एक साधारण व्यक्ति और एक योगी के छाया शरीर में भारी अंतर होता है। साधारण व्यक्ति का छाया शरीर प्राकृतिक होता है _मनीष चन्द्र पाण्डे अयोध्या उत्तरप्रदेश

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#छायापुरुषऔरछायापुरुष_सिद्धि।

   एक साधारण व्यक्ति और एक योगी के छाया शरीर में भारी अंतर होता है। साधारण व्यक्ति का छाया शरीर प्राकृतिक होता है। आरम्भ में योगी का भी छाया शरीर प्राकृतिक ही होता है किन्तु योगबल से सिद्ध हो जाने से योगी का छाया शरीर कुछ समय के लिए पार्थिव हो जाता है और योगी की इच्छानुसार कार्य भी करता है।
   आज से पचास साल् पहले काशी के हनुमान घाट पर एक स्वामीजी रहते थे। नाम् था--स्वामी परमानन्द सरस्वती। वह साठ वर्ष के एक पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति थे। उन्हें छाया शरीर की सिद्धि थी। वे एक ही समय में छाया शरीर द्वारा छः स्थानों में प्रकट होकर छः काम एक साथ करते थे जबकि उनका पार्थिव शरीर अपने स्थान पर रहता था। उनके निकट के लोग भी उनके इस रहस्य से अपरिचित थे।
   स्वामीजी बोले--इस सिद्धि से सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे समय की भारी बचत हो जाती है। मुझे नित्य पढ़ना है, पाठशाला में जाकर तीन घण्टे पढ़ाना है, दो घण्टे साधना का अभ्यास भी करना है, एक-दो घण्टे लोगों से मिलना-जुलना है, अपने भोजन आदि की व्यवस्था भी करनी है। सोचो, ज़रा इन सब कार्यों में मेरा कितना समय व्यतीत हो सकता है जबकि मैं अपने निवास पर ही रहकर एक ही समय में अपने सभी कार्य सम्पन्न कर लेता हूँ। अपने पार्थिव शरीर से कुछ आवश्यक काम ही लेता हूँ और वे है--नित्यक्रिया, साधना-अभ्यास और चिन्तन-मनन।
   जैसा कि बतलाया गया है कि छाया शरीर स्थूल शरीर का प्रतिरूप होता है और उसका निर्माण स्थूल शरीर के निर्माण के साथ ही गर्भ में  होता है। स्थूल शरीर के जन्म लेने के बाद चार-पांच वर्ष तक छाया शरीर कुछ समय के लिए कभी-कदा इधर-उधर भ्रमण करने के लिए निकल जाता है। ऐसी अवस्था में बालक अस्वस्थ हो जाता है, चिड़चिड़ा हो जाता है, ज्वर हो जाता है,  रोने अधिक लगता है, उसकी भूख कम हो जाती है। यही कारण है कि माता-पिता उसके गले में कुछ न कुछ ताबीज जैसा पहना देते हैं जिससे वह स्वस्थ बना रहे, निरोग बना रहे। भला वे क्या जानते हैं कि उनके बालक का छाया शरीर निकल कर बाहर चला गया है और उसीका परिणाम है ये सारी रोग-व्याधियां। शिशु या बालक पर पांच वर्ष तक बराबर ध्यान रखना चाहिए।
  अस्थिर चित्त वाले व्यक्ति का छाया शरीर निकल कर स्थूल शरीर के चारों ओर चक्कर लगाता रहता है और यही कारण है कि अस्थिर चित्त वाले व्यक्तियों को न के बराबर अपने कार्य में सफलता मिलती है। हमें भलीभांति समझ लेना चाहिए कि हम जिस वातावरण में रह रहे है, उसमें न जाने कितनी दुष्ट आत्माएं चक्कर लगाती रहती हैं। उनका एकमात्र भोजन है--मनुष्य की आयु। वे आत्माएं छाया शरीर में प्रवेश कर जाती हैं और उसके द्वारा व्यक्ति के सूक्ष्म शरीर से अपना तादात्म्य बना लेती हैं जिसके फलस्वरूप सूक्ष्म शरीर में तरह-तरह की रोग-व्याधि उत्पन्न हो जाती हैं और कालान्तर में वे ही रोग-व्याधि स्थूल शरीर में प्रकट होने लगती हैं।
   यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि यदि हमारे शरीर में कोई रोग उत्पन्न होता है तो समझ लीजिए कि वह रोग कम से कम चार-पांच साल पहले ही हमारे सूक्ष्म शरीर में जन्म ले चुका  होता है। लेकिन वह रोग या शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट तभी स्थूल शरीर में प्रकट होता है जब कोई अनिष्टकारक ग्रह हमारे लिए प्रतिकूल हो जाता है और वह रोग तब तक स्थूल शरीर में बना रहता है जब तक कि उस अनिष्टकारक ग्रह की प्रतिकूलता बनी रहती है। इसीलिए हमारे यहाँ ग्रहों को शान्त कराने की व्यवस्था की गयी है।
   कुछ रोग ऐसे भयानक होते हैं जो सभी प्रकार के उपचार करने के बाद भी नष्ट नहीं होते और मृत्युपर्यन्त बने रहते हैं। तो हमें यह समझ लेना चाहिए कि वह रोग हमारे पिछले जन्म का रोग है और प्रारब्ध बन कर आया है जिसे भोगना ही पड़ेगा। राजरोग इसी श्रेणी में आते हैं--जैसे--साँस का रोग, कुष्ठरोग, यक्ष्मा, केंसर आदि।  जो व्यक्ति जितना अधिक रोग-व्याधि के कारण कष्ट पाता है, उतनी ही उस व्यक्ति की आयु कम होती जाती है, लेकिन राजरोगी के लिए ऐसी बात नहीं है। कहने की आवश्यकता नहीं, उसी कम होती रहने वाली आयु की ये दुष्ट आत्माएं भक्षण करती हैं। एक योगी के लिए यह नियम लागू नहीं होता है। वह अपने पिछले जन्मों के पापों को रोग-व्याधि के प्रारब्ध के रूप में स्वीकार कर उनका भोग करता है और क्षय करता है ताकि उसे भोगने के लिए कोई और जन्म न लेना पड़े।

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