अतिथि… या प्रतीक्षा?
“अतिथि” शब्द ही अपने भीतर एक सुंदर अर्थ समेटे हुए है—
जिसकी तिथि निश्चित न हो, वही अतिथि है।
हम जब किसी समारोह का आयोजन करते हैं, तो मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथियों को बड़े आदर और सम्मान के साथ आमंत्रित करते हैं। उनकी सहमति मिलती है, तो हम उनके नाम निमंत्रण-पत्र पर गौरव के साथ अंकित करते हैं।
लेकिन क्या उनकी व्यस्तताओं, दायित्वों और अनिश्चित समय-सारणी को देखते हुए यह अपेक्षा करना उचित है कि पूरा समारोह उनके आने तक प्रतीक्षा करता रहे?
हमारा विनम्र विचार है—अतिथि का सम्मान होना चाहिए, लेकिन समारोह की गरिमा को प्रतीक्षा में नहीं रखा जाना चाहिए।
कई बार एक अतिथि के विलंब से दर्जनों कलाकार, विद्यार्थी, अभिभावक और आमंत्रितजन प्रतीक्षा करते रहते हैं। सभागार का निर्धारित समय निकल जाता है, कार्यक्रम का क्रम बिगड़ता है और अंततः उस समय की भरपाई करने के लिए कार्यक्रम में कटौती करनी पड़ती है।
जो लोग समय निकालकर समय पर हमारे बीच आ चुके हैं, क्या उनका समय भी उतना ही मूल्यवान नहीं है?
इसलिए शायद अब हमें अपनी परंपरा में एक छोटा-सा परिवर्तन करना चाहिए।
निमंत्रण-पत्र पर मुख्य अतिथि अथवा विशिष्ट अतिथि का नाम अंकित नहीं किया जाए बल्कि, समारोह के दिन जो भी अतिथि, कलाकार, आमंत्रितजन निर्धारित समय पर उपस्थित हो जाएँ, उन्हीं की उपस्थिति को शुभ मानकर कार्यक्रम का शुभारंभ कर दिया जाए।
दीप प्रज्वलन के लिए किसी एक विशेष व्यक्ति की प्रतीक्षा न हो—
जो समय पर उपस्थित हैं, उन्हीं के कर-कमलों से दीप प्रज्वलित हो।
क्योंकि दीप किसी व्यक्ति की प्रतीक्षा का नहीं,
शुभारंभ का प्रतीक है।
और यदि मुख्य अथवा विशिष्ट अतिथि बाद में पधारते हैं, तो उनका स्वागत उसी गरिमा और आत्मीयता से किया जाए। यदि वे किसी कारणवश न आ सकें, तो भी कार्यक्रम अपनी गरिमा के साथ चलता रहे।
«“जो समय का मान रखे, उसका मान करो,
जो साथ खड़ा हो जाए, उसका सम्मान करो।
व्यक्ति बड़ा हो सकता है पद से,
पर समय से बड़ा कोई सम्मान नहीं।”»
हमारा उद्देश्य किसी मुख्य एवं विशिष्ट अतिथि की महत्ता कम करना नहीं है।
बल्कि अतिथि का सम्मान इतना गरिमापूर्ण हो कि उनके आने के लिए सैकड़ों लोगों के समय और सम्मान को प्रतीक्षा में न रखा जाए।
क्योंकि एक सफल समारोह वही है,
जहाँ अतिथियों का सम्मान भी हो,
समय का सम्मान भी हो,
और उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को यह महसूस हो कि उसकी उपस्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
मुख्य एवं विशिष्ट अतिथि आएँ तो समारोह की शोभा बढ़े,
पर अतिथि की प्रतीक्षा में समारोह की शोभा न घटे।
और आपके विचार नि:संदेह आप मुझे जरूर भेजिए आपके विचारों की प्रतीक्षा में आचार्य सत्यनारायण पाटोदिया ।















