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विचार संजीवनी

.भगवान् केवल अपनापन देखते हैं..

भगवान् भक्तके अपनेपनको ही देखते हैं, गुणों और अवगुणोंको नहीं अर्थात् भगवान्‌को भक्तके दोष दीखते
ही नहीं, उनको तो केवल भक्तके साथ जो अपनापन है,वही दीखता है। कारण कि स्वरूपसे भक्त सदासे ही भगवान् का है। दोष आगन्तुक होनेसे आते-जाते रहते हैं और वह नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों ही रहता है। इसलिये भगवान् की दृष्टि सदा इस वास्तविकतापर ही जमी रहती है।

जैसे, कीचड़ आदिसे सना हुआ बच्चा जब माँके सामने आता है, तब माँकी दृष्टि केवल अपने बच्चेकी तरफ जाती है बच्चेके मैलेकी तरफ नहीं जाती। बच्चेकी दृष्टि भी मैलेकी तरफ नहीं जाती। माँ साफ करे या न करे, पर बच्चेकी दृष्टिमें तो मैला है ही नहीं, उसकी दृष्टिमें तो केवल माँ ही है। द्रौपदीके मनमें कितना द्वेष और क्रोध भरा हुआ था कि जब दुःशासनके खूनसे अपने केश धोऊँगी, तभी केशोंको बाँधूंगी ! परन्तु द्रौपदी जब भी भगवान् को पुकारती है, भगवान् चट आ जाते हैं; क्योंकि भगवान् के साथ द्रौपदीका गाढ़ अपनापन था।

राम !………………..राम!!………………..राम !!!

परम् श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदास जी महाराज, साधक-संजीवनी अध्याय १८ श्लोक सं ६६

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