रथ यात्रा // संसार में वही मनुष्य धन्य, पवित्र और विद्वान् है; वही यज्ञ, तप और गुणों से श्रेष्ठ है; वही वास्तविक ज्ञानी, दानी और सत्यवादी है, जिसके हृदय में भगवान् पुरुषोत्तम के प्रति भक्ति विद्यमान है_ मनीष चन्द्र पाण्डे अयोध्या उत्तरप्रदेश

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रथ यात्रा महोत्सव, तीनों रथ अपने गंतव्य स्थान की तरफ़ जाते हैं ….

पद्म पुराण के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की बहन ने एक बार नगर देखने की इच्छा जाहिर की थी। तब जगन्नाथ जी और बलभद्र अपनी बहन सुभद्रा को रथ पर बैठाकर नगर दिखाने निकल पड़े। इस दौरान वे मौसी के घर गुंडिचा भी गए और सात दिन ठहरे। तभी से यहां पर रथयात्रा निकालने की परंपरा है

,👉1- भगवान जगन्नाथ का रथ

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा के रथ नारियल की लकड़ी से बनाए जाते हैं. ये इतनी हल्की लकड़ियां होती हैं कि रथ को आसानी से खींचा जा सकता है.

इस रथ में 16 पहिए होते हैं, रथ की ऊंचाई साढ़े 13 मीटर तक होती है. रथ को ढंकने के लिए इसमें लगभग 1100 मीटर कपड़े का उपयोग होता है. रथ को बनाने में 832 लकड़ी के टुकड़ों का उपयोग किया जाता है.

भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है और यह अन्य रथों से आकार में बड़ा भी होता है.

गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदीघोष ये भगवान जग्गनाथ के रथ के नाम हैं. रथ के घोड़ों का नाम शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व है, जिनका रंग सफेद होता है. रथ के सारथी का नाम दारुक है.

भगवान जगन्नाथ रथ के रक्षक भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ हैं. रथ की ध्वजा यानी झंडा त्रिलोक्यवाहिनी कहलाता है. रथ को जिस रस्सी से खींचा जाता है, वह शंखचूड़ नाम से जानी जाती है.

👉2- बलरामजी का रथ

भगवान बलभद्र के रथ का नाम तालध्वज है. त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनावा इस रथ के घोड़ों के नाम

रथ 13.2 मीटर ऊंचा और 14 पहियों का होता है, ये रथ लाल, हरे रंग के कपड़े और लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है.

रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं.इनके रथ पर महादेवजी का प्रतीक होता है.

👉3 – सुभद्रा देवी का रथ

देवी सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है. इनके घोड़ों का नाम रोचिक, मोचिक, जिता व अपराजिता है.

रथ में 12.9 मीटर ऊंचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का इस्तेमाल होता है.इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचुड़ा कहते हैं.

सुभद्राजी के रथ पर देवी दुर्गा का प्रतीक होता है. रथ के रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन होते हैं.रथ का ध्वज का नाम नदंबिक है।
श्री जगन्नाथ अष्टकम।।(आदि शंकराचार्य विरचित)
जय जगन्नाथ !
जब आदि शंकराचार्य प्रथम बार पुरी धाम स्थित जगन्नाथ (श्री कृष्ण) जी के दर्शन के लिए पहुंचे, तो भगवान् को देखकर उन्होंने जगन्नाथ जी की स्तुति की ओर अष्टकम का निर्माण किया। यह जगन्नाथ स्वामी का सबसे अधिक प्रचलित स्तोत्र है। इसे चैतन्य महाप्रभु जी ने गाया जब वह जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिए आये थे।यह पावन ओर शक्तिशाली अष्टक है जिसके पाठमात्र से जगन्नाथ स्वामी प्रसन्न हो जाते है, मनुष्य की आत्मा पापो से मुक्त होकर विशुद्ध हो जाती है।इस अष्टकम के पाठ से आत्मा पवित्र होकर अंत में विष्णु लोक को प्राप्त करती है। हर वैष्णव को मुक्ति देने वाला यह स्तोत्र भगवन जगन्नाथ जी को अतिशय प्रिय है।

ॐ जगन्नाथो कृष्णाय
ॐ नमो भगवते जगन्नाथाय त्रिजगदीश्वराय।
ॐ नीलमाधवाय च विदमहे अव्यक्तरूपाय धीमहि तन्नो:
जगन्नाथ: प्रचोदयात्।

🍁कदाचित् कालिन्दीतटविपिनसङ्गीतकरवो
मुदाभीरीनारी_वदनकमलास्वादमधुपः ।
रमाशम्भुब्रह्मा मरपतिगणेशार्चितपदो
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥१॥

अर्थ:-हे प्रभु ! आप कदाचित जब अति आनंदित होते है,तब कालिंदी तट के निकुंजों में मधुर वेणु नाद द्वारा सभी का मन अपनी ओर आकर्षित करने लगते हो, वह सब गोपबाल ओर गोपिकाये ऐसे आपकी ओर मोहित हो जाते है जैसे भंवरा कमल पुष्प के मकरंद पर मोहित रहता है, आपके चरण कमलो को जोकि लक्ष्मी जी, ब्रह्मा,शिव,गणपति ओर देवराज इंद्र द्वारा भी सेवित है ऐसे जगन्नाथ महाप्रभु मेरे पथप्रदर्शक हो,मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |

🍁भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे
दुकूळं नेत्रान्ते सहचर_कटाख्यं विदधते ।
सदा श्रीमद्वृन्दावनवसतिलीलापरिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥२॥

अर्थ:-आपके बाए हस्त में बांसुरी है और शीश पर मयूर पिच्छ तथा कमर में पीत वस्त्र बंधा हुआ है, आप अपने कटाक्ष नेत्रों से तिरछी निगाहो से अपने प्रेमी भक्तो को निहार कर आनंद प्रदान कर रहे है, और अपनी लीलाओ का जो की वृन्दावन में आपने की उनका स्मरण करवा रहे है और स्वयं भी लीलाओ का आनंद ले रहे है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मेरे पथप्रदर्शक बनकर मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |

🍁महाम्भोधेस्तीरे कनकरुचिरे नील शिखरे
वसनप्रासादान्तः सहजबलभद्रेण बलिना ।
सुभद्रामध्यस्थः सकल सुरसेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥३॥

अर्थ :-हे मधुसूदन ! विशाल सागर के किनारे, सूंदर नीलांचल पर्वत के शिखरों से घिरे अति रमणीय स्वर्णिम आभा वाले श्री पूरी धाम में आप अपने बलशाली भ्राता बलभद्र जी और आप दोनों के मध्य बहन सुभद्रा जी के साथ विध्यमान होकर सभी दिव्य आत्माओ, भक्तो और संतो को अपनी कृपा दृष्टि का रसपान करवा रहे है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मेरे पथपर्दशक हो और मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |

🍁कृपापारावारो सजलजलदोश्रेणिरुचिरो
रमावाणीरामः स्फुरदमलपद्मेख्यण सुख।
सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुतिगणशिखागीतचरितो
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥४॥

अर्थ:-जगन्नाथ स्वामी दया और कृपा के अथाह सागर है, उनका रूप ऐसा है जैसे जलयुक्त काले बादलो की गहन श्रंखला हो, अर्थात अपनी कृपा की वृष्टि करने वाले मेघो के जैसे है, आप श्री लक्ष्मी और सरस्वती को देने वाले भण्डार है, अर्थात आप अपनी कृपा से लक्ष्मी और सरस्वती प्रदान करते है,आपका मुख चंद्र पूर्ण खिले हुए उस कमल पुष्प के समान है जिसमे कोई दाग नहीं है अर्थात पूर्ण आभायुक्त खिले हुए पुण्डरीक के जैसा आपका मुखकमल है, आप देवताओ और साधु संतो द्वारा पूजित है, और उपनिषद भी आपके गुणों का वर्णन करते है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मेरे पथप्रदर्शक हो और मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |

🍁रथारूढो गच्छन्पथि मिलितभूदेवपटलैः
स्तुति प्रादुर्भावं प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दयासिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धुसुतया
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥५॥

अर्थ:-हे आनंदस्वरूप ! जब आप रथयात्रा के दौरान रथ में विराजमान होकर जनसाधारण के मध्य उपस्थित होते हे तो अनेको ब्राह्मणो,संतो,साधुओ और भक्तो द्वारा आपकी स्तुति वाचन, मंत्रो द्वारा स्तुति सुनकर प्रसन्नचित भगवान् अपने प्रेमियों को बहुत ही प्रेम से निहारते हे,अर्थात अपना प्रेम वर्षण करते है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी लक्ष्मी जी सहित जोकि सागर मंथन से उत्पन्न सागर पुत्री है मेरे पथप्रदर्शक बने और मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |

🍁परंब्रह्मापीडः कुवलयदलोत्फुल्लनयनो
निवासी नीलाद्रौ निहितचरणोऽनन्तशिरसि ।
रसानन्दो राधासरसवपुरालिङ्गनसुखो
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥६॥

अर्थ:-जगन्नाथ स्वामी आप ब्रह्मा के शीश के मुकुटमणि है, और आपके नेत्र कुमुदिनी की पूर्ण खिली हुयी पंखुड़ियों के समान आभा युक्त है, आप नीलांचल पर्वत पर रहने वाले है, आपके चरणकमल अनंत देव अर्थात शेषनाग जी के मस्तक पर विराजमान है, आप मधुर प्रेम रस से सराबोर हो रहे है जैसे ही आप श्रीराधा जी को आलिंगन करते है, जैसे कमल किसी सरोवर में आनंद पता है,ऐसे ही श्री जी का हृदय आपके आनंद को बढ़ाने वाला सरोवर है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मेरे पथप्रदर्शक और शुभ दृष्टि प्रदान करने वाले हो |

🍁न वै प्रार्थ्यं राज्यं न च कनकमाणिक्यविभवं
न याचेऽहं रम्यां निखिलजनकाम्यां वरवधूम् ।
सदा काले काले प्रमथपतिना गीतचरितो
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥७॥

अर्थ:-हे मधुसूदन ! मैं न तो राज्य की कामना करता हूँ, ना ही स्वर्ण,आभूषण,कनक माणिक एवं वैभव की कामना कर रहा हूँ, न ही लक्ष्मी जी के समान सुन्दर पत्नी की अभिलाषा से प्रार्थना कर रहा हूँ, मैं तो केवल यही चाहता हूँ की प्रमथ पति (भगवान् शिव) हर काल में जिन के गुण का कीर्तन श्रवण करते है वही जगन्नाथ स्वामी मेरे पथप्रदर्शक बने एवं शुभ दृष्टि प्रदान करने वाले हो |

🍁हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते ।
अहो दीनेऽनाथे निहितचरणो निश्चितमिदं
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥८॥

अर्थ:-हे देवो के स्वामी, आप अपनी संसार की दुस्तर माया जोकि मुझे भौतिक सुख साधनो और स्वार्थ साधनो की आकांक्षा के लिए अपनी ओर घसीट रहे है, अर्थात अपनी ओर लालायित कर रहे है, उनसे मेरी रक्षा कीजिये, हे यदुपति ! आप मुझे मेरे पाप कर्मो के गहरे ओर विशाल सागर से पार कीजिये जिसका कोई किनारा नहीं नज़र आता है, आप दीं दुखियो के एकमात्र सहारा हो, जिस ने अपने आपको आपके चरण कमलो में समर्पित कर दिया हो, जो इस संसार में भटककर गिर पड़ा हो, जिसे इस संसार सागर में कोई ठिकाना न हो, उसे केवल आप ही अपना सकते है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करने वाले हो।

🌹माहात्म्यम्
यह स्तोत्र परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध श्रीजगन्नाथाष्टकम् है, जिसकी रचना परंपरा में आदि शंकराचार्य से संबद्ध मानी जाती है।

श्रीजगन्नाथ अष्टकम् भगवान श्रीकृष्ण के जगन्नाथ स्वरूप की प्रेममयी स्तुति है। इसमें भगवान के वृन्दावन-रस, नीलाचल निवास, बलभद्र एवं सुभद्रा सहित दिव्य विग्रह, रथयात्रा की महिमा और भक्तों के प्रति उनकी अनंत करुणा का वर्णन है।

जो भक्त इस अष्टक का श्रद्धा, प्रेम और एकाग्र भाव से पाठ करता है, उसके हृदय में श्रीजगन्नाथ के प्रति अनन्य भक्ति जागृत होती है। भगवान के सुंदर रूप, नाम और लीलाओं का स्मरण करने से मन संसार के दुःखों से ऊपर उठकर भगवत्प्रेम की ओर अग्रसर होता है।

श्रीजगन्नाथ भगवान स्वयं भक्तवत्सल हैं। उनका स्मरण जीव को अहंकार, भय, अशांति और पाप-वृत्तियों से मुक्त कर भक्ति मार्ग में स्थिर करता है।

–🌹पाठ विधिः
🌺 १. शुद्धि एवं संकल्प
प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र एवं माता सुभद्रा का ध्यान करके संकल्प करें—
“श्रीजगन्नाथप्रसादसिद्ध्यर्थं, भक्तिवृद्ध्यर्थं, आत्मशुद्ध्यर्थं श्रीजगन्नाथाष्टकपाठं करिष्ये।”

🌺 २. ध्यान एवं पूजन
भगवान श्रीजगन्नाथ के समक्ष—
दीप प्रज्वलित करें
तुलसीदल अर्पित करें
पुष्प अर्पण करें
धूप एवं नैवेद्य समर्पित करें

फिर भगवान का ध्यान करें—
नीलाचलनिवासं च, बलभद्रसुभद्रायुतम्।
भक्तवत्सलं जगन्नाथं, वन्दे कृष्णस्वरूपिणम्॥

🌺 ३. पाठ क्रम

  1. श्रीजगन्नाथ मंत्र का स्मरण करें—
    ॐ नमो भगवते जगन्नाथाय नमः।
  2. श्रीजगन्नाथ अष्टकम् का पाठ करें।
  3. अंत में भगवान से प्रार्थना करें—
    जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे।
    इस पंक्ति का भावपूर्वक स्मरण करना विशेष फलदायक माना गया है।

🌹विशेष पाठ काल –
यह अष्टक विशेष रूप से इन अवसरों पर पाठ किया जा सकता है—
🌿 प्रतिदिन प्रातःकाल
🌿 रथयात्रा पर्व
🌿 स्नानयात्रा एवं अवसर काल
🌿 एकादशी, पूर्णिमा आदि वैष्णव पर्वों पर
🌿 श्रीकृष्ण एवं विष्णु आराधना के समय

🌺 श्रीजगन्नाथ अष्टक पाठ के लाभ 🌺
🙏 भगवान जगन्नाथ के प्रति प्रेम और भक्ति बढ़ती है।
🙏 मन में शांति, धैर्य और आध्यात्मिक बल की वृद्धि होती है।
🙏 श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का स्मरण होने से हृदय निर्मल होता है।
🙏 संसार के भय, मोह और मानसिक क्लेश कम होते हैं।
🙏 भगवान की कृपा, संरक्षण और मंगल दृष्टि की प्राप्ति होती है।
🙏 वैष्णव भक्तों के लिए यह स्तोत्र भगवान के सुंदर स्वरूप एवं रथयात्रा लीला का ध्यान कराने वाला है।

-🌷 फलप्रार्थना 🌷
जगन्नाथाष्टकं पुण्यं, भक्त्या यः पठते नरः।
तस्य चित्ते सदा कृष्णो, वसेन्नीलाचलाधिपः॥
अर्थ:जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से श्रीजगन्नाथ अष्टकम् का पाठ करता है, उसके हृदय में नीलाचलपति भगवान श्रीकृष्ण सदैव निवास करते हैं।

—॥ जय जगन्नाथ स्वामी ॥ बलभद्राय नमः ॥ सुभद्रायै नमः ॥

🚩॥ श्रीजगन्नाथ_मन्त्रावली ॥🪷 आज अवश्य पढ़ें
. ॐ नमो जगन्नाथाय कृष्णाय नमः।
ॐ ह्रीं श्रींं क्लीं त्रिजगदीश्वराय नमः।
. ॐ नीलमाधवाय अव्यक्तमहापुरुषाय नमः।
ॐ निरञ्जनाय विद्महे निराभासाय धीमहि तन्नो
जगन्नाथः प्रचोदयात् ॥
.ॐ सच्चिदानन्दाय विद्महेअनन्तकोटिब्रह्माण्ड नायकाय
धीमहि । तन्नः श्रीपुरुषोत्तमः प्रचोदयात् ॥

ॐ जगन्नाथाय विद्महे।सृष्टिस्थितिलयाधाराय धीमहि।
तन्नः पुरुषोत्तमः प्रचोदयात् ॥

ॐ नीलमाधवाय विद्महे अव्यक्तरूपाय धीमहि ।
तन्नः परमात्मा प्रचोदयात् ।

ॐ जगन्नाथाय विद्महे श्रीलोकवासाय धीमहि ।
तन्नः परमपुरुषः प्रचोदयात्।

ॐ जगन्नाथाय विद्महे श्रीमण्डलवासाय धीमहि ।
तन्नः परमपुरुषः प्रचोदयात्।

ॐ जगन्नाथाय विद्महे श्रीचक्रस्थिताय धीमहि ।
तन्नः परमपुरुषः प्रचोदयात्।

ॐ जगन्नाथाय विद्महे नीलाचलवासाय धीमहि ।
तन्नः परमपुरुषः प्रचोदयात्।

ॐ जगन्नाथाय विद्महे गोलोकधामवासाय धीमहि ।
तन्नः परमपुरुषः प्रचोदयात्।

ॐ जगन्नाथाय विद्महे ।सृष्टिप्राणाधाराय धीमहि ।
तन्नो जगन्नाथः प्रचोदयात्।

श्रीजगन्नाथस्तोत्रम् –{ब्रह्मपुराणोक्त कारुण्यस्तव }

ॐ नमो जगन्नाथाय कृष्णाय नमः।
ॐ ह्रीं श्रींं क्लीं त्रिजगदीश्वराय नमः।
ॐ नीलमाधवाय अव्यक्तमहापुरुषाय नमः।
ॐ निरञ्जनाय विद्महे निराभासाय धीमहि ।
तन्नो जगन्नाथः प्रचोदयात् ॥
ॐ सच्चिदानन्दाय विद्महे अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकाय
धीमहि ।तन्नः श्रीपुरुषोत्तमः प्रचोदयात् ॥
ॐ जगन्नाथाय विद्महे ।सृष्टिस्थितिलयाधाराय धीमहि ।
तन्नः पुरुषोत्तमः प्रचोदयात् ॥
🚩इस स्तोत्र मैं यह आवश्यक है कि आप स्तोत्र पाठ से पूर्व श्री कृष्ण का, उनके बड़े भ्राता श्री बलराम के साथ उनकी छोटी बहेन देवी सुभद्रा का ध्यान प्रणाम और प्रार्थना करें और इसके बाद ही मूल स्तोत्र का पाठ करें।
मान्यता है कि नित्य सिर्फ एक बार पढ़ने से मानसिक शांती मिलती है, और सभी भौतिक आध्यात्मिक कष्टों का निवारण हो जाता है।

🌺 श्रीजगन्नाथ ध्यान एवं प्रणाम!!
🍁नीलाचलनिवासाय नित्याय परमात्मने ।
बलभद्रसुभद्राभ्यां जगन्नाथाय ते नमः ॥
जगदानन्दकन्दाय प्रणतार्तिहराय च ।
नीलाचलनिवासाय जगन्नाथाय ते नमः ॥

अर्थ:नीलाचल में निवास करने वाले नित्य परमात्मा भगवान् जगन्नाथ को नमस्कार है, जो श्री बलभद्र एवं देवी सुभद्रा सहित विराजमान हैं। जो सम्पूर्ण जगत् के आनन्द के मूल हैं और शरणागतों के दुःखों का हरण करते हैं, उन नीलाचलवासी भगवान् जगन्नाथ को नमस्कार है।

🌺 श्री जगन्नाथ प्रार्थना !!
रत्नाकरस्तव गृहं गृहिणी च पद्मा
किं देयमस्ति भवते पुरुषोत्तमाय ।
आभीरवामनयनाहृतमानसाय
दत्तं मनो यदुपते त्वरितं गृहाण ॥

भक्तानामभयप्रदो यदि भवेत् किं तद्विचित्रं प्रभो ।
कीटोऽपि स्वजनस्य रक्षणविधावेकान्तमुद्वेजितः ॥
ये युष्मच्चरणारविन्दविमुखाः स्वप्नेऽपि नालोचकाः ।
तेषामुद्धरणक्षमॊ यदि भवेत् कारुण्यसिन्धो तदा ॥

अनाथस्य जगन्नाथ नाथस्त्वं मे न संशयः ।
यस्य नाथो जगन्नाथस्तस्य दुःखं कथं प्रभो ॥
या त्वरा द्रौपदीत्राणे या त्वरा गजमोक्षणे ।
मय्यार्ते करुणामूर्ते सा त्वरा क्व गता हरे ॥
मत्समो नास्ति पापी त्वत्समो नास्ति पापहा ।
इति विज्ञाय देवेश यथायोग्यं तथा कुरु ॥

अर्थ:हे पुरुषोत्तम! समुद्र आपका घर है और माता लक्ष्मी आपकी अर्धांगिनी हैं। आपको देने योग्य संसार में और क्या है? अतः हे यदुपते! गोपियों के नेत्रों से आकर्षित मन वाले प्रभो! मेरा मन ही आपको अर्पित है, इसे शीघ्र स्वीकार करें।
🍁
अर्थ:हे प्रभो! यदि आप भक्तों को अभय प्रदान करते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? साधारण जीव भी अपने आश्रितों की रक्षा के लिए प्रयत्न करता है।
🍁
अर्थ:हे करुणासागर! जो आपके चरणकमलों से विमुख हैं और स्वप्न में भी आपका स्मरण नहीं करते, उनका भी यदि आप उद्धार कर दें तो यह आपकी असीम कृपा ही होगी।
🍁
अर्थ:हे जगन्नाथ! मैं अनाथ हूँ और आप ही मेरे नाथ हैं, इसमें कोई संशय नहीं। जिसके स्वामी स्वयं जगन्नाथ हों, उसे दुःख कैसे हो सकता है?

अर्थ:हे करुणामूर्ति हरि! द्रौपदी की रक्षा और गजेन्द्र के उद्धार के समय जो आपकी शीघ्रता थी, आज मुझ दुःखी के लिए वह शीघ्र कृपा कहाँ चली गई?
🍁
अर्थ:हे देवेश! मेरे समान पापी कोई नहीं और आपके समान पापों का नाश करने वाला कोई नहीं। यह जानकर मेरे लिए जो उचित हो, वही कृपा करें।

–🌷॥श्रीजगन्नाथ स्तोत्रम् ॥(ब्रह्मपुराणोक्त कारुण्यस्तव)
राजा इन्द्रद्युम्न कृत श्रीजगन्नाथ स्तुति
🍁
वासुदेव नमस्तेऽस्तु नमस्ते मोक्षकारण ।
त्राहि मां सर्वलोकेश जन्मसंसारसागरात् ॥१॥
निर्मलाम्बरसंकाश नमस्ते पुरुषोत्तम ।
सङ्कर्षण नमस्तेऽस्तु त्राहि मां धरणीधर ॥२॥

नमस्ते हेमगर्भाभ नमस्ते मकरध्वज ।
रतिकान्त नमस्तेऽस्तु त्राहि मां संवरान्तक ॥३॥
नमस्तेऽञ्जनसंकाश नमस्ते विबुधप्रिय ।
नारायण नमस्तेऽस्तु त्राहि मां वरदो भव ॥४॥

नमस्ते विबुधावास नमस्ते विबुधप्रिय ।
नारायण नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शरणागतम् ॥५॥
नमस्ते बलिनां श्रेष्ठ नमस्ते लाङ्गलायुध ।
चतुर्मुख जगद्धाम त्राहि मां प्रपितामह ॥६॥

नमस्ते नीलमेघाभ नमस्ते त्रिदशार्चित ।
त्राहि विष्णो जगन्नाथ मग्नं मां भवसागरे ॥७॥
प्रलयानलसंकाश नमस्ते दितिजान्तक ।
नृसिंह महावीर्य त्राहि मां दीप्तलोचन ॥८॥

यथा रसातलादुर्वी त्वया दंष्ट्रोद्धृता पुरा ।
तथा महावराहस्त्वं त्राहि मां दुःखसागरात् ॥९॥
तवैता मूर्तयः कृष्ण वरदाः संस्तुता मया ।
तवेमे बलदेवाद्याः पृथग्रूपेण संस्थिताः ॥१०॥

अर्थ:-हे वासुदेव! आपको नमस्कार है। आप मोक्ष प्रदान करने वाले परम कारण हैं। हे सम्पूर्ण लोकों के स्वामी! मुझे जन्म-मृत्यु रूपी संसार-सागर से पार कराइये।
🍁
अर्थ:हे पुरुषोत्तम! आपका स्वरूप निर्मल आकाश के समान पवित्र और प्रकाशमय है। आपको नमस्कार है। हे संकर्षण! हे धरणीधर! मेरी रक्षा कीजिये।
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अर्थ:हे स्वर्ण के समान दिव्य आभा वाले प्रभो! आपको नमस्कार है। हे मकरध्वज! हे रतिकान्त! हे शम्बरासुर का संहार करने वाले प्रद्युम्न स्वरूप भगवान्! मेरी रक्षा कीजिये।
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अर्थ:हे नारायण! आपका श्रीविग्रह अंजन के समान श्याम और मनोहर है। आप देवताओं एवं भक्तों को प्रिय हैं। आपको नमस्कार है। मेरी रक्षा करके वर प्रदान करने वाले बनिये।
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हे देवताओं के निवासस्थान! हे देवप्रिय नारायण! आपको नमस्कार है। मैं आपकी शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।
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अर्थ:हे बलवानों में श्रेष्ठ बलराम! हे हलधारी प्रभो! आपको नमस्कार है। हे जगत् के आधार और प्रपितामह स्वरूप प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये।
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अर्थ:हे नील मेघ के समान श्याम स्वरूप भगवान् विष्णु! देवताओं द्वारा पूजित जगन्नाथ! मैं संसार-सागर में डूबा हुआ हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।
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अर्थ:हे प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी! हे दैत्यों का संहार करने वाले नृसिंह भगवान्! हे महापराक्रमी और दीप्त नेत्रों वाले प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये।
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अर्थ:हे महावराह स्वरूप प्रभो! जैसे आपने पूर्वकाल में रसातल से पृथ्वी का उद्धार किया था, वैसे ही मेरा भी दुःखरूपी संसार-सागर से उद्धार कीजिये।
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अर्थ:हे कृष्ण! आपके ये सभी वरदायक स्वरूप मेरे द्वारा स्तुत किये गये हैं। बलदेव आदि जो पृथक-पृथक रूपों में स्थित दिखाई देते हैं, वे भी आपके ही स्वरूप हैं।

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अङ्गानि तव देवेश गरुडाद्यास्तथा प्रभो ।
दिक्पालाः सायुधाश्चैव केशवाद्यास्तथाऽच्युत ॥११॥
अर्थ:
हे देवेश! हे प्रभो! गरुड़ आदि आपके दिव्य पार्षद, शस्त्रों सहित दिक्पाल तथा केशव आदि सभी स्वरूप आपके ही अंगरूप हैं, हे अच्युत!
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ये चान्ये तव देवेश भेदाः प्रोक्ता मनीषिभिः ।
तेऽपि सर्वे जगन्नाथ प्रसन्नायतलोचन ॥१२॥
अर्थ:
हे देवेश! मनीषियों द्वारा आपके जो अन्य अनेक भेदरूप स्वरूप कहे गये हैं, वे सभी आपके ही स्वरूप हैं। हे जगन्नाथ! हे विशाल कमल-नेत्रों वाले प्रभो! मुझ पर प्रसन्न होइये।
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मयाऽर्चिताः स्तुताः सर्वे तथा यूयं नमस्कृताः ।
प्रयच्छत वरं मह्यं धर्मकामार्थमोक्षदम् ॥१३॥
अर्थ:
हे प्रभो! मैंने उन सभी स्वरूपों की पूजा, स्तुति और वन्दना की है। आप मुझे ऐसा वर प्रदान करें जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाला हो।
🍁
भेदास्ते कीर्तिता ये तु हरे सङ्कर्षणादयः ।
तव पूजार्थसम्भूतास्ततस्त्वयि समाश्रिताः ॥१४॥
अर्थ:
हे हरे! संकर्षण आदि आपके जो विभिन्न स्वरूप कहे गये हैं, वे सब आपकी पूजा के निमित्त प्रकट हुए हैं, इसलिए वे सभी अन्ततः आपमें ही आश्रित हैं।
🍁
न भेदस्तव देवेश विद्यते परमार्थतः ।
विविधं तव यद्रूपमुक्तं तदुपचारतः ॥१५॥
अर्थ:
हे देवेश! वास्तव में आपके स्वरूप में कोई भेद नहीं है। आपके जो अनेक प्रकार के रूप वर्णित किये जाते हैं, वे केवल उपासना की दृष्टि से कहे गये हैं।
🍁
अद्वैतं त्वां कथं द्वैतं वक्तुं शक्नोति मानवः ।
एकस्त्वं हि हरे व्यापी चित्स्वभावो निरञ्जनः ॥१६॥
अर्थ:
हे हरे! आप अद्वैत परमात्मा हैं। फिर कोई मनुष्य आपको द्वैत रूप में कैसे कह सकता है? आप ही एकमात्र सर्वव्यापक, चेतनस्वरूप और निष्कलंक परम सत्य हैं।
🍁
परमं तव यद्रूपं भावाभावविवर्जितम् ।
निर्लेपं निर्गुणं श्रेष्ठं कूटस्थमचलम् ध्रुवम् ॥१७॥
अर्थ:
आपका परम स्वरूप भाव और अभाव से रहित, निर्लेप, निर्गुण, श्रेष्ठ, कूटस्थ, अचल और नित्य है।
🍁
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सत्तामात्रव्यवस्थितम् ।
तद्देवाश्च न जानन्ति कथं जानाम्यहं प्रभो ॥१८॥
अर्थ:
हे प्रभो! आपका वह परम स्वरूप सभी उपाधियों से रहित और केवल शुद्ध सत्ता रूप में स्थित है। उसे देवता भी पूर्ण रूप से नहीं जान पाते, फिर मैं साधारण जीव होकर उसे कैसे जान सकता हूँ?
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अपरं तव यद्रूपं पीतवस्त्रं चतुर्भुजम् ।
शङ्खचक्रगदापाणिमुकुटाङ्गदधारिणम् ॥१९॥
अर्थ:
आपका दूसरा स्वरूप पीताम्बर धारण करने वाला, चार भुजाओं से युक्त तथा हाथों में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाला है। वह मुकुट और अंगद से सुशोभित है।
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श्रीवत्सोरस्कसंयुक्तं वनमालाविभूषितम् ।
तदर्चयन्ति विबुधा ये चान्ये तव संश्रयाः ॥२०॥
अर्थ:
वह स्वरूप श्रीवत्स चिह्न से युक्त वक्षःस्थल वाला और वनमाला से विभूषित है। देवता तथा आपके अन्य शरणागत भक्त उसी की पूजा करते हैं।

🍁
देवदेव सुरश्रेष्ठ भक्तानामभयप्रद ।
त्राहि मां पद्मपत्राक्ष मग्नं विषयसागरे ॥२१॥
अर्थ:
हे देवों के देव! हे सुरश्रेष्ठ! आप भक्तों को अभय प्रदान करने वाले हैं। हे कमल के समान नेत्रों वाले प्रभो! मैं विषय-वासनाओं रूपी सागर में डूबा हुआ हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।
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नान्यं पश्यामि लोकेश यस्याहं शरणं व्रजे ।
त्वामृते कमलाकान्त प्रसीद मधुसूदन ॥२२॥
अर्थ:
हे लोकेश! आपके अतिरिक्त मैं किसी अन्य को नहीं देखता, जिसकी शरण ग्रहण करूँ। हे कमलाकान्त! हे मधुसूदन! मुझ पर प्रसन्न होइये।
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जराव्याधिशतैर्युक्तो नानादुःखैर्निपीडितः ।
हर्षशोकान्वितो मूढः कर्मपाशैः सुयन्त्रितः ॥२३॥
अर्थ:
मैं बुढ़ापे और सैकड़ों रोगों से पीड़ित हूँ। अनेक प्रकार के दुःखों से संतप्त होकर, हर्ष और शोक में फँसा हुआ तथा कर्मों के बन्धन से अत्यन्त जकड़ा हुआ हूँ।
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पतितोऽहं महारौद्रे घोरे संसारसागरे ।
विषमोदकदुष्पारे रागद्वेषझषाकुले ॥२४॥
अर्थ:
मैं इस अत्यन्त भयंकर और घोर संसार-सागर में गिरा हुआ हूँ। यह विषय रूपी जल से भरा हुआ, पार करना कठिन और राग-द्वेष रूपी मछलियों से व्याप्त है।
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इन्द्रियावर्तगम्भीरे तृष्णाशोकोर्मिसंकुले ।
निराश्रये निरालम्बे निःसारेऽत्यन्तचञ्चले ॥२५॥
अर्थ:
यह संसार-सागर इन्द्रियों के भँवरों से अत्यन्त गहरा है और तृष्णा तथा शोक की लहरों से भरा हुआ है। इसमें कोई स्थायी आश्रय नहीं है, यह सारहीन और अत्यन्त चंचल है।
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मायया मोहितस्तत्र भ्रमामि सुचिरं प्रभो ।
नानाजातिसहस्रेषु जायमानः पुनः पुनः ॥२६॥
अर्थ:
हे प्रभो! मैं आपकी माया से मोहित होकर इस संसार में बहुत काल से भटक रहा हूँ और हजारों प्रकार की योनियों में बार-बार जन्म लेता रहा हूँ।
🍁
मया जन्मान्यनेकानि सहस्राण्ययुतानि च ।
विविधान्यनुभूतानि संसारेऽस्मिन् जनार्दन ॥२७॥
अर्थ:
हे जनार्दन! मैंने इस संसार में हजारों और असंख्य जन्म धारण किये हैं तथा अनेक प्रकार के अनुभव प्राप्त किये हैं।
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वेदाः साङ्गा मयाऽधीताः शास्त्राण्ययुतानि च ।
विविधान्यनुभूतानि संसारेऽस्मिन् जनार्दन ॥२८॥
अर्थ:
हे जनार्दन! मैंने अंगों सहित वेदों का अध्ययन किया, असंख्य शास्त्रों को जाना और संसार में अनेक प्रकार के अनुभव प्राप्त किये।
🍁
असन्तोषाश्च सन्तोषाः सञ्चयापचया व्ययाः ।
मया प्राप्ता जगन्नाथ क्षयवृद्ध्यक्षयेतराः ॥२९॥
अर्थ:
हे जगन्नाथ! मैंने इस संसार में कभी असंतोष, कभी संतोष, कभी धन का संग्रह, कभी हानि और कभी व्यय का अनुभव किया है। मैंने क्षय और वृद्धि दोनों अवस्थाएँ देखी हैं।
🍁
भार्यारिमित्रबन्धूनां वियोगाः सङ्गमास्तथा ।
पितरो विविधा दृष्टा मातरश्च तथा मया ॥३०॥
अर्थ:
मैंने पत्नी, शत्रु, मित्र और बन्धु-बान्धवों के अनेक संयोग और वियोग देखे हैं। अनेक जन्मों में अनेक पिता और माताओं को भी देखा है।

🍁
दुःखानि चानुभूतानि यानि सौख्यान्यनेकशः ।
प्राप्ताश्च बान्धवाः पुत्रा भ्रातरोज्ञातयस्तथा ॥३१॥
अर्थ:
मैंने अनेक प्रकार के दुःखों का अनुभव किया है और अनेक प्रकार के सुख भी प्राप्त किये हैं। अनेक जन्मों में भाई, बन्धु, पुत्र और अन्य सम्बन्धी भी प्राप्त हुए हैं।
🍁
मयोषितं तथा स्त्रीणां कोष्ठे विण्मूत्रपिच्छिले ।
गर्भवासे महादुःखमनुभूतं तथा प्रभो ॥३२॥
अर्थ:
हे प्रभो! मैंने अनेक बार स्त्रियों के गर्भ में निवास किया है, जो मल-मूत्र से युक्त अत्यन्त कष्टमय स्थान है। वहाँ गर्भवास के महान् दुःख का भी अनुभव किया है।
🍁
दुःखानि यान्यनेकानि बाल्ययौवनगोचरे ।
वार्धके च हृषीकेश तानि प्राप्तानि वै मया ॥३३॥
अर्थ:
हे हृषीकेश! बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में जो अनेक प्रकार के दुःख होते हैं, वे सभी मैंने प्राप्त किये हैं।
🍁
मरणे यानि दुःखानि यममार्गे यमालये ।
मया तान्यनुभूतानि नरके यातनास्तथा ॥३४॥
अर्थ:
मृत्यु के समय होने वाले दुःख, यमलोक के मार्ग और यमराज के लोक में प्राप्त होने वाली पीड़ाएँ तथा नरकों की यातनाएँ भी मैंने भोगी हैं।
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कृमिकीटद्रुमाणां च हस्त्यश्वमृगपक्षिणाम् ।
महिषोष्ट्रगवां चैव तथाऽन्येषां वनौकसाम् ॥३५॥
अर्थ:
हे प्रभो! मैंने कृमि, कीट, वृक्ष, हाथी, घोड़े, मृग, पक्षी, भैंस, ऊँट, गाय और अन्य वनवासी जीवों की योनियों में भी जन्म लिया है।
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द्विजातीनां च सर्वेषां शूद्राणां चैव योनिषु ।
धनिनां क्षत्रियाणां च दरिद्राणां तपस्विनाम् ॥३६॥
अर्थ:
मैंने ब्राह्मण आदि द्विजों, शूद्रों, धनी क्षत्रियों, निर्धनों और तपस्वी पुरुषों के कुलों में भी जन्म धारण किया है।
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नृपाणां नृपभृत्यानां तथाऽन्येषां च देहिनाम् ।
गृहेषु तेषामुत्पन्नो देव चाहं पुनः पुनः ॥३७॥
अर्थ:
हे देव! मैं राजाओं के घरों में, राजसेवकों के घरों में और अन्य अनेक देहधारियों के घरों में भी बार-बार जन्म ले चुका हूँ।
🍁
गतोऽस्मि दासतां नाथ भृत्यानां बहुशो नृणाम् ।
दरिद्रत्वमीश्वरत्वं स्वामित्वं च तथा गतः ॥३८॥
अर्थ:
हे नाथ! मैं अनेक बार मनुष्यों का दास बना हूँ, जो स्वयं दूसरों के सेवक थे। मैंने दरिद्रता, ऐश्वर्य और स्वामित्व—सभी अवस्थाओं को प्राप्त किया है।
🍁
हतो मया हताश्चान्ये घातितो घातितास्तथा ।
दत्तं ममान्यैरन्येभ्यो मया दत्तमनेकशः ॥३९॥
अर्थ:
मुझे दूसरों ने मारा और मेरे द्वारा भी दूसरों की हिंसा हुई। मुझे दूसरों ने मरवाया और मैंने भी दूसरों को मरवाया। मैंने अनेक बार दान दिया और दूसरों से दान भी प्राप्त किया।
🍁
पितृमातृसुहृद्भ्रातृकलत्राणां कृतेन च ।
धनिनां श्रोत्रियाणां च दरिद्राणां तपस्विनाम् ॥४०॥
अर्थ:
हे जनार्दन! पिता, माता, मित्र, भाई और पत्नी आदि के पालन-पोषण के लिए मैंने धनवानों, विद्वानों, निर्धनों और तपस्वियों के सामने भी अनेक बार विनयपूर्वक याचना की है।

🍁
उक्तं दैन्यं च विविधं त्यक्त्वा लज्जां जनार्दन ।
देवतिर्यङ्मनुष्येषु स्थावरेषु चरेषु च ॥४१॥

अर्थ:
हे जनार्दन! मैंने देवताओं, पशु-पक्षियों, मनुष्यों तथा स्थावर-जंगम सभी योनियों में अनेक प्रकार की दीन अवस्थाओं को प्राप्त किया और लज्जा का त्याग करके अनेक कष्ट सहे हैं।

🍁
न विद्यते तथा स्थानं यत्राहं न गतः प्रभो ।
कदा मे नरके वासः कदा स्वर्गे जगत्पते ॥४२॥

अर्थ:
हे प्रभो! ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ मैं न गया हूँ। हे जगत्पते! कभी मेरा निवास नरक में हुआ और कभी स्वर्ग में।

🍁
कदा मनुष्यलोकेषु कदा तिर्यग्गतेषु च ।
जलयन्त्रे यथा चक्रे घटि रज्जुनिबन्धना ॥४३॥

अर्थ:
कभी मैंने मनुष्य लोक में जन्म लिया और कभी तिर्यक् योनियों में। जैसे रहट के चक्र में रस्सी से बँधी हुई घटी ऊपर-नीचे घूमती रहती है।

🍁
याति चोर्ध्वमधश्चैव कदा मध्ये च तिष्ठति ।
तथा चाहं सुरश्रेष्ठ कर्मरज्जुसमावृतः ॥४४॥

अर्थ:
वह घटी कभी ऊपर जाती है, कभी नीचे आती है और कभी बीच में ठहरती है। उसी प्रकार हे सुरश्रेष्ठ! मैं भी कर्मरूपी रस्सी से बँधा हुआ कभी ऊँची और कभी नीची योनियों में भटकता रहता हूँ।

🍁
भ्रमामि सुचिरं कालं नान्तं पश्यामि कर्हिचित् ।
न जाने किं करोम्यद्य हरे व्याकुलितेन्द्रियः ॥४५॥

अर्थ:
हे हरे! मैं बहुत लंबे समय से इस संसार-चक्र में घूम रहा हूँ, परन्तु इसका अन्त कहीं दिखाई नहीं देता। मेरी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयी हैं, समझ नहीं आता कि अब क्या करूँ।

🍁
शोकतृष्णाभिभूतोऽहं कांदिशीको विचेतनः ।
इदानीं त्वामहं देव विह्वलः शरणं गतः ॥४६॥

अर्थ:
मैं शोक और तृष्णा से अत्यन्त पीड़ित होकर दिशाहीन और चेतनाहीन हो गया हूँ। हे देव! इस समय व्याकुल होकर आपकी शरण में आया हूँ।

🍁
त्राहि मां दुःखितं कृष्ण मग्नं संसारसागरे ।
कृपां कुरु जगन्नाथ भक्तं मां यदि मन्यसे ॥४७॥

अर्थ:
हे कृष्ण! मैं संसार-सागर में डूबकर दुःख भोग रहा हूँ। हे जगन्नाथ! यदि आप मुझे अपना भक्त मानते हैं तो मुझ पर कृपा कीजिये और मेरी रक्षा कीजिये।

🍁
त्वदृते नास्ति मे बन्धुर्योऽसौ चिन्तां करिष्यति ।
देव त्वां नाथमासाद्य न भयं मेऽस्ति कुत्रचित् ॥४८॥

अर्थ:
हे देव! आपके अतिरिक्त मेरा कोई ऐसा बन्धु नहीं है जो मेरी चिन्ता करे। आपको अपना नाथ स्वीकार करने के बाद मुझे कहीं भी कोई भय नहीं है।

🍁
जीविते मरणे चैव योगक्षेमेऽथ वा प्रभो ।
ये तु त्वां विधिवद्देव नार्चयन्ति नराधमाः ॥४९॥

अर्थ:
हे प्रभो! जीवन, मृत्यु और योग-क्षेम सभी में आपका ही आश्रय है। जो मनुष्य विधिपूर्वक आपकी पूजा नहीं करते, वे वास्तव में दुर्भाग्यशाली हैं।

-🍁
सुगतिस्तु कथं तेषां भवेत्संसारबन्धनात् ।
किं तेषां कुलशीलैश्च विद्यया जीवितेन च ॥५०॥

अर्थ:
जो भगवान् की भक्ति से विमुख हैं, उनका संसार-बन्धन से उद्धार और उत्तम गति कैसे हो सकती है? उनके कुल, शील, विद्या और जीवन का क्या लाभ है?

🍁
येषां न जायते भक्तिर्जगद्धातरि केशवे ।
प्रकृतिं त्वासुरीं प्राप्य ये त्वां निन्दन्ति मोहिताः ॥५१॥

अर्थ:
जिन मनुष्यों के हृदय में जगत् के पालनकर्ता भगवान् केशव के प्रति भक्ति उत्पन्न नहीं होती और जो आसुरी स्वभाव को प्राप्त होकर मोहवश आपकी निन्दा करते हैं।

🍁
पतन्ति नरके घोरे जायमानाः पुनः पुनः ।
न तेषां निष्कृतिस्तस्माद्विद्यते नरकार्णवात् ॥५२॥

अर्थ:
वे बार-बार जन्म लेकर घोर नरक में गिरते हैं और उस नरकरूपी समुद्र से उनका उद्धार होना अत्यन्त कठिन हो जाता है।

🍁
ये दूषयन्ति दुर्वृत्तास्त्वां देव पुरुषाधमाः ।
यत्र यत्र भवेज्जन्म मम कर्मनिबन्धनात् ॥५३॥

अर्थ:
हे देव! जो दुराचारी और अधम पुरुष आपकी निन्दा करते हैं, वे महान् पतन को प्राप्त होते हैं। हे प्रभो! मेरे कर्मों के कारण जहाँ-जहाँ भी मेरा जन्म हो।

🍁
तत्र तत्र हरे भक्तिस्त्वयि चास्तु दृढा सदा ।
आराध्य त्वां सुरा दैत्या नराश्चान्येऽपि संयताः ॥५४॥

अर्थ:
हे हरे! वहाँ-वहाँ जन्म लेने पर भी आपकी भक्ति मेरे हृदय में सदा दृढ़ बनी रहे। देवताओं, दैत्यों और संयमी मनुष्यों ने आपकी आराधना करके परम सिद्धि प्राप्त की है।

🍁
अवापुः परमां सिद्धिं कस्त्वां देव न पूजयेत् ।
न शक्नुवन्ति ब्रह्माद्याः स्तोतुं त्वां त्रिदशा हरे ॥५५॥

अर्थ:
हे देव! आपकी आराधना करके सभी ने परम सिद्धि प्राप्त की है, फिर कौन आपकी पूजा नहीं करेगा? हे हरे! ब्रह्मा आदि देवता भी आपके अनन्त स्वरूप की पूर्ण स्तुति करने में समर्थ नहीं हैं।

🍁
कथं मानुषबुद्ध्याऽहं स्तौमि त्वां प्रकृतेः परम् ।
तथा चाज्ञानभावेन संस्तुतोऽसि मया प्रभो ॥५६॥

अर्थ:
हे प्रभो! आप प्रकृति से परे परम परमात्मा हैं। मैं साधारण मनुष्य-बुद्धि से आपकी स्तुति कैसे कर सकता हूँ? फिर भी अज्ञानवश मैंने आपकी स्तुति करने का प्रयास किया है।

🍁
तत्क्षमस्वापराधं मे यदि तेऽस्ति दया मयि ।
कृपापराधेऽपि हरे क्षमां कुर्वन्ति साधवः ॥५७॥

अर्थ:
हे हरे! यदि आप मुझ पर कृपा करते हैं तो मेरे इस अपराध को क्षमा करें। क्योंकि साधु पुरुष अपराधी पर भी दया करके क्षमा प्रदान करते हैं।

🍁
तस्मात्प्रसीद देवेश भक्तस्नेहं समाश्रितः ।
स्तुतोऽसि यन्मया देव भक्तिभावेन चेतसा ॥५८॥

अर्थ:
अतः हे देवेश! भक्तों पर प्रेम करने वाले प्रभो! मुझ पर प्रसन्न होइये। मैंने भक्तिभाव से अपने चित्त द्वारा आपकी स्तुति की है।

🍁
साङ्गं भवतु तत्सर्वं वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥५८॥

अर्थ:
हे वासुदेव! मेरी यह स्तुति सभी अंगों सहित पूर्ण और सफल हो। आपको बारम्बार नमस्कार है।

🍁
इत्थं स्तुतास्तदा तेन प्रसन्नो गरुडध्वजः ।
ददौ तस्मै मुनिश्रेष्ठाः सकलं मनसेप्सितम् ॥५९॥

अर्थ:
ब्रह्माजी कहते हैं—इस प्रकार राजा इन्द्रद्युम्न द्वारा स्तुति किये जाने पर गरुड़ध्वज भगवान् विष्णु प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण कर दीं।

🍁
यः सम्पूज्य जगन्नाथं प्रत्यहं स्तौति मानवः ।
स्तोत्रेणानेन मतिमान् स मोक्षं लभते ध्रुवम् ॥६०॥

अर्थ:
जो बुद्धिमान मनुष्य प्रतिदिन भगवान् जगन्नाथ का पूजन करके इस स्तोत्र द्वारा उनकी स्तुति करता है, वह निश्चय ही मोक्ष को प्राप्त करता है।

🍁
त्रिसन्ध्यं यो जपेद्विद्वानिदं स्तोत्रवरं शुचिः ।
धर्मं चार्थं च कामं च मोक्षं च लभते नरः ॥६१॥
अर्थ:
जो विद्वान और पवित्र मनुष्य तीनों संध्याओं के समय इस श्रेष्ठ स्तोत्र का जप करता है, वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करता है।
🍁
यः पठेच्छृणुयाद्वाऽपि श्रावयेद्वा समाहितः ।
स लोकं शाश्वतं विष्णोर्याति निर्धूतकल्मषः ॥६२॥
अर्थ:
जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस स्तोत्र का पाठ करता है, सुनता है अथवा दूसरों को सुनाता है, वह पापों से मुक्त होकर भगवान् विष्णु के सनातन धाम को प्राप्त होता है।
🍁
धन्यं पापहरं चेदं भुक्तिमुक्तिप्रदं शिवम् ।
गुह्यं सुदुर्लभं पुण्यं न देयं यस्य कस्यचित् ॥६३॥
अर्थ:
यह स्तोत्र अत्यन्त पवित्र, धन्य, पापों का नाश करने वाला, भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला तथा कल्याणकारी है। यह परम गोपनीय और दुर्लभ है, इसलिए इसे किसी भी अयोग्य व्यक्ति को नहीं देना चाहिए।
🍁
न नास्तिकाय मूर्खाय न कृतघ्नाय मानिने ।
न दुष्टमतये दद्यान्नाभक्ताय कदाचन ॥६४॥
अर्थ:
इस स्तोत्र का उपदेश नास्तिक, मूर्ख, कृतघ्न, अहंकारी, दुष्ट बुद्धि वाले और अभक्त व्यक्ति को कभी नहीं देना चाहिए।
🍁
दातव्यं भक्तियुक्ताय गुणशीलान्विताय च ।
विष्णुभक्ताय शान्ताय श्रद्धानुष्ठानशालिने ॥६५॥
अर्थ:
यह स्तोत्र भक्तियुक्त, गुणवान, शीलवान, विष्णुभक्त, शान्त स्वभाव वाले और श्रद्धापूर्वक साधना करने वाले व्यक्ति को ही देना चाहिए।
🍁
इदं समस्ताघविनाशहेतुः कारुण्यसंज्ञं सुखमोक्षदं च ।
अशेषवाञ्छाफलदं वरिष्ठं स्तोत्रं मयोक्तं पुरुषोत्तमस्य ॥६६॥
अर्थ:
यह पुरुषोत्तम भगवान् का स्तोत्र समस्त पापों का नाश करने वाला, करुणा प्रदान करने वाला, सुख और मोक्ष देने वाला तथा सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाला श्रेष्ठ स्तोत्र है।
🍁
ये तं सुसूक्ष्मं विमलं मुरारिं
ध्यायन्ति नित्यं पुरुषं पुराणम् ।
ते मुक्तिभाजः प्रविशन्ति विष्णुं
मन्त्रैर्यथाऽऽज्यं हुतमध्वराग्नौ ॥६७॥
अर्थ:
जो निर्मल हृदय वाले साधक उस परम सूक्ष्म, पवित्र, सनातन पुरुष मुरारि भगवान् विष्णु का नित्य ध्यान करते हैं, वे मुक्ति के अधिकारी होकर भगवान् विष्णु में प्रवेश करते हैं, जैसे मन्त्रों द्वारा यज्ञाग्नि में अर्पित घृत भगवान् को प्राप्त होता है।
🍁
एकः स देवो भवदुःखहन्ता
परः परेषां न ततोऽस्ति चान्यत् ।
द्रष्टा स पाता स तु नाशकर्ता
विष्णुः समस्ताखिलसारभूतः ॥६८॥
अर्थ:
एकमात्र वही भगवान् विष्णु संसार के दुःखों का नाश करने वाले हैं। उनसे बढ़कर कोई अन्य नहीं है। वे ही सृष्टि के द्रष्टा, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। वे ही सम्पूर्ण जगत् के सारभूत परम तत्व हैं।
🍁
किं विद्यया किं स्वगुणैश्च तेषां
यज्ञैश्च दानैश्च तपोभिरुग्रैः ।
येषां न भक्तिर्भवतीह कृष्णे
जगद्गुरौ मोक्षसुखप्रदे च ॥६९॥
अर्थ:
जिन लोगों के हृदय में जगद्गुरु, मोक्षसुख प्रदान करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति नहीं है, उनके लिए विद्या, गुण, यज्ञ, दान और कठोर तपस्या का क्या लाभ है?
🍁
लोके स धन्यः स शुचिः स विद्वान्
मखैस्तपोभिः स गुणैर्वरिष्ठः ।
ज्ञाता स दाता स तु सत्यवक्ता
यस्यास्ति भक्तिः पुरुषोत्तमाख्ये ॥७०॥
अर्थ:
इस संसार में वही मनुष्य धन्य, पवित्र और विद्वान् है; वही यज्ञ, तप और गुणों से श्रेष्ठ है; वही वास्तविक ज्ञानी, दानी और सत्यवादी है, जिसके हृदय में भगवान् पुरुषोत्तम के प्रति भक्ति विद्यमान है।

🍁इति श्रीमहापुराणे आदिब्राह्मे स्वयंभ्वृषिसंवादे
कारुण्यस्तवर्णनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥
🌷॥ श्री जगन्नाथ स्तोत्र पाठ विधि एवं माहात्म्य ॥🌷
🍁प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर शुद्ध स्थान पर भगवान् श्रीजगन्नाथ का श्रीकृष्ण, श्रीबलभद्र एवं देवी सुभद्रा सहित ध्यान करें।
सर्वप्रथम —ॐ नमो जगन्नाथाय कृष्णाय नमः॥
का स्मरण करके दीप, धूप एवं श्रद्धा से प्रणाम करें।
इसके बाद श्री जगन्नाथ स्तोत्रम् का भक्तिभावपूर्वक पाठ करें।
पाठ के अंत में भगवान् जगन्नाथ से भक्ति, शान्ति और कल्याण की प्रार्थना करें।
पाठ संख्या:नित्य १ बार, अथवा श्रद्धानुसार अधिक आवृत्ति या अनुष्ठान रूप में भी कर सकते है।

🌺 श्री जगन्नाथ स्तोत्र माहात्म्य एवं लाभ —-
🍁 भगवान् श्रीजगन्नाथ की कृपा प्राप्त होती है और हृदय में भक्ति दृढ़ होती है।
🍁 जन्म-मृत्यु रूपी संसार-सागर से पार होने की आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।
🍁 मन की अशान्ति, भय, दुःख और क्लेशों का शमन होता है।
🍁 धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति में सहायक होता है।
🍁 भगवान् विष्णु-पुरुषोत्तम के सनातन धाम की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
🍁 नियमित पाठ करने वाला साधक भगवान् जगन्नाथ की कृपा, संरक्षण और अन्तःकरण की शुद्धि प्राप्त करता है।

🌷 जय श्री जगन्नाथ, जय श्री बलभद्र, जय माँ सुभद्रा।।जगन्नाथ यात्रा पर जानिए रथाें का सक्षिप्त विवरण।

बलभद्र जी के रथ का संक्षिप्त परिचय ……

  1. रथ का नाम -तालध्वज रथ
    2 कुल काष्ठ खंडो की संख्या -763
  2. कुल चक्के -14
  3. रथ की ऊंचाई- 44 फीट
  4. रथ की लंबाई चौड़ाई – 33 फ़ीट
  5. रथ के सारथि का नाम – मातली
  6. रथ के रक्षक का नाम-वासुदेव
  7. रथ में लगे रस्से का नाम- वासुकि नाग
  8. पताके का रंग- उन्नानी
  9. रथ के घोड़ो के नाम -तीव्र ,घोर,दीर्घाश्रम,स्वर्ण नाभ ।। भगवान् जगन्नाथ जी के रथ का संक्षिप्त परिचय …….
  10. रथ का नाम -नंदीघोष रथ
    2 कुल काष्ठ खंडो की संख्या -832
  11. कुल चक्के -16
  12. रथ की ऊंचाई- 45 फीट
  13. रथ की लंबाई चौड़ाई – 34 फ़ीट 6 इंच
  14. रथ के सारथि का नाम – दारुक
  15. रथ के रक्षक का नाम- गरुड़
  16. रथ में लगे रस्से का नाम- शंखचूड़ नागुनी
  17. पताके का रंग- त्रैलोक्य मोहिनी
  18. रथ के घोड़ो के नाम -वराह, गोवर्धन, कृष्णा, गोपीकृष्णा, नृसिंह, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान, रूद्र।

सुभद्रा जी के रथ का संक्षिप्त परिचय

  1. रथ का नाम – देवदलन रथ
    2 कुल काष्ठ खंडो की संख्या -593
  2. कुल चक्के -12
  3. रथ की ऊंचाई- 43 फीट
  4. रथ की लंबाई चौड़ाई – 31 फ़ीट 6 इंच
  5. रथ के सारथि का नाम – अर्जुन
  6. रथ के रक्षक नाम- जयदुर्गा
  7. रथ में लगे रस्से का नाम- स्वर्णचूड़ नागुनी
  8. पताके का रंग- नदंबिका
  9. रथ के घोड़ो के नाम -रुचिका,मोचिका, जीत,अपराजिता।

चतुर्भुज जगन्नाथ कंठ शोभित कौसतुभः ।
पद्मनाभ, बेडगरवहस्य, चन्द्र सूरज्या बिलोचनः ।।
जय श्री जगन्नाथ महाप्रभु जी 🚩

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