भारत में तथाकथित “सामाजिक न्याय” का अर्थ है — “सनातन धर्म” यानि हिन्दुत्व का सम्पूर्ण नाश —
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इस का लक्ष्य सबसे पहिले ब्राह्मणों की संस्था को नष्ट करना है। हिन्दू धर्म की रक्षा ब्राह्मणत्व कर रहा है, जब ब्राह्मणत्व ही नष्ट हो जाएगा, तो सनातन धर्म भी नष्ट हो जाएगा। इस कार्य का आरंभ कई सौ वर्ष पूर्व गोवा में सेंट फ्रांसिस जेवियर्स और बाकी के भारत में अंग्रेज़ पादरियों ने किया। उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेज़ पादरियों ने भारत का झूठा इतिहास लिखना आरंभ किया।
उन्होंने वर्ण व्यवस्था के “शूद्र” शब्द को दलित से जोड़ा फिर भारत के अन्य पिछड़े हुओं से। यहीं से सामाजिक न्याय की बात शुरू हुई। भारत के हिन्दू वेश और हिन्दू नामधारी दो कट्टर ईसाईयों — राजा राममोहन राय और ज्योतिबा फूले को उन्होंने अपना मोहरा बनाया और झूठा इतिहास लिखा, जिसमें सारा दोष ब्राह्मणों पर डाल दिया गया। अंग्रेजों ने बड़ी कुटिलता से दलित को शूद्र से, और अनार्य को दलित से जोड़ दिया।
इस प्रकार झूठे इतिहास में उन्होने दलितों को सताने का पाँच हज़ार वर्ष पुराना झूठा इतिहास बना दिया। अंग्रेजों के वेतनभोगी पादरियों ने संस्कृत का अध्ययन कर हिन्दू ग्रन्थों से छेड़छाड़ की और पवित्र ग्रंथ मनुस्मृति को भी प्रक्षिप्त कर उसे दलित विरोधी बना दिया।
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उन्होने यह बात छिपा दी कि मैला (मनुष्य का मल) उठाने का काम मुस्लिम आक्रांताओं ने शुरू करवाया था। वे जिस भी क्षत्रिय जाति को हराते उसे अपने आधीन कर अपना मल उठाने को बाध्य कर देते। अंग्रेजों ने हजारो भारतीय बुनकरों के अंगूठे या हाथ काट कर भारत के कपड़ा उद्योग को नष्ट कर भारत में अपने कपड़ों का बाजार बनाया। इस तथ्य का प्रतिकार करने के लिए उन्होंने एकलव्य के अँगूठा काटने की कहानी प्रचलित की। गोवा में हथकट्टा खंभा आज भी खड़ा है, उसकी क्रूर कहानी प्रचारित नहीं होने दी गई। हिदुओं को उस खंबे का आलिंगन करने को कहा जाता और ईसाई मत स्वीकार न करने पर उनके हाथ काट दिये जाते। गोवा में हजारों ब्राह्मण महिलाओं को केवल इसीलिए जीवित जला दिया गया क्योंकि उन्होने मरना स्वीकार किया लेकिन ईसाई बनना स्वीकार नहीं किया। ब्राह्मण महिलाओं को नग्न कर उनके स्तनों को सँड़ासी से पकड़ कर गोआ के गावों में पुर्तगालियों द्वारा घुमाया जाता और घोषणा की जाती कि गाँव के लोग यदि ईसाई नहीं बने तो इस महिला को जिंदा जला दिया जाएगा। इस डर से भी अनेक लोग ईसाई बन जाते।
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अंग्रेजों ने तो बाकायदा दो-तीन अंग्रेज़ सैनिक अधिकारियों को भारत में इसी लिए बुलाया था कि वे सारे भारतीयों की हत्या कर दें, और इस भूमि को केवल अंग्रेजों के लिए ही छोड़ दें जैसा कि उन्होने दोनों अमेरिकी महाद्वीपों और आस्ट्रेलिया में किया था। उन सैन्य अधिकारियों ने बिहार और उत्तर प्रदेश में करोड़ों भारतीयों की हत्या भी की और अंततः इस कार्य को असंभव बताया। इनमें से एक तो हत्यारा था ब्रिगेडियर जनरल जेम्स जॉर्ज स्मिथ नील। दो हत्यारे अंग्रेज़ सैनिक अधिकारी और भी थे। इन तीनों के सम्मान में इनके नाम पर अंडमान द्वीप समूह में तीन द्वीपों के नाम भी रखे गए थे। अंग्रेज़ और पुर्तगाली दोनों संबंधी हैं। एक पुर्तगाली राजकुमारी का विवाह अंग्रेज़ राजा से हुआ था तो पुर्तगाल ने दहेज में मुंबई अंग्रेजों को भेंट में दी। हमें सही इतिहास नहीं पढ़ाया जाता। हमें वही पढ़ाया जाता है जो मैकाले, जेवियर, विदेशी विधर्मी और कामरेड पढ़ाना चाहते थे।
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यह भी नहीं पढ़ाया जाता कि गांधीवध के दूसरे दिन ही पुणे में लगभग दस हजार ब्राह्मणों की हत्या कर दी गयी थी। पुणे के आसपास के नगरों में भी हजारों ब्राह्मणों का नर संहार हुआ। कभी भी कोई FIR इस बारे में नहीं लिखी गयी। कश्मीर में भी लाखों ब्राह्मणों की हत्या की गयी लिकिन कभी भी आज तक कोई FIR नहीं लिखी गयी। ये हत्यारे कौन थे? इनकी खोज आजतक नहीं की गई। अब यह मांग की जा रही है कि ब्राह्मणों को अपनी बेटियाँ दलितों के साथ व्याहनी चाहिए ताकि ब्राह्मणों का जन्म ही न हो। कल को सामाजिक न्याय के नाम पर ऐसा कानून बन भी सकता है।
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सभी वर्णों को चाहिए कि वे अपने धर्म पर अडिग रहें। वर्णाश्रम धर्म पूर्णतः वैज्ञानिक है। रही बात जातिप्रथा की, वह तो रहेगी। जातिवाद गलत है, लेकिन जातिप्रथा नहीं। दोनों में बहुत अंतर है। जातिगत आरक्षण गलत है। इसकी मैं निंदा करता हूँ। आजकल सामाजिक न्याय के नाम पर जो अधर्म हो रहा है, उसकी भी मैं निंदा करता हूँ। किसी भी तरह का आरक्षण नहीं होना चाहिए।
ॐ तत् सत् !!
३० अगस्त २०२६















