संसार को देखकर जिसकी तृष्णा शांत हो जाए, वही धन्य है।
आप अक्सर मानते हैं कि थोड़ी और सफलता, थोड़ा और धन, थोड़ा और सम्मान हमें पूर्ण कर देगा। परन्तु कहते हैं कि संसार की चेष्टाओं को ध्यानपूर्वक देखने वाला विरला व्यक्ति समझ जाता है कि बाहरी वस्तुएँ स्थायी तृप्ति नहीं दे सकतीं।
यही समझ धीरे-धीरे जीवित रहने की आसक्ति, भोगों की तृष्णा और निरन्तर कुछ पाने की बेचैनी को शांत कर देती है। खाली हुआ अंतस ही यथार्थ ज्ञान ग्रहण करता है। तब मन संसार से भागता नहीं, बल्कि उसके वास्तविक स्वरूप को पहचानकर भीतर की शांति में स्थित हो जाता है।
वैराग्य संसार छोड़ने से नहीं, संसार को सही रूप में देखने से उत्पन्न होता है।















