श्रीमद्भगवद्गीता
कर्मों को करने में राग न हो और छोड़ने में द्वेष न हो—इतनी झंझट क्यों की जाये? कर्मों का सर्वथा ही त्याग क्यों न कर दिया जाये?—इस शंका को दूर करने के लिये भगवान् आगे का श्लोक कहते हैं।
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत:।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥१८।११॥
कारण कि देहधारी मनुष्य के द्वारा सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी है—ऐसा कहा जाता है।
‘कर्मफल त्याग’ का तात्पर्य है—कर्मफल की इच्छा का त्याग। कारण कि कर्मफल का त्याग हो ही नहीं सकता, जैसे—शरीर भी कर्मफल है, फिर उसका त्याग कैसे होगा? भोजन करने पर तृप्ति का त्याग कैसे होगा! खेती करने पर अन्न का त्याग कैसे होगा? अत: साधक को कर्मफल की इच्छा का त्याग करना है। फलेच्छा का त्याग करने से साधक सुखी-दु:खी नहीं होगा। इसलिये गीता में फलेच्छा के त्याग को ही फल का त्याग कहा गया है।
बाहर का त्याग वास्तव में त्याग नहीं है, प्रत्युत भीतर का त्याग ही त्याग है। अगर कोई बाहर से त्याग करके एकान्त में चला जाये तो भी संसार का बीज शरीर तो उसके साथ है ही। मरने वाले का अपने शरीर सहित सब वस्तुओं का त्याग हो जाता है, पर उससे मुक्ति नहीं होती। अत: हमारी कामना-ममता-आसक्ति ही बाँधने वाले हैं, संसार नहीं। इसलिये अपने लिये कुछ न करने से कर्मों से सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।
पारमार्थिक लाभ ही यथार्थ लाभ
याद रखो—लौकिक हानि की इच्छा मत करो, ऐसा भी कोई काम जान-बूझकर मत करो, जिससे लौकिक हानि होती हो, इसी प्रकार ऐसा काम भी मत करो, जिससे वैध लौकिक लाभ में बाधा पहुँचे; परंतु नित्य-निरन्तर सावधान रहो—सदा सजग रहो, कहीं क्षण भर के लिये भी लौकिक लाभ का लोभ या लौकिक हानि का सम्भावना जनित भय तुम्हें पारमार्थिक लाभ से उदासीन न बना दे और पारमार्थिक हानि को सहने की वृत्ति न पैदा कर दे।
जय श्रीकृष्ण 🙏















