गति के लिए “चरण”
औरप्रगती के लिए “आचरण”
बहूत जरुरी हैआपसे मधूर संबंध हीहमारा सबसे बडा
धन हैउन संबंधोंको हमारानमन है
संबंध तो “सुदामा”
और”कृष्ण” जैसा होनाचाहिएएक ने कुछ मांगा नहीं,दूसरे नेसब कुछ दे के जतायानहीं।
निंदा ही इस संसार
का नियम हैं,जो भरपूर मिलेगी *प्रशंसा तो ज्यादातरलोग मजबूरी और स्वार्थमें करते हैं।
जिंदगी ने कुछ लेकर,तो कुछ देकर हमें”जीना” सिखाया है.
सब हमारा नहीं हैऔर
सब हमारे लिए नहीं है
ये सबक सिखाया है















