तो सिर्फ पटाखे और स्काई-शॉट फोड़े गए। आगे-आगे ६०,००० रुपये में बुलाई गई नृत्यांगनाएं नाच रही थीं। हर पल को कैद करने के लिए ३ लाख रुपये से अधिक की बुकिंग वाले १०-१२ कैमरामैन और ड्रोन हवा में उड़ रहे थे। जयमाला के बाद स्टेज पर बारातियों को महंगे-महंगे गिफ्ट बांटे जा रहे थे। माहौल बड़ा ही खुशनुमा था।
इधर रात के ३ बज चुके थे। पंडित जी (जो शाम ६ बजे से भूखे-प्यासे बैठे थे) बार-बार हाथ जोड़कर यजमान से कह रहे थे, “जजमान, विवाह का शुभ मुहूर्त निकला जा रहा है, कृपया अब देरी मत कीजिए।”
लेकिन वहाँ किसे परवाह थी? कैमरामैन हर एंगल से फोटो लेने में व्यस्त थे।
तभी पता चला कि ‘दिल्ली वाले अंकल’ किसी बात पर मुँह फुलाए बैठे हैं और फोटो नहीं खिंचवाना चाहते। पूरा परिवार, लड़के वाले और लड़की वाले, अगले ३० मिनट तक उन ‘अंकल जी’ की मान-मनौव्वल करते रहे और अंततः उन्हें मनाकर स्टेज पर लाए।
रात के साढ़े तीन (३:३०) बजे दूल्हा मंडप में आया। मंडप में चार शानदार मखमली सोफे लगे थे— दो वर-वधु के लिए और दो कन्या पक्ष के माता-पिता के लिए।
पंडित जी के लिए कोई आसन नहीं था। नीचे ज़मीन पर बैठने में असुविधा हो रही थी, तो उन्होंने आहिस्ता से मैनेजर से पूछा, “भैया, क्या एक छोटी चौकी या कोई सोफा मिल जाएगा?”
मैनेजर ने रूखा सा जवाब दिया, “नहीं पंडित जी, सोफे तो चार ही हैं। आप नीचे ही बैठ जाइए, मैं एक चादर बिछवा देता हूँ।”
पंडित जी ने अपने स्वाभिमान का घूंट पिया और ज़मीन पर बिछी एक पतली सी चादर पर बैठ गए।
शादी शुरू ही हुई थी कि किसी ने आकर पंडित जी पर दबाव बनाया, “पंडित जी, आप बहुत लेट कर रहे हैं। ५ बजे से पहले हर हाल में लड़की विदा हो जानी चाहिए, सुबह हमें हॉल खाली करना है!”
पंडित जी परेशान हो गए कि जो वैदिक विवाह ३-४ घंटे का होता है, उसे १ घंटे में कैसे समेटें?
ऊपर से कैमरामैनों का अलग आतंक! जैसे ही पंडित जी ने दूल्हे को ‘विष्टर’ (कुशा का आसन) दिया, कैमरामैन चिल्लाया, “रुकिए पंडित जी! हाँ दूल्हे राजा, ऐसे ही हाथ रोके रखिए, थोड़ा पंडित जी की तरफ देखिए… स्माइल!” ५ मिनट तो सिर्फ एक फोटो के पोज़ में बर्बाद हो गए। गर्मी और दबाव से पंडित जी के माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं।
जैसे-तैसे संकल्प की बारी आई। पंडित जी ने कहा, “जजमान, संकल्प के लिए हाथ में १०१ रुपये रखिए।”
इतना सुनते ही लड़की के पिता भड़क गए— “पंडित जी, आप बार-बार पैसे-पैसे क्यों कर रहे हैं? आपको ये शोभा नहीं देता। आप खोलकर रेट मत बताइए, बस इतना कहिए कि द्रव्य रखिए।”
यह कहकर उन्होंने अपने भरे हुए बैग में हाथ डाला। उस बैग में ५०० और १०० के नोटों की गड्डियां रखी थीं। उन गड्डियों के नीचे से उन्होंने उँगलियों से कुरेद कर एक ‘सिक्का’ निकाला और बड़ी हिकारत से पंडित जी की ओर ऐसे बढ़ा दिया, जैसे वे कोई भिखारी हों!
बार-बार “जल्दी करो” के दबाव में पंडित जी को मजबूरी में कई महत्वपूर्ण वैदिक विधियों का लोप (छोड़ना) करना पड़ा और जैसे-तैसे ५ बजे तक विवाह संपन्न हुआ।
अंततः, विदाई का समय आया। यजमान (लड़की के पिता) ने अपने बैग से मात्र ११०० रुपये निकाले और पंडित जी के हाथ पर रख दिए।
पंडित जी की आँखों में अपमान के आंसू आ गए। उन्होंने कहा, “जजमान, ये क्या है? आप मुझे शाम ६ बजे से बुलाकर बैठाए हुए हैं, पूरी रात मैंने आपकी बेटी के मंगल के लिए जागरण किया है और आप दक्षिणा में ११०० रुपये दे रहे हैं?”
पिता ने बड़ी बेशर्मी से जवाब दिया, “पंडित जी, आप तो गज़ब करते हैं! दो घंटे मंत्र ही तो पढ़े हैं आपने, तो क्या इसके लिए आपको १०,००० रुपये दे दूँ? लेना है तो लीजिए, वरना ये भी छोड़िए।”
पंडित जी का हृदय छलनी हो गया। उन्होंने वे ११०० रुपये पकड़े और अपना झोला उठाकर भारी कदमों से मंडप से बाहर निकल गए।
ज़रा सोचिए… जिस ‘दिल्ली वाले अंकल’ ने सिर्फ एक फोटो के लिए मुँह फुलाया था, उसे मनाने के लिए पूरा परिवार आधे घंटे तक गिड़गिड़ाता रहा। लेकिन जिस ब्राह्मण ने पूरी रात जागकर अपनी नाभि की ऊर्जा से देवताओं का आवाहन किया, उस बेटी के सुखद भविष्य की नींव रखी… जब उसका स्वाभिमान आहत हुआ और वह रूठ कर जाने लगा, तो पीछे से किसी ने एक बार भी आवाज़ नहीं लगाई। किसी ने उसे नहीं मनाया!
निष्कर्ष और समाज के नाम एक कड़वा संदेश:
आज के इस खोखले समाज ने दिखावे को ही अपना ईश्वर मान लिया है।
लाखों रुपये का अनर्गल (व्यर्थ) खर्च देखिए:
४०,००० रुपये सिर्फ २ घंटे के लिए मर्सडीज़ कार पर!
२ लाख रुपये उस बारूद (पटाखों) पर जो कुछ मिनटों में धुआं होकर पर्यावरण को दूषित कर गया।
६०,००० रुपये उन नृत्यांगनाओं पर, जिनका इस पवित्र संस्कार से कोई लेना-देना नहीं।
३ लाख रुपये उन कैमरामैनों पर, जिनकी खींची गई एल्बम शायद साल में एक बार भी न खुले।
लेकिन वह ब्राह्मण? जो आपके गोत्र का उच्चारण करता है, जो अग्नि को साक्षी मानकर देवताओं को आपके आंगन में बुलाता है, जो वास्तव में दो शरीरों को एक पवित्र रिश्ते में बांधता है… उसके लिए बजट आते ही आपकी ‘श्रद्धा’ और ‘गरीबी’ जाग जाती है!
याद रखिए, विवाह ड्रोन कैमरों की चमक, मर्सडीज़ कार की शान या कैटरिंग के लजीज़ पकवानों से नहीं टिकते। विवाह टिकते हैं तो वेदी पर बैठे उस ब्राह्मण के मुख से निकले सच्चे आशीर्वाद और वैदिक मंत्रों की शक्ति से। यदि आपने उस मंत्र पढ़ने वाले को ही रुला दिया, उसका अपमान कर दिया, तो उस विवाह में देवता कभी अपना पूर्ण आशीर्वाद नहीं छोड़ते।
ब्राह्मण को आपका धन नहीं, उसका उचित सम्मान और उसके समय का मूल्य चाहिए। दिखावे के इस बाजार में अपनी संस्कृति और संस्कारों की नींव रखने वाले ब्राह्मणों को ‘मज़दूर’ समझने की भूल करना बंद कीजिए।















