बुद्धि की विजय-रामायण काल का अद्भुत प्रसंग
त्रेतायुग का समय था। भगवान श्रीराम के वनवास के दिनों में ऋषि-मुनियों के आश्रमों के आसपास अनेक राक्षस उत्पात मचाया करते थे। उन्हीं दिनों महर्षि अत्रि के आश्रम में धैर्यसेन नाम का एक पराक्रमी शिल्पकार रहता था। वह आश्रम के लिए धनुष, रथ, कुटियाएँ और यज्ञ वेदियाँ बनाता था। वह बलवान होने के साथ-साथ अत्यंत बुद्धिमान भी था।
एक दिन पास के एक आश्रम के महर्षि ने उसे यज्ञ-मंडप बनाने के लिए बुलाया। कई दिनों की मेहनत के बाद कार्य पूरा हुआ। प्रसन्न होकर ऋषि ने उसे स्वर्ण मुद्राओं की एक थैली भेंट की, जिससे वह आश्रम के लिए आवश्यक सामग्री खरीद सके।
संध्या ढल चुकी थी। धैर्यसेन स्वर्ण मुद्राओं की थैली लेकर घने वन से होकर लौट रहा था। तभी एक भयानक राक्षस उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसके हाथ में दिव्य शक्ति से युक्त त्रिशूल था।
राक्षस गरजा, “मनुष्य! जो कुछ भी तेरे पास है, मुझे दे दे, अन्यथा अभी तेरा अंत कर दूँगा।”
धैर्यसेन समझ गया कि इस समय बल से जीतना कठिन है। उसने शांत स्वर में कहा, “हे महाबली! यह स्वर्ण थैली मैं तुम्हें दे देता हूँ, पर मेरी एक विनती सुन लो।”
राक्षस हँसते हुए बोला, “जल्दी बोल।”
धैर्यसेन बोला, “जब मैं आश्रम लौटूँगा तो ऋषि समझेंगे कि मैंने धन का दुरुपयोग कर दिया। कृपा करके अपने त्रिशूल से मेरे अंगवस्त्र में एक छेद कर दो, ताकि सबको विश्वास हो जाए कि मुझ पर राक्षस ने आक्रमण किया था।”
राक्षस को अपनी शक्ति दिखाने का अवसर मिल गया। उसने त्रिशूल चलाकर वस्त्र फाड़ दिया।
धैर्यसेन फिर बोला, “यदि मेरे उत्तरीय में भी दो-तीन छेद कर दो तो सभी जान जाएँगे कि मैंने साहसपूर्वक संघर्ष किया था।”
अहंकार में डूबे राक्षस ने फिर वार किए। बार-बार दिव्य त्रिशूल चलाने से उसकी सारी मायावी शक्ति समाप्त हो गई।
तभी धैर्यसेन मुस्कुराया और बोला, “मैं इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था। अब तुम्हारे त्रिशूल की दिव्य शक्ति समाप्त हो चुकी है। अब तुम्हारी ताकत केवल भय दिखाने तक ही थी।”
इतना कहते ही उसने राक्षस को पकड़ लिया। राक्षस लाख छूटने का प्रयास करता रहा, पर धैर्यसेन के बल और साहस के सामने टिक न सका। भयभीत होकर उसने तुरंत स्वर्ण मुद्राओं की थैली वापस कर दी और क्षमा माँगते हुए वन में भाग गया।
जब धैर्यसेन आश्रम पहुँचा और सारी घटना सुनाई, तब महर्षि ने कहा, “वत्स! संकट के समय केवल बल नहीं, बल्कि बुद्धि ही सबसे बड़ा अस्त्र होती है। जिसने धैर्य और विवेक नहीं खोया, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता।”
शिक्षा:
मुसीबत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, यदि मन शांत रहे और बुद्धि से काम लिया जाए, तो सबसे कठिन संकट का भी समाधान निकल आता है। भगवान श्रीराम का जीवन भी हमें यही सिखाता है कि धैर्य, विवेक और सही समय पर लिया गया निर्णय ही सच्ची विजय का मार्ग बनता है।
राम रक्षा स्तोत्र मंत्र
राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे । सहस्त्रनाम ततुल्यं रामनाम वरानने ।।
शोर मचाने वाला अक्सर कमज़ोर होता है
पर वो अपने आप को ताकतवर दिखाता है
शांति से बात करने वाला अक्सर ताकतवर होता है
पर लोग उसे कमज़ोर समझने की गलती कर लेते हैं















