करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥
भावार्थ :
इस श्लोक में भगवान शिव के उस अद्भुत और उग्र स्वरूप का वर्णन है, जिनके ललाट पर प्रचण्ड अग्नि धधक रही है और जिनकी अग्नि ने कामदेव के पाँच बाणों के प्रभाव को भी भस्म कर दिया है।
वे त्रिलोचन महादेव, पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती के वक्षस्थल पर सुंदर चित्रकारी करने वाले अद्वितीय शिल्पी के समान हैं।
कवि की प्रार्थना है कि ऐसे परम तेजस्वी, काम-विजयी, त्रिनेत्रधारी और माता पार्वती के प्रिय भगवान शिव के चरणों में मेरा मन सदैव अनुरक्त रहे;
अर्थात सांसारिक कामनाओं से ऊपर उठकर मेरा चित्त, उस परम चेतना में स्थिर हो, जहाँ शक्ति और शिव का दिव्य मिलन सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है।
ॐ नमः शिवाय🙏















