आज का दिन केवल एक नव वर्ष ही नहीं, बल्कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी का ध्वज फहराने का दिन भी है
मान्यताओं के अनुसार, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को जब ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना की थी, तब जो विजय पताका फहराई गई, वही आज ‘गुड़ी’ (ब्रह्मा ध्वज) के नाम से पूरे देश में फहरती है।
सनातन धर्म का एक त्योहार, अनेक रूप, एक ही आत्मा को देखा जाये ..

महाराष्ट्र ( और उससे सटे क्षेत्रों में ) में ‘गुड़ी पड़वा’ ब्रह्मा ध्वज को ऊंचे बांस पर चढ़ाकर सृजन की ऊर्जा का स्वागत। साथ में पुरण पोली की मिठास फैलती है ।
सिंध में ‘चेटीचंड’ के रूप में ..झूलेलाल के जन्म और सिंधु सभ्यता के गौरव का प्रतीक। यहाँ भी वही ब्रह्मा ध्वज की भावना, ‘तैरी’ (मीठे चावल) के भोग के साथ।
आंध्र-तेलंगाना-कर्नाटक में ‘उगादि’ के रूप में ..ब्रह्मा जी द्वारा रचित इस नए साल का पंचांग पढ़ा जाता है। ( पंचांग श्रवण मुख्य है ) उगादि पचड़ी के छह रस हमें जीवन का दर्शन कराते हैं । मीठा, खट्टा, कड़वा, तीखा, कसैला, नमकीन।
इन ६ रसों से कैसे ५६ भोग बनते हैं इस पर विस्तार मैं पूर्व में कर चुका हूँ ।
उत्तर भारत में ‘चैत्र नवरात्रि’ के रूप में , नौ दिनों की आराधना, कलश स्थापना। यह कलश भी उसी ब्रह्मा ध्वज (गुड़ी) के कलश का प्रतीक है।
कश्मीर में ‘नवरेह’ के रूप में देवी शारिका की आराधना, नवरेह थाली में दही चावल अखरोट से नए वर्ष का स्वागत।
देवी शारिका के बारे में …
देवी शारिका (या माँ शारिका, श्री शारिका देवी) कश्मीर घाटी की प्रमुख देवी हैं, विशेष रूप से श्रीनगर की अधिष्ठात्री देवी (presiding deity या इष्ट-देवी) मानी जाती हैं। वे आदि शक्ति का एक रूप हैं और मुख्य रूप से दुर्गा या त्रिपुरसुंदरी (महात्रिपुरसुंदरी, राजराजेश्वरी) का अवतार मानी जाती हैं।
देवी का प्रमुख मंदिर हरि पर्वत (Hari Parbat) की चोटी पर स्थित है, जिसे शारिका पर्वत भी कहते हैं। यह श्रीनगर शहर के बीचों-बीच एक छोटी पहाड़ी है।
यहाँ देवी की पूजा स्वयंभू श्री यंत्र (या महाश्री यंत्र / श्री चक्र) के रूप में की जाती है, जो एक प्राकृतिक रूप से उभरा हुआ पत्थर (शिला) है। इसमें 18 भुजाएँ दर्शाई जाती हैं (कुछ परंपराओं में 18 हाथों वाली मूर्ति के रूप में भी वर्णन मिलता है)।
नाम का अर्थ और महत्व क्या है ? शारिका” नाम संस्कृत में मैना पक्षी (mainā bird, कश्मीरी में “हैर” या haer) से जुड़ा माना जाता है। कथा के अनुसार देवी ने एक राक्षस को मारने के लिए मैना पक्षी का रूप धारण किया और एक छोटे कंकड़ को फेंका, जो पहाड़ बन गया और राक्षस को कुचल दिया। उस पहाड़ को ही हरि पर्वत कहा गया।
श्रीनगर शहर का नाम भी “श्री” (देवी का नाम) से जुड़ा माना जाता है। कश्मीरी पंडित समुदाय में वे कुलदेवी (kuldevi) के रूप में पूजित हैं और सदियों से कश्मीर की रक्षा करने वाली माँ के रूप में पूजनीय रही हैं।
पंचांग श्रवण की परंपरा हर क्षेत्र में एक जैसी है ..चाहे महाराष्ट्र हो, आंध्र हो या सिंध। हम आने वाले समय का आत्मचिंतन करते हैं, क्योंकि ब्रह्मा जी की यह सृष्टि हमें हर क्षण कुछ नया सिखाती है।
यह विविधता ही हमारी पहचान है, और यह एकता हमारी शक्ति।
*ॐ ब्रह्मध्वजाय नमः*
















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