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धर्म एक पद्धति है जीवन जीने का, कोई भी आत्मा किस धर्म के समूह में पैदा होगा स्त्री या पुरुष शरीर में और किस देश में प्रकट होगा एवम कौन उसका माता-पिता और परिवार, रिश्तेदार, मित्र और अन्य अनजान लोग होगा उसका पिछले जन्म का °कर्म° तै करता है, और प्रार्थना आंतरिक मामला है आराध्य देव और उस मनुष्य में, इसमें किसी भी अन्य मनुष्य को हस्तशेप करना अनिवार्य है।
हम सभी मनुष्य °कर्म से बंधे है और हमें कर्म करने की अवधि 108 साल या इससे कम का है°, पाप कर्मों से बचें, केवल पुण्य कर्म ही करें, नहीं तो अगला जन्म सुखमय होगा या दुखमय यह हमारे इस जन्म काल का कर्म निश्चित करेगा, सबका मालिक एक केवल साक्षी हैं हमारे कर्मों का जो ऊपर आसमान में नहीं हैं अपितु हमारे मन मन्दिर में ही मौजूद है अंदरूनी सीसीटीवी (CCTV) की तरह।
हम इस धर्ती पर मेहमान या यात्री हैं, और मेहमान या यात्री सबके साथ मौज मस्ती करते हैं न की दुश्मन बनते हैं, मालिक हरगिज भी नहीं हैं इस धर्ति पर।
















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