आत्मा बड़े-बड़े भाषणों से नहीं मिलता, तर्क-वितर्क से नहीं मिलता, बहुत-कुछ पढ़ने-सुनने से नहीं मिलता | जिसको यह वर लेता है वही इसे प्राप्त कर सकता है, उसके सामने आत्मा अपने स्वरूप को खोलकर रख देता है – विश्वप्रिय वेदानुरागी

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जगत् में चिन्ता, मिटी है उनकी
जो तेरे चरणों में आ गये हैं
वही हमेशा हरे भरे हैं
जो तेरे चरणों में आ गये हैं

ना पाया राजा, वजीर बन के
न पाया तुमको, फकीर बन के
उन्हीं को दर्शन हुए हैं तेरे
जो तेरे चरणों में आ गये हैं

ना पाया तुझको किसी ने बल से (1)
न पाया तुझको किसी ने छल से (1)
वही परमपद को पा गये हैं
जो तेरे चरणों में आ गये हैं

किसी ने जग में करी भलाई
किसी ने जग में करी बुराई
वही सुमार्ग पर चल पड़े हैं
जो तेरे चरणों में आ गये हैं

प्रभु जी विनती सुनो हमारी
बनाओ बिगड़ी दशा हमारी
निराश्रितों के आसरा तुम हो
जो तेरे चरणों में आ गये हैं

जगत् में चिन्ता, मिटी है उनकी
जो तेरे चरणों में आ गये हैं
वही हमेशा हरे भरे हैं
जो तेरे चरणों में आ गये हैं

ना पाया तुझको किसी ने बल से (1)
न पाया तुझको किसी ने छल से (1) :- तुलना कीजिये कठोपनिषद् 2/2/23
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌ ॥

आत्मा बड़े-बड़े भाषणों से नहीं मिलता, तर्क-वितर्क से नहीं मिलता, बहुत-कुछ पढ़ने-सुनने से नहीं मिलता | जिसको यह वर लेता है वही इसे प्राप्त कर सकता है, उसके सामने आत्मा अपने स्वरूप को खोलकर रख देता है | – सादर – विश्वप्रिय वेदानुरागी