गुप्त युग//गुप्त काल में ईश्वर और धर्म की अवधारणा में बड़े बदलाव आए, जहाँ यज्ञ की तुलना में ईश्वर भक्ति और मूर्तिपूजा को मुख्य स्थान मिला,जिसमें श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं, गोकुल-वृंदावन के प्रसंगों और गीता के उपदेशों का व्यापक वर्णन मिलता है।

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गुप्त काल (चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी) में ईश्वर और धर्म की अवधारणा में बड़े बदलाव आए, जहाँ यज्ञ की तुलना में ईश्वर भक्ति और मूर्तिपूजा को मुख्य स्थान मिला।
प्रमुख विशेषताएँ
वैष्णव और शैव धर्म का उदय: इस काल में विष्णु (वैष्णव मत) और शिव (शैव मत) प्रमुख देवताओं के रूप में उभरे तथा दोनों के बीच समन्वय देखा गया।
भगवत गीता का प्रभाव: ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत भक्ति, प्रेम और समर्पण (भक्ति भाव) को समाज में बहुत महत्व मिला।

शक्ति पंथ और देवियाँ: लक्ष्मी, पार्वती, दुर्गा और काली जैसी देवियों की पूजा शुरू हुई, जिससे शक्ति पंथ का विस्तार हुआ।
मंदिरों और मूर्तियों की स्थापना: जटिल यज्ञों का स्थान दैनिक उपासना और भव्य मंदिरों में देवी-देवताओं की मूर्तिपूजा ने ले लिया।

अन्य धर्मों को आश्रय: हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान के साथ-साथ बौद्ध और जैन धर्म का भी इस काल में विकास हुआ और उनकी सुंदर मूर्तियाँ बनाई गईं।
गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण: गुप्त काल में श्रीकृष्ण से जुड़े प्रसंगों को मूर्तिकला में गढ़ा गया। वाराणसी के भारत कला भवन में सुरक्षित गोवर्धन पर्वत उठाए हुए श्रीकृष्ण की पांचवीं शताब्दी की प्रस्तर प्रतिमा इस काल की उत्कृष्ट कला का प्रमाण है।
केशी वध: श्रीकृष्ण द्वारा घोड़े के रूप में आए राक्षस केशी के वध जैसे दृश्यों को टेराकोटा (पकी हुई मिट्टी) और पाषाण मूर्तियों में दर्शाया गया।


पुराणों का संकलन: गुप्त काल के दौरान ही अधिकांश प्रमुख पुराणों, विशेषकर श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण के मूल स्वरूप का विकास हुआ, जिसमें श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं, गोकुल-वृंदावन के प्रसंगों और गीता के उपदेशों का व्यापक वर्णन मिलता है।