इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक, कर्मिक और ब्रह्मांडीय कारण थे।
अवतार का उद्देश्य और समय स, अभिमन्यु वास्तव में चन्द्रदेव के पुत्र ‘वर्चा’ के अवतार थे।
जब देवताओं ने द्वापर युग में धर्म की स्थापना के लिए चंद्रदेव से अपने पुत्र को पृथ्वी पर भेजने का अनुरोध किया, तो चंद्रदेव ने एक शर्त रखी थी। उन्होंने कहा था कि उनका पुत्र पृथ्वी पर केवल 16 वर्ष तक ही रहेगा और महाभारत युद्ध में अपना पराक्रम दिखाकर वापस लौट आएगा।
अभिमन्यु ने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया था, इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने काल (समय) के उस चक्र में हस्तक्षेप नहीं किया।
2. वंश की रक्षा (कुल का अंतिम दीपक)
महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद, अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को नष्ट करने के लिए उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र चला दिया था। उस समय परीक्षित पांडव वंश के एकमात्र जीवित उत्तराधिकारी बचे थे।
यदि परीक्षित की मृत्यु हो जाती, तो पांडवों का वंश समाप्त हो जाता और आने वाले युग (कलियुग) में धर्म को आगे बढ़ाने वाला कोई राजा नहीं बचता। वंश को जीवित रखना संसार के नियम और धर्म की स्थापना के लिए आवश्यक था, इसलिए श्रीकृष्ण ने सूक्ष्म रूप में उत्तरा के गर्भ में प्रवेश करके परीक्षित की रक्षा की।
3. कर्म और नियति का सिद्धांत
अभिमन्यु का चक्रव्यूह में वीरगति को प्राप्त होना महाभारत के युद्ध का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उनका बलिदान अर्जुन को उसके परम कर्तव्य की ओर ले जाने और अधर्मियों के विनाश को तेज करने के लिए आवश्यक था।
अभिमन्यु ने युद्ध के मैदान में एक योद्धा की तरह वीरगति प्राप्त की थी, जबकि गर्भ में पल रहे शिशु परीक्षित पर ब्रह्मास्त्र चलाना पूरी तरह से अधर्म और नियमों के विरुद्ध था। भगवान हमेशा अधर्म के विरुद्ध खड़े होते हैं, इसलिए उन्होंने वहां हस्तक्षेप किया।















