अनावृष्ट्या विनङ्क्ष्यन्ति दुर्भिक्षकरपीडिताः । शीतवातातपप्रावृड् हिमैरन्योन्यतः प्रजाः ॥
इस श्लोक में कलियुग की दुःखपूर्ण स्थिति का वर्णन किया गया है कि वर्षा समय पर नहीं होगी, संसार मे भयंकर अकाल उत्पन्न होगा और लोग भूख, सरकारी करों के अत्याचार तथा आर्थिक कष्टों से पीड़ित होने लगेंगे।
कभी अत्यधिक शीत का प्रभाव होगा,तो कभी प्रचण्ड गर्मी पड़ेगी, कभी तेज वायु चलेगी, तो कभी असमय वर्षा और हिमपात जैसी प्राकृतिक विपत्तियाँ मानव जीवन को अस्थिर और दुःखमय बना देंगी। लोग केवल प्रकृति के प्रकोप से ही नहीं, बल्कि आपसी संघर्ष, स्वार्थ और विरोध के कारण भी एक-दूसरे को कष्ट पहुँचाएँगे।
यह श्लोक हमे यह संकेत देता है कि जब धर्म, संयम और सदाचार का ह्रास होता है, तब प्रकृति और समाज दोनों ही संतुलन खो देते हैं, और समस्त प्रजा अनेक प्रकार के दुःखों से घिर जाती है।
इस कष्ट का निवारण, भगवत भजन है।
अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति। सब तजि भजनु करौं दिन राती॥
जय श्री कृष्णा
















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