लिङ्गं एवाश्रमख्यातौ अन्योन्यापत्ति कारणम् ।
अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं पाण्डित्ये चापलं वचः ॥
यह श्लोक कलियुग में समाज की गिरती हुई प्रभुता और मूल्यों का चित्रण करता है। इसमें कहा गया है कि केवल बाहरी दिखावा —जैसे अच्छे वस्त्र, चिह्न या आडम्बर—के आधार पर व्यक्ति के आश्रम, पद या महानता की पहचान होने लगेगी, जिससे लोग एक-दूसरे को भ्रमित करेंगे।
अच्छे आचरण और कर्तव्य का पालन समाप्त हो जाने से न्याय व्यवस्था दुर्बल हो जाएगी और सत्य का स्थान पक्षपात तथा स्वार्थ ले लेगा। विद्वत्ता भी केवल शब्दों की चतुराई और वाचालता तक सीमित रह जाएगी; अर्थात जो अधिक बोलने मे प्रभावशाली भाषा का प्रदर्शन करने में कुशल होगा, वही पंडित माना जाएगा, चाहे उसके भीतर वास्तविक ज्ञान और चरित्र न हो।
यह श्लोक हमें बाहरी दिखावे के बजाय सत्य, आचरण और वास्तविक गुणों को महत्व देने की प्रेरणा देता है।
जय श्री कृष्णा
















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