मंदिर कोई कंपनी नहीं, जिसे रिटायर अफसर चलाए – मंदिर हमारी आस्था है, इसे धर्माचार्य ही चलाएंगे!
आज देश के करोड़ों सनातनी एक ही सवाल पूछ रहे हैं –
आर्मी चीफ को मंदिर का CEO बनाने का क्या औचित्य है?
सनातन धर्म के सबसे बड़े आचार्य शंकराचार्य जी को क्यों नहीं?
आर्मी चीफ को मंदिर संचालित करने का क्या अनुभव है?
सेना के शौर्य को हम नमन करते हैं, उनका कार्य देश की सीमा की रक्षा है। पर मंदिर चलाना, मठ चलाना, परम्परा और पूजा-पद्धति चलाना – ये धर्म का विषय है, मैनेजमेंट का नहीं।
देश में चार शंकराचार्य हैं – यही सनातन धर्म के स्तंभ हैं। इनके पास हजारों मठ, मंदिर और गौशालाओं को चलाने का सदियों का अनुभव है।
फिर आज मंदिरों की जिम्मेदारी इन्हें क्यों नहीं दी जा रही? उनके अनुभव पर प्रश्न चिन्ह क्यों?
हमारी मांग स्पष्ट है:
देश के सभी प्रसिद्ध मंदिरों और मठों की जिम्मेदारी चारों शंकराचार्य जी की सर्वसम्मति से तय की गई व्यवस्था को सौंपी जानी चाहिए।
मंदिरों को किसी पार्टी का कार्यालय मत बनाइए।
मंदिरों का प्रबंधन सरकार या पार्टी नहीं, चारों शंकराचार्य तय करेंगे – तभी सनातन की गरिमा बचेगी।
क्या ये करोड़ों सनातनियों का अपमान नहीं है कि धर्माचार्यों को बाहर रखा जाए?
मैं पूज्य चारों शंकराचार्य जी के साथ हूँ।
ये लड़ाई किसी व्यक्ति की नहीं, करोड़ों सनातनियों के सम्मान की है।
जय सनातन! जय गौ माता!















