मन की निर्मलता
अंतःकरण को स्वच्छ किये बिना हम परमात्मा को नहीं रिझा सकते हैं। दिखावा दुनिया को रिझाता है, लेकिन परमात्मा को रिझाने के लिए मन की निर्मलता ही एक मात्र शर्त है।
“निर्मल मन जन सो मोहि पावा” इसका एक सीधा सा अर्थ यह भी हुआ कि जहाँ मन की निर्मलता होती है वहाँ जीवन में देवत्व का उदय भी होने लगता है।
मन की शुद्धता में ही बुद्धता का जन्म भी होता है अर्थात जो भीतर से शुद्ध बन गया वो बाहर से बुद्ध बन गया।
प्रदर्शन का बल टिकाऊ नहीं होता वह समय के साथ-साथ क्षीण होने लगता है। प्रदर्शन से दुनियाभर की पहचान तो मिल जाती है लेकिन भीतर की रिक्तता बनी रहती है।
हमारा जीवन बाहर से जितने दिखावे का होता है, भीतर से उतना ही अशांत, खिन्न और रिक्त बना रहता है।
जहाँ जीवन प्रदर्शन शून्य होता है वहीं से आत्मदर्शन का जन्म होता है। स्वयं के भीतर मुड़ जाना ही परमात्म तत्व से जुड़ जाना भी है।
जय श्री राधे कृष्ण
















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