शरीर का अनुसरण करके वर्तमान में रहने का अभ्यास किया जा सकता है।शरीर जिस कार्य के लिए आया है उसे पूरा करने दीजिये- सचिदानंद पाठक

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“शरीर जिस कार्य के लिए आया है उसे पूरा करने दीजिये।
जैसे एक नाटक में एक अभिनेता उसका पार्ट अदा करता है बिना प्रेम अथवा घृणा के। “

  • श्री रमण महर्षि- *

हम दो तरह से साक्षी हो सकते हैं-
शरीर के व मन के।
मन का साक्षी होना मुश्किल है क्योंकि मन से चेतन स्वरूप हमारा तादात्म्य है तथा मन अपने विभाजित रुप(मैं और दूसरा) की जटिलता का खेल खेलता रहता है।
इसकी तुलना में शरीर का साक्षी होना ज्यादा सरल है।
इसे स्पष्ट करते हैं-
मन हमेशा वहाँ है, शरीर यहाँ है।
मन या तो कल में है, या कल में। भय, योजना, पछतावा – सब “वहाँ” का जाल है।
और जब मन आगे होता है, शरीर को “वहाँ” तक घसीटता है जो है ही नहीं। इसलिए शरीर थक जाता है, पर विश्राम नहीं मिलता। घसीटते-घसीटते ही पूरी जिंदगी पूरी हो जाती है।
शरीर हमेशा अभी, यहाँ है।
शरीर कभी कल में नहीं जाता, कभी वहाँ नहीं जाता। भूख अभी है, श्वास अभी है, कदम अभी है।
इसलिए जब हम शरीर के पीछे आते हैं, हम स्वत: “यहाँ” खिंच आते हैं।
मन का जाल “वहाँ” में फैलता है, “यहाँ” में नहीं फैल पाता।
यही तो विपश्यना का रहस्य है – श्वास हमेशा अभी-यहाँ है, इसलिए श्वास के पीछे आने से मन का “वहाँ वाला खेल” टूट जाता है।
शरीर के आगे रहने से शरीर को विश्राम नहीं,
शरीर के पीछे रहने से मन को जाल फैलाने को जगह नहीं।
और जहाँ मन का जाल नहीं, वहीं विश्राम पूर्ण है।”
दो स्थिति हो सकती है-
हम आगे, शरीर पीछे।
शरीर आगे, हम पीछे।
अहंकार माया से मोहित होकर हम कर्ताभोक्ता की तरह जीते हैं।
हम हमेशा आगे रहते हैं और शरीर का साधन की तरह इस्तेमाल करते हैं।
शरीर को हमारे पीछे घिसटना पडता है।
महर्षि ने इसे बदल दिया। वे कहते हैं-
” शरीर जिस कार्य के लिए आया है उसे पूरा करने दो।”
पहले हम स्वामी थे, शरीर सेवक।
अब शरीर स्वामी है, हम उसके पीछे।
शरीर भी उसकी मर्जी से कुछ नहीं कर रहा। उसका भी अपना प्रारब्ध है या ईश्वर की लीला में उसका नियोजित स्थान।
बिना शरीर के क्या हो सकता है लेकिन अब वह
हमारे लिए साध्य हो गया, हम साधन बन गये।
अब प्रारब्धानुसार शरीर जो भी करे हमें उसका अनुसरण करते हुए उसके साथ रहना होगा।
पहले पीछे, फिर साथ में,
इसके बाद केवल शरीर रह जाय उसके प्रारब्ध के साथ जिसे ईश्वर की लीला कहा जा सकता है।
आत्मा का कोई प्रयोजन नहीं है। न वह बद्ध है, न मुक्त।
वह है मात्र।
इसी तरह शरीर भी है मात्र।
लेकिन अभी हम मौजूद हैं शरीर का उपयोग करते हुए।
शरीर हमसे बंधा हुआ नहीं है, वह उसके प्रारब्ध से बंधा हुआ है।
मेरा आध्यात्मिक साथी कहता-“शरीर तो संत है। वह स्वयं कुछ भी नहीं करता। “
हम शरीर का अनुसरण करते हुए शरीर के साथ रहें तो क्या होगा?
हम भी ठहर जायेंगे।
शरीर स्वयं कुछ भी नहीं करता।
हम कुछ न करें तो वह ठहरा हुआ ही है।
हम उसका अनुसरण करके ठहर जाते हैं।
शरीर कब तक ठहरेगा?
वह हिलेगा डुलेगा, हम भी उसके साथ रहना है इसलिए हिलेंगे डुलेंगे।
शरीर खडा होगा तो हम भी उसका अनुसरण करके उसके साथ खड़े होंगे।
शरीर चलेगा तब साथ साथ हम भी चलेंगे।
ऐसा करने से मन अभी यहाँ रहना सीखेगा
बजाय तब वहाँ रहने के।
अभी यहाँ सत्य विद्यमान है इसलिए मन विलीन होने लगता है, सत्य प्रकट होने लगता है।
शरीर के साथ रहने से यह संभव है। शरीर कभी भूत भविष्य में नहीं रहता।
यह समस्या मन के साथ है, न कि शरीर के साथ।
शरीर का अनुसरण करके वर्तमान में रहने का अभ्यास किया जा सकता है।
कुछ लोग कह सकते हैं-
उन्हें कई जरुरी काम करने होते हैं। इससे तो फिर कुछ नहीं हो सकता। शरीर स्वयं तो कुछ करेगा नहीं, हमें भी ठहर जाना पडेगा।
लेकिन यह भी तो सही है कि ठहरने वाला, सत्य से जुड जाता है। सत्य की अपनी गहरी प्रज्ञा है।
इसीलिए ऐसे लोग बहुत बडे पदों पर आसीन होते हैं जहाँ महत्वपूर्ण निर्णय लेने होते हैं।
वह निर्णय शक्ति उनके भीतर की गहराई से आती है।
मन या मन से निर्मित नकली मैं (फेक आई) तो बडा स्वार्थी है, लोभी है। वह हमेशा आगे दौडता है।
शरीर पीछे घिसटता है।
आत्मा(स्व, सेल्फ) के साथ रहे तो और बात है।
यह न हो सके तो शरीर के साथ तो रहे।
दिन भर न रह सके तो घंटे भर तो साथ रहे।
यह ध्यान हो जायेगा।
शरीर स्वत: जो भी करे उसका अनुसरण करके उसके साथ रहने का ध्यान।
सब कुछ बदलने लगेगा।
हम बोलते है तो अहंभाव से, कर्ताभाव से बेहोश होकर बोलते है।
अब हमने सजग होकर इसे बदला।
यह परिवर्तन किया कि जब शरीर बोलेगा तब हम उसका अनुसरण करके उसके साथ बोलेंगे।
शरीर स्वयं क्या बोलेगा, वह तो मौन ही रहेगा।
वाणी का दुरूपयोग बंद हो जायेगा।
इसी तरह शरीर के देखने के साथ हम देखेंगे, शरीर के सुनने के साथ हम सुनेंगे।
शरीर के अनुभव करने के साथ हम अनुभव करेंगे।
शरीर का मान अपमान भी तो होता है।
शरीर कोई प्रतिक्रिया नहीं करता। हम उसके साथ हैं-
अविभाजित, अखंड, प्रतिक्रिया रहित।
अहंकार के लिए कहा जाता है- वह, बिना आधार के नहीं रह सकता।
वह स्व के आधार पर न रहे तो शरीर के आधार पर तो रहे।
मन अर्थात ‘पर’ के आधार पर रहने में तो बखेडे ही बखेडे हैं।
सारी सुखदुख, मान अपमान की समस्या, संघर्ष “परनिर्भरता” के कारण ही तो है।
जाको कछु न चाहिये सो जग साहंसाह।
ऐसे लोग तो कुछ एक ही होते हैं।
बेशक शरीर उसका प्रारब्ध पूरा करके मिट जायेगा लेकिन जब तक वह है वह हमारी आध्यात्मिक साधना का बडा कीमती, बडा अनमोल आधार है। इसके साथ रहने में बडा हित है।
यह प्रकृति/परमात्मा का सुंदरतम उपहार है।
हम रहते हैं मन माया के साथ।
कृष्ण साफ चेताते हैं-
‘माया को तरना बेहद मुश्किल है। ‘
इसके लिए सत्संग चाहिए।
” दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। “