बेद//मनुष्य सीमित ज्ञान वाला है, इसलिए वह ऐसा सार्वभौमिक और त्रुटिरहित धर्मशास्त्र नहीं बना सकता। वेद धर्म का प्रमाण हैं _मनीष चन्द्र पाण्डे अयोध्या उत्तरप्रदेश

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वेद अपौरुषेय हैं……
अर्थात् उनका रचनाकार कोई मनुष्य, देवता या सीमित व्यक्तित्व नहीं है। यह केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, विशेषकर पूर्व मीमांसा और वेदांत का एक गहन दार्शनिक सिद्धांत है।

अपौरुषेय का अर्थ
अपौरुषेय = अ (नहीं) + पौरुषेय (पुरुष द्वारा रचित)

अर्थात् वेद किसी व्यक्ति द्वारा लिखे या बनाए नहीं गए, बल्कि वे अनादि, नित्य और ईश्वर के शाश्वत ज्ञान का प्रकाश हैं। ऋषियों ने उन्हें बनाया नहीं, बल्कि दिव्य अनुभूति में “देखा” (दृष्ट)। इसलिए उन्हें मंत्रद्रष्टा ऋषि कहा गया है, मंत्रकर्ता नहीं।

पूर्व मीमांसा के आचार्य जैमिनि और कुमारिल भट्ट के अनुसार….

मनुष्य सीमित ज्ञान वाला है, इसलिए वह ऐसा सार्वभौमिक और त्रुटिरहित धर्मशास्त्र नहीं बना सकता। वेद धर्म का प्रमाण हैं, और यदि वे किसी मनुष्य की रचना होते, तो उनमें भ्रम, पक्षपात या अज्ञान की संभावना होती।

इसलिए वेद का प्रमाण तभी पूर्ण माना जा सकता है जब वे अपौरुषेय हों।

शब्द की नित्यता …

मीमांसा का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है कि शब्द नित्य है।

तर्क यह है….
ध्वनि उत्पन्न होकर नष्ट होती है,लेकिन शब्द का स्वरूप और अर्थ-संबंध शाश्वत है।

जैसे गणित के नियम किसी व्यक्ति के बनाने से नहीं बनते, केवल खोजे जाते हैं; उसी प्रकार वैदिक सत्य भी खोजे गए हैं, बनाए नहीं गए।

ऋषि “द्रष्टा” थे…..

ऋग्वेद और वैदिक परंपरा में ऋषियों को मंत्रद्रष्टा कहा गया है।

अर्थात् उन्होंने तप, समाधि और आत्मानुभूति द्वारा उन मंत्रों का साक्षात्कार किया। वे लेखक नहीं, बल्कि सत्य के साक्षी थे।

उपनिषदों का समर्थन …..

बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया है:

“अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः।”

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद परम ब्रह्म के निःश्वास (स्वाभाविक प्रकट होने वाले ज्ञान) के समान हैं।

यह संकेत करता है कि वेद किसी मानव की रचना नहीं, बल्कि ब्रह्म से प्रकट शाश्वत ज्ञान हैं।

भगवद्गीता ……

भगवद्गीता (15.15):

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः।

सभी वेदों का लक्ष्य परमात्मा का ज्ञान है। गीता वेदों को ईश्वर से संबद्ध शाश्वत ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करती है।

वेदांत …..

वेदांत मानता है कि प्रत्येक सृष्टि-चक्र के आरंभ में ईश्वर वही शाश्वत वेदज्ञान पुनः प्रकट करते हैं। इसलिए वेद अनादि हैं, यद्यपि उनका प्राकट्य प्रत्येक कल्प में होता है।

अतः वेदों के अपौरुषेय होने का आधार इन सिद्धांतों पर टिका है:

वेद किसी मनुष्य की रचना नहीं, बल्कि ऋषियों द्वारा अनुभूत शाश्वत सत्य हैं। धर्म का अंतिम प्रमाण तभी विश्वसनीय है जब वह मानवीय सीमाओं से परे हो।

वैदिक शब्द और उनका अर्थ-संबंध नित्य माने जाते हैं।

ऋषि रचनाकार नहीं, मंत्रद्रष्टा हैं।

वेद ईश्वर के शाश्वत ज्ञान का प्रकटीकरण हैं, न कि किसी ऐतिहासिक लेखक की पुस्तक।

जैसे गुरुत्वाकर्षण का नियम बनाया नहीं, बल्कि खोजा उसी प्रकार वैदिक परंपरा के अनुसार ऋषियों ने वेदों की रचना नहीं की, बल्कि उनका साक्षात्कार किया। यही “अपौरुषेय” सिद्धांत का मूल दार्शनिक आधार है।
~ॐ हरि ~

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