हमारा विक्रम संवत//त्चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन विक्रम संवत् के आरम्भ होने का दिन है। यह दिन विश्व के सबसे पहले गणतंत्र का स्थापना-दिवस होने के साथ-साथ सृष्टि के आरम्भ का भी दिन है_ मनीष चन्द्र पांडे अयोध्या

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हमारा विक्रम संवत्


चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन विक्रम संवत् के आरम्भ होने का दिन है। यह दिन विश्व के सबसे पहले गणतंत्र का स्थापना-दिवस होने के साथ-साथ सृष्टि के आरम्भ का भी दिन है। अब से २०८३ वर्ष पहले शकों को परास्त कर मालव गणराज्य की जो अविस्मरणीय जीत हुई, उसे राष्ट्रीय गौरव का विषय माना जाता है। पूरा भारत आज भी इस दिन को पूरे उत्साह के साथ उत्सव के रूप में मनाता है। घर-घर, द्वार-द्वार गुड़ी बाँधने की परम्परा के कारण यह दिन गुड़ी पड़वा भी कहलाता है। गुड़ी विजयोल्लास की देवी है, नये संवत्सर की शुभ-संदेशवाहिका है। यह नव-संवत्सर की सनातन उषा ही है जो हमारे द्वार पर उत्सव बन कर आ खड़ी होती है।

जिस तरह हिन्दी का राष्ट्रव्यापी वर्चस्व होते हुए भी वह हमारी राष्ट्रभाषा नहीं, उसी तरह विक्रम संवत् का चारों तरफ बोलबाला होते हुए भी वह राष्ट्रीय कैलेंडर नहीं बन सका। हमारा राष्ट्रीय कैलेंडर वर्ष १९५७ में घोषित हुआ। दुर्भाग्यवश विक्रम संवत् को नहीं, शक संवत् को राष्ट्रीय कैलेंडर के लिये चुना गया। तब से लेकर अब तक विक्रम संवत् राष्ट्रीय कैलेंडर के लिये अस्पृश्य ही बना हुआ है।बहुत कम लोग जानते हैं कि ऐसा क्यों है? कहा जाता है कि तत्कालीन सरकार ने धर्म-निरपेक्ष सिद्धांतों के दबाव में आकर विक्रम संवत् को पीछे धकेला, और शक संवत् को आगे किया। इस काम को ताकत मिली इस बात से कि शक संवत् ईस्वी सन् की तरह सौर गणना पर आधारित है। राष्ट्रीय कैलेंडर बनाते समय केवल इस बात पर जोर था कि वही संवत् स्वीकार्य हो, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ कदमताल कर सके।

क्या यह दुःख का विषय नहीं, कि सब लोग जिस तिथिपत्र के अनुसार सारे तीज-त्यौहार मनाते हैं, महाकुम्भ जैसा विराट पर्व मनाते हैं, मुहूर्त निकालते हैं, लोक-कला और लोक-संस्कृति से जुड़ते हैं, वह महान् विक्रम संवत् स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय कैलेंडर का हिस्सा नहीं है। सब जानते हैं कि विक्रम संवत् सूर्य की गति पर नहीं,चंद्रमा की कलाओं पर निर्भर है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के एक-एक दिन के कलात्मक सौन्दर्य के जादू से हम सब वाकिफ हैं। शक संवत् भले ही राष्ट्रीय पंचांग हो, लेकिन हम पर उसका कोई खास असर नहीं। वह विक्रम संवत् से केवल इक्कीस वर्ष पुराना है। उसे तो उसी दिन हाशिए पर डाल दिया जाना चाहिए था, जिस दिन हमारी संस्कृति पर आक्रमण करने वाले शक पराजित हुए, और विक्रम संवत् की पक्की नींव रखी गई। आश्चर्य है कि शक संवत् बनाये रखा गया। स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर एक ओर से ईस्वी सन् को पकड़े हुए है, दूसरी ओर शक संवत् को।

शक और हूणों ने आक्रमण कर हमारे देश को जो हानि पहुँचाई, उसका हिसाब होने से पहले ही हमें दूसरे विदेशी आक्रान्ताओं का सामना करना पड़ा। अंग्रेजों ने हम पर राज किया, वे चले भी गये, लेकिन अंग्रेजी शिक्षा को ही सब कुछ मान लेने की मानसिकता ने हमसे अमूल्य संस्कार छीन लिये। उसने हमारा संवत् ही नहीं छीना, वह सब छीन लिया, जिस पर हम गर्व कर सकते थे। अंग्रेजों ने भारत पर राज करने के लिये जान-बूझकर शक संवत् को पकड़कर रखा। भारत स्वतंत्र हुआ, तब सत्ताधारियों ने भी उसे छोड़ने का जोखिम नहीं उठाया।

हमारे स्कूलों में इतिहास पढ़ाते समय आज भी ईसापूर्व ( बी.सी.) और ईसापश्चात् (ए.डी.) का उल्लेख किया जाता है, जबकि विक्रमादित्य ही ईसा से ५७ वर्ष पहले हुए। हमें कालगणना के अपने मानकों का प्रयोग करते रहने में क्या कठिनाई थी, यह समझ से परे है। विक्रम संवत् के आरम्भ को ईसा पूर्व ५७ कहने की अपेक्षा विक्रम संवत् ०१ कहने में भला क्या अड़चन हो सकती है? हमारे होनहार बच्चे पूरे विश्व की सूचनाओं से परिचित हैं, किन्तु भारतीय संस्कृति की बुनावट करने वाले विक्रम संवत् से उन्हें अनभिज्ञ रखने का पाप किसके माथे? हिन्दू संस्कृति की दुहाई देने वालों के परिजनों से और बच्चों से पूछ कर तो देखिए, कि अभी कौन सा संवत् चल रहा है? भगवान् करे, आप निराश हो कर जमीन में न धँस जाएँ।

सम्राट् विक्रमादित्य से ले कर राजा भोज के काल तक की लगभग दस सदियों में सनातन धर्म की शिक्षाओं के चलते हम जिस ऊँचाई पर थे, वह भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में दर्ज है। जब-जब शिक्षा में गिरावट आई, समाज का भी पतन हुआ। हमारे शिक्षक नई पीढ़ी को मिट्टी की गंध से दूर रखेंगे, तो वह संस्कारों से वंचित रहेगी और अपनी विरासत से भी। मैकाले की शिक्षा पद्धति को दोष देकर अपना बचाव करने वाली सरकारें तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन हमें वे रास्ते खुले रखने होंगे, जो प्राचीन आचार्यों ने बनाए।

आक्रान्ताओं के अधीन रहने का दुर्भाग्य झेलते हुए हम यहाँ तक आ गये, किन्तु जो आलोक-स्तम्भ हमारे पूर्वज हिन्दू नरेशों ने स्थापित किये थे, वे आज भी हमें आलोकित करते रहते हैं। विजय को समय की रेत के साथ फिसलने से बचाये रखने का ऐसा कोई और उदाहरण हमें कहीं नहीं मिलता। आश्चर्य यह कि विक्रम संवत् ने हमें हिन्दू पंचांग ही नहीं दिया, अपितु वर्ष भर चलते रहने वाले तीज-त्यौहारों की सौगात भी दी। यह सौगात नहीं होती, तो हमारी लोक-चेतना न जाने कब टूट कर बिखर जाती।

विक्रम संवत् अपने शुरुआती दौर में कृत संवत् था, कालान्तर में उज्जयिनी के मालव नरेशों की लोकप्रियता के चलते वह मालव संवत् के नाम से जाना गया। राजा भोज के समय के आसपास ही विक्रमादित्य के विरुद को अनंतकाल तक जीवन्त बनाये रखने के लिये लोक में विक्रम संवत् प्रचलित हुआ। महान् हिन्दू सम्राट् विक्रमादित्य ने अपनी सभा के विद्वानों की सहायता ले कर जिस संवत् को मालव-संवत् या कृत संवत् नाम दे कर कालगणना का वटवृक्ष तैयार किया, उसे उनकी लम्बी वंश परम्परा ने सींचा। उसकी छाया में हल जोतते हुए किसान, श्रमिक, व्यापारी, श्रेष्ठी समाज, विप्र समुदाय, योद्धा, चिकित्सक और विद्या के क्षेत्र में अपनी फसल उगाने वाले महारथियों ने नये-नये कीर्तिमान रचे। उन्हीं की बदौलत हमें भारतीय इतिहास का वह स्वर्णयुग मिला, जिस पर आज भी हमें नाज है।

हमारे आचार-विचार विक्रम संवत् के अनुशासन से बँधे हुए रहे हैं। विक्रम संवत् की जीवन-शक्ति और इसकी चमक सबसे निराली है। इस संवत् के मास, पक्ष और तिथियों का आधा-अधूरा ज्ञान होने के बावजूद नयी और पुरानी पीढ़ी के लोग विक्रम संवत् के साथ दिल से जुड़े हुए हैं, क्योंकि हमारे धार्मिक रीति-रिवाज, जन्म-विवाह-मृत्यु से सम्बंधित सामाजिक व्यवहार, दशहरा, दिवाली, होली, रक्षाबंधन सहित सारे पर्व और त्यौहार जिस तिथिपत्र के अनुसार मनाये जाते हैं, वह विक्रम संवत् पर ही निर्भर है।

विद्वानों के मतानुसार विक्रम संवत् ही आधुनिक है। इससे पहले के सप्तर्षि संवत्, युधिष्ठिर संवत्, वीर निर्वाण संवत्, बुद्धनिर्वाण संवत् प्रचलित हैं, किन्तु विक्रम संवत् की जीवन-शक्ति और इसकी चमक के आगे ये सब फीके होते चले गये। विक्रम संवत् ने हमारे सामाजिक जीवन को उत्सव बनाये रखने के लिये त्यौहारों का सृजन किया, सांस्कृतिक इतिहास की रचना की। इस संवत् ने संवत्सर और कालचक्र के विज्ञान को जीवन के उल्लास से जोड़ कर उस उत्सव-धर्म की नींव रखी, जो हमारे संघर्ष भरे दिनों में भी जीवन का उत्साह बनाये रखने के लिये वरदान सिद्ध हुई है।

हम भारत के लोग दु:ख के पहाड़ के नीचे दबे हों, तब भी हँस लेते हैं, नाच लेते हैं, गा लेते हैं। इस बात के सैकड़ों उदाहरण हैं हमारे पास। अभाव और असुविधाओं में रह कर जीवन-यापन करने वाले ही हमारे यहाँ खुशमिजाज देखे गये हैं। ये ही वे लोग हैं जो हाट-मेले में दिखाई देते हैं, पंचक्रोषी की जात्रा में दिखाई देते हैं, तीर्थ में डुबकियाँ लगाते हुए दिखाई देते हैं, भजन-कीर्तन में झूमते हुए दिखाई देते हैं ,और अपनी थोड़ी सी जमा पूँजी दूसरों की भलाई के लिये दोनों हाथों से लुटाते हुए दिखाई देते हैं। ये वे लोग हैं, जो ज्यादा आधुनिक नहीं हुए, किन्तु उस संस्कृति से जुड़े हुए हैं, जो विक्रम संवत् ने हमें दी।

डाॅ.मुरलीधर चाँदनीवाला


चैत्र मास को मधु मास भी कहा जाता है, और इस दौरान मीठे पदार्थों का सेवन कम या निषेध बताया गया है। मान्यता है कि इस महीने रक्त में मिठास (शर्करा) की मात्रा स्वाभाविक रूप से बढ़ी होती है, इसलिए संतुलन बनाए रखना जरूरी है। इसी कारण सुबह खाली पेट 10–15 नीम की ताजी पत्तियां और 1–2 दाने काली मिर्च लेने की सलाह दी जाती है।
नीम के पत्तों का सेवन शरीर की शुद्धि में सहायक माना जाता है। यह रक्त को शुद्ध करने, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और संक्रमण से बचाने में मददगार माना जाता है। साथ ही, यह शरीर में संतुलन बनाए रखने और ऊर्जा (जीवनी शक्ति) बढ़ाने में भी सहायक होता है।
इस पारंपरिक उपाय का नियमित पालन करने से साल भर स्वास्थ्य अच्छा रहने की मान्यता है। हालांकि, किसी भी उपाय को अपनाने से पहले अपनी प्रकृति और स्वास्थ्य के अनुसार विचार करना जरूरी है

. नवरात्रि का पहला दिन, माता का पहला स्वरूप

                         माता शैलपुत्री

      शैलपुत्री माता नवरात्रि के पहले दिन पूजी जाने वाली देवी हैं। इन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है, इसलिए इनका नाम “शैलपुत्री” पड़ा। शैलपुत्री माता का स्वरूप अत्यन्त पवित्र और दिव्य है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल होता है तथा माता नन्दी बैल पर सवारी करती हैं इसलिए इन्हें वृषारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन शैलपुत्री माता की पूजा करने से भक्त के जीवन में स्थिरता, सुख और समृद्धि का आगमन होता है। यही देवी प्रथम दुर्गा हैं। ये ही सती के नाम से भी जानी जाती हैं। उनकी एक मार्मिक कहानी है।
      एक बार जब प्रजापति ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया, भगवान शंकर को नहीं। सती यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमन्त्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहाँ जाना उचित नहीं है। सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब घर पहुँचीं तो सिर्फ माँ ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव है। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुँचा।
      वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने को जलाकर भस्म कर लिया। इस दारुण दुःख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं।  पार्वती और हेमवती भी इसी देवी के अन्य नाम हैं। शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शंकर से हुआ। शैलपुत्री शिवजी की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनन्त है।
      शैलपुत्री माता को आद्य शक्ति और शक्ति स्वरूपा भी कहा गया है। यह कथा बताती है कि पिछले जन्म में ये सती थीं, जिन्होंने अपने पति भगवान शिव का अपमान सहन न कर अपने शरीर का त्याग कर दिया था। 
      नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा में सभी नदियों, तीर्थों और दिशाओं का आह्वान किया जाता है। पहले से लेकर आखिरी दिन तक नवरात्रि की पूजा में कपूर का इस्तेमाल बेहद शुभ माना गया है। कहते हैं कि माँ दुर्गा की पूजा में कपूर के इस्तेमाल से उनकी विशेष कृपा भक्तों को प्राप्त होती है।
      माँ शैलपुत्री को सफेद वस्तुएँ प्रिय हैं। इसलिए नवरात्रि के पहले दिन माँ दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप को सफेद मिष्ठान का भोग लगाया जाता है। इसके साथ ही उन्हें श्वेत पुष्प अर्पित करना भी बेहद शुभ माना जाता है।

               माता शैलपुत्री की आरती

शैलपुत्री मां बैल पर सवार। करें देवता जय जयकार॥
शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी॥
पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे॥
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू॥
सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी॥
उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो॥
घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के॥
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं॥
जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे॥
मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो॥
मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै-नमस्तस्यै-नमस्तस्यै नमो नम:॥
० ० ०

                     ॥जय जय मां भवानी॥

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