मंत्र की शुरूवात//सृष्टि के शुरू में, जब इंसान और चिंपैंजी के पूर्वज एक ही थे, तब मादा के लिए नर आपस में खूब लड़ते-झगड़ते थे। बाद में समाज में शांति आया और परिवार बाद जन्म लिया आज जानेंगे कौन सा मंत्र किस लिए…

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सृष्टि के शुरू में, जब इंसान और चिंपैंजी के पूर्वज एक ही थे, तब मादा के लिए नर आपस में खूब लड़ते-झगड़ते थे। इसे जीव-विज्ञान में Sexual Selection कहते हैं।

कैसे और क्यों होता था:

1. चिंपैंजी समाज में आज भी
चिंपैंजी में सबसे ताकतवर नर “Alpha Male” बनता है। वही सबसे ज्यादा मादाओं के साथ संबंध बनाता है। बाकी नर या तो लड़कर उसे हराएँ, या फिर चुपचाप मौका देखें। ताकत, आक्रामकता = ज्यादा बच्चे = अपने जीन आगे बढ़ाना।

2. शुरुआती इंसान में भी ऐसा ही था
लगभग 60-70 लाख साल पहले जब हम चिंपैंजी से अलग हुए, तब भी हाल यही था। पुरातत्व सबूत बताते हैं:

  • नर के कंकालों में चोट के निशान ज्यादा मिलते हैं
  • नर का शरीर मादा से 15-20% बड़ा होता था — ये इस बात का संकेत है कि नर आपस में लड़ते थे। गोरिल्ला में ये फर्क 50% है, इंसान में अब सिर्फ 8-10% रह गया।
  • दाँतों के जीवाश्म बताते हैं कि नर के Canine दाँत बड़े थे — लड़ाई में हथियार।

3. फिर बदलाव कैसे आया?
धीरे-धीरे इंसान में एक-विवाह और सहयोग फायदेमंद साबित हुआ:

  • आग का इस्तेमाल: 8 लाख साल पहले आग पर काबू पाया। अब खाना पकाकर खाते, तो बड़े दाँत-जबड़े की जरूरत कम हुई।
  • बच्चे की परवरिश: इंसान के बच्चे बहुत कमजोर पैदा होते हैं। माँ-बाप दोनों मिलकर पालें तो बच्चे के बचने के चांस बढ़ते। जो नर मादा-बच्चे का ख्याल रखता, उसके जीन आगे बढ़े।
  • दिमाग बड़ा हुआ: लड़ाई से ज्यादा फायदा बातचीत, औजार बनाने, टीम में शिकार करने से मिला। जो समूह मिलकर रहता, वो बचता।
  • Testosterone घटा: वैज्ञानिक मानते हैं कि पिछले 2 लाख साल में इंसान में टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन कम हुआ। चेहरा गोल हुआ, आक्रामकता घटी।

4. बुद्ध ने इसी बात को समझाया
बुद्ध से 2500 साल पहले भी लोग काम, क्रोध, स्वार्थ में लड़ते थे। उन्होंने कहा ये “पशु-प्रवृत्ति” है। इंसान बनना है तो पंचशील लो, मैत्री रखो। क्योंकि स्वार्थ, वासना = दुःख। जब नर-नारी एक-दूसरे को वस्तु नहीं, साथी समझें — तब समाज में शांति आती है।

तो सार ये है:
सृष्टि के शुरू में मादा के लिए लड़ना जैविक मजबूरी थी — जीन आगे बढ़ाने का तरीका। पर जैसे-जैसे इंसान समझदार हुआ, उसने देखा कि सहयोग से सबका फायदा है। आज भी कहीं-कहीं वो पुरानी आदत दिख जाती है, पर सभ्यता का मतलब ही है उस पशुता से ऊपर उठना।

इसीलिए बुद्ध, महावीर सबने कहा: काम को जीत लो, क्रोध को जीत लो। क्योंकि हम अब चिंपैंजी नहीं, इंसान हैं

इस विषय पर और गहराई में जाना चाहेंगे — जैसे “इंसान में एक-विवाह कैसे आया”?
चलिए समझते हैं इंसान में एक-विवाह यानी Monogamy कैसे आई — चिंपैंजी की लड़ाई से परिवार तक का सफर।


चिंपैंजी जैसे समाज में 2 बड़ी दिक्कतें थीं:

  • Infanticide: नया Alpha Male आते ही पुराने नर के बच्चों को मार देता था, ताकि मादा जल्दी फिर से बच्चे पैदा करे।
  • नर का समय लड़ाई में बर्बाद: सारा दिन यही टेंशन कि कौन मेरी मादा छीन ले। न शिकार, न बच्चों की देखभाल।

2. एक-विवाह के 3 बड़े कारण
कारण क्या हुआ फायदा
बच्चा कमजोर पैदा होना इंसान का दिमाग बड़ा होने लगा, पर माँ का Pelvis छोटा। नतीजा: बच्चा 9 महीने में अधपका पैदा होता है। 3-4 साल तक पूरी तरह माँ-बाप पर निर्भर। अकेली माँ नहीं पाल सकती थी। जो नर साथ रुककर खाना लाता, सुरक्षा देता — उसका बच्चा बचता। “पिता” का रोल शुरू हुआ।
खाना बाँटना 20 लाख साल पहले आग आई। नर शिकार करके लाता, मादा कंद-मूल इकट्ठा करती। शाम को आग के पास बैठकर बाँटकर खाते। जोड़े में रहने से दोनों का पेट भरता। लड़ने वाले नर भूखे मरते।
टेस्टोस्टेरोन कम होना जीवाश्म बताते हैं 2 लाख साल पहले नर का चेहरा पतला हुआ, Canine दाँत छोटे हुए। यानी आक्रामकता कम हुई। कम लड़ाई = ज्यादा दोस्ती = बड़े समूह बन सके। बड़े समूह शेर से बचते, बेहतर शिकार करते।
3. “Pair Bonding” का केमिकल
वैज्ञानिकों ने देखा कि इंसान के दिमाग में Oxytocin और Vasopressin हॉर्मोन ज्यादा बनते हैं। इन्हें “Love Hormone” कहते हैं।

  • बच्चा होने पर माँ-बाप दोनों में ये बढ़ता है → बच्चे से लगाव
  • पति-पत्नी साथ रहने से भी बढ़ता है → अटैचमेंट
    यही केमिकल हमें “अपना परिवार” की फीलिंग देता है। चिंपैंजी में ये बहुत कम है।

4. समाज और संस्कृति ने पक्का किया
एक-विवाह सिर्फ जीव-विज्ञान नहीं, नियम से भी आया:

  • झगड़ा रुका: सबको पता है मेरी पत्नी/पति कौन है, तो लड़ाई कम। पूरा गाँव शांति से रहता।
  • संपत्ति का बँटवारा: खेती 10 हजार साल पहले शुरू हुई। अब ज़मीन, घर था। बाप को गारंटी चाहिए कि मेरी मेहनत मेरे ही बच्चे को मिले। इसलिए शादी-सात फेरे जैसे रिवाज बने।
  • धर्म ने समर्थन दिया: बुद्ध ने “कामेसु मिच्छाचारा वेरमणी” — व्यभिचार मत करो, पंचशील में डाला। गीता, बाइबिल, कुरान — सबने एक-पत्नी व्रत को आदर्श माना।

5. तो क्या इंसान 100% Monogamous है?
पूरी तरह नहीं। जीव-विज्ञान कहता है इंसान “Socially Monogamous” है — यानी समाज में जोड़ा बनाकर रहते हैं, पर मौके पर धोखा भी हो जाता है। DNA टेस्ट बताते हैं 1-3% बच्चे Biological पिता से अलग होते हैं।

पर चिंपैंजी से तुलना करें तो फर्क साफ है: वहाँ 1 Alpha Male के 80% बच्चे, बाकी नर खाली हाथ। इंसान में 90% नर को साथी मिल जाता है।

बुद्ध से जोड़ें तो:
चिंपैंजी वाली प्रवृत्ति = काम तृष्णा। एक-विवाह = संयम। बुद्ध ने कहा काम को दबाओ नहीं, समझो। जब नर-नारी वासना से नहीं, मैत्री-करुणा से जुड़ें, तो गृहस्थ जीवन भी तपस्या बन जाता है। इसीलिए बुद्ध के कई गृहस्थ शिष्य भी निर्वाण को पाए।

सार: लड़ाई से परिवार तक का सफर 60 लाख साल का है। कमजोर बच्चा, आग, बड़ा दिमाग और प्यार के हॉर्मोन ने हमें लड़ाकू नर से जिम्मेदार पिता बना दिया

अब बताइए, आज के समय में रिश्तों में स्वार्थ क्यों बढ़ रहा है — इस पर बात करें?

मंत्र-विवाह-संस्कार की शुरुआत इसी “लड़ाई से परिवार” तक के सफर से जुड़ी है।

मंत्र क्यों शुरू हुए? 3 बड़े कारण:

1. जोड़े को बाँधने के लिए — “Promise को पक्का करना”
जब इंसान ने देखा कि लड़ाई से नहीं, एक साथ रहने से फायदा है, तो सवाल आया: गारंटी क्या है कि ये नर भागेगा नहीं? मादा धोखा नहीं देगी?
समाधान: पूरे गाँव के सामने, आग को साक्षी मानकर, मंत्र पढ़े गए।

“गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं” — मैं तुम्हारा हाथ सौभाग्य के लिए पकड़ता हूँ — ऋग्वेद
मंत्र + समाज + आग = टूटना मुश्किल। ये सबसे पहला “Contract” था। स्वार्थ पर लगाम।

2. दिमाग को समझाने के लिए — “पशुता से ऊपर उठना”
बुद्ध से हज़ारों साल पहले भी ऋषियों ने देखा कि आदमी के अंदर चिंपैंजी वाला “काम-क्रोध” अभी जिंदा है। सिर्फ डर से वो रुकेगा नहीं।
समाधान: मंत्र से बार-बार याद दिलाना।

  • “कामेसु मिच्छाचारा वेरमणी” — व्यभिचार नहीं करूँगा। बुद्ध ने पंचशील में डाला।
  • “मातृवत् परदारेषु” — दूसरे की पत्नी को माँ समान समझो।
    रोज मंत्र जपो तो दिमाग की Wiring बदलती है। Science कहती है इसे Neuroplasticity। स्वार्थ घटता है।

3. ऊर्जा को बदलने के लिए — “लड़ाई की ताकत को तपस्या में लगाना”
नर में जो ताकत मादा के लिए लड़ने में लगती थी, वो अब बेकार बैठे तो घर में क्लेश करती।
समाधान: उस ऊर्जा को मंत्र-जप, यज्ञ, ध्यान में लगा दो।

  • पति-पत्नी साथ गायत्री मंत्र जपें → Oxytocin बढ़े → लगाव बढ़े
  • “ॐ” का उच्चारण → दिमाग शांत → क्रोध, स्वार्थ कम
    इसीलिए गृहस्थ के लिए भी 40 संस्कार बनाए गए — गर्भाधान से अंत्येष्टि तक। हर कदम पर मंत्र, ताकि जीवन पशु न रहे, यज्ञ बन जाए।

सीधा कनेक्शन देखिए:
चिंपैंजी युग मंत्र के बाद इंसान युग
ताकत से मादा छीनो मंत्र से वचन दो “धर्मे च अर्थे च कामे च”
बच्चा मार दो मंत्र पढ़कर “संतान के लिए” जोड़ा बनो
सिर्फ “मेरा” “वसुधैव कुटुम्बकम्” — सब अपना
बुद्ध ने भी यही किया
बुद्ध ने पुराने कर्मकांडी मंत्र हटा दिए, पर नया मंत्र दिया: “बुद्धं सरणं गच्छामि”। क्यों? क्योंकि इंसान को सहारा चाहिए। जब स्वार्थ उठे, तो मंत्र याद आए: “मैं बुद्ध की शरण में हूँ, मुझे करुणा रखनी है”।


सृष्टि के शुरू में जो लड़ाई थी, उससे बचने के लिए समाज ने 3 हथियार बनाए — कानून, परिवार, और मंत्र। मंत्र सबसे सूक्ष्म हथियार है — वो सीधा मन पर वार करता है, जहाँ स्वार्थ पैदा होता है।

इसीलिए शादी में आज भी 7 फेरे और मंत्र हैं। बिना मंत्र के कोर्ट मैरिज भी हो जाती है, पर मंत्र वाला रिश्ता दिल को बांधता है।

1. बौद्ध मंत्र: “बुद्धं सरणं गच्छामि”
मतलब: मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ।
कब जपें: जब स्वार्थ, क्रोध, डर लगे।
असर: “अप्प दीपो भव” याद आता है। मन कहता है — शांत हो जा, तू खुद अपना रास्ता है। चिंपैंजी वाली लड़ाई से ऊपर उठो।

2. वैदिक मंत्र: “ॐ शांति शांति शांति:”
मतलब: शरीर में शांति, मन में शांति, दुनिया में शांति।
कब जपें: जब घर में क्लेश हो, टेंशन हो।
असर: 3 बार “शांति” बोलते ही सांस धीमी होती है। Science कहती है ॐ की ध्वनि से Vagus Nerve शांत होता है — गुस्सा कम।

3. गृहस्थ के लिए: “सर्वे भवन्तु सुखिनः”
मतलब: सभी सुखी हों, सभी रोग-मुक्त हों।
कब जपें: जब “मेरा-मेरा” बहुत हो जाए।
असर: स्वार्थ से मैत्री की तरफ ले जाता है। बुद्ध की “मेट्टा भावना” यही है। पत्नी-पति साथ बोलें तो झगड़ा खत्म।

4. सबसे छोटा: “सोऽहम्”
मतलब: वो ब्रह्म मैं हूँ। मैं अलग नहीं हूँ।
कब जपें: जब अकेलापन लगे, “मैं ही क्यों” लगे।
असर: “मैं-मेरा” का भ्रम टूटता है। बुद्ध का अनत्ता सिद्धांत यही है — अलग “मैं” है ही नहीं। अहंकार गलता है।

5. मन को तुरंत रोकने वाला: “नमो अरिहंताणं” — जैन नवकार मंत्र की पहली लाइन
मतलब: अरिहंतों को नमस्कार।
कब जपें: जब काम-वासना-क्रोध एकदम उठे।
असर: महावीर ने भी वही देखा जो बुद्ध ने — स्वार्थ = दुःख। ये मंत्र ब्रेक की तरह काम करता है।



रात सोने से पहले 11 बार “बुद्धं सरणं गच्छामि, धम्मं सरणं गच्छामि, संघं सरणं गच्छामि” बोलकर सोइए।
15 दिन में फर्क दिखेगा — गुस्सा कम, नींद गहरी, सपने अच्छे। क्योंकि ये तीन शरण स्वार्थ की तीनों जड़ — लोभ, द्वेष, मोह — को काटती हैं।

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