दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से बने लगभग हर संवेदनशील रेडिएशन डिटेक्टर के लिए ऐसे स्टील का इस्तेमाल किया जाता है जो पहले परमाणु परीक्षण से पहले डूबे जहाजों से निकाला गया हो।
ऐसा इसलिए है क्योंकि वैज्ञानिकों का मानना है 1945 के बाद पिघलाई गई हर चीज की बनावट में परमाणु युग के हल्के निशान रह जाते हैं और युद्ध से पहले के मलबे की सप्लाई सीमित है। दरअसल यह पूरा मामला ‘लो-बैकग्राउंड स्टील’ से जुड़ा हुआ है। ये ज्ञान-विज्ञान की दुनिया में यह एक बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक विषय है।
दरअसल जब पहला परमाणु बम का परीक्षण हुआ और फिर उसका इस्तेमाल किया गया तो उसने सिर्फ न्यूक्लियर युग की ही शुरुआत नहीं की। बल्कि वैज्ञानिकों का कहना है कि इसने वातावरण में एक स्थायी रेडियोएक्टिव निशान छोड़ दिया जो उसके बाद बने स्टील के हर बैच में शामिल हो गया। रेडिएशन डिटेक्टर बनाने वाले वैज्ञानिकों को समुद्र की तलहटी में पड़े युद्धपोतों से ऐसा मेटल निकालना पड़ा जो रेडिएशन से दूषित न हुआ हो। लेकिन दिक्कत ये है कि आखिर समुद्र में उतने स्टील कहां से आएंगे जो पहले विश्वयुद्ध के समय के हों। इसीलिए वैज्ञानिकों में पुराने स्टील को ‘चुराने’ की रेस लगी है।












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