आज की कहानी
करोड़ों की दौड़ और खोया हुआ सुकून
दिल्ली के एक छोटे से मोहल्ले में सोहन नाम का एक युवक रहता था। उसके पिता रिक्शा चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे और उसकी माँ घरों में काम करती थीं। घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी, लेकिन सोहन के सपने बहुत बड़े थे। वह चाहता था कि एक दिन वह इतना सफल बने कि उसके परिवार को कभी किसी चीज़ की कमी न रहे।
हर रविवार सोहन एक सामाजिक सेवा संस्था में जाकर निःस्वार्थ भाव से काम करता था। वहाँ एक अनुभवी और आदरणीय मार्गदर्शक, विवेक जी, युवाओं को जीवन के मूल्य और सफलता का सही अर्थ समझाते थे। सोहन अक्सर उनसे कहता, “सर, मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मैं बहुत बड़ा बिज़नेसमैन बनूँ, खूब पैसा कमाऊँ और अपने परिवार की सारी परेशानियाँ दूर कर दूँ।”
एक दिन विवेक जी ने मुस्कुराते हुए पूछा, “सोहन, क्या तुम यहाँ सेवा केवल अमीर बनने की इच्छा से करते हो?”
सोहन ने बिना किसी झिझक के उत्तर दिया, “जी सर। मैं गरीबी से तंग आ चुका हूँ। मेरी सबसे बड़ी इच्छा यही है कि मैं बहुत धन कमाऊँ और अपने परिवार को हर सुख दूँ।”
विवेक जी ने शांत स्वर में कहा, “मेहनत करते रहो। अवसर अवश्य मिलेगा। लेकिन याद रखना, जब सफलता मिले तो अपने जीवन का संतुलन कभी मत खोना।”
समय बीतता गया। सोहन ने एक छोटा-सा ऑनलाइन व्यापार शुरू किया। उसने दिन-रात मेहनत की, नई-नई बातें सीखीं और कभी हार नहीं मानी। धीरे-धीरे उसका व्यापार बढ़ता गया। कुछ ही वर्षों में उसकी कंपनी करोड़ों रुपये की हो गई। अब उसके पास आलीशान घर, महँगी गाड़ियाँ, नाम, प्रतिष्ठा और अपार धन था।
लेकिन सफलता की इस दौड़ में उसने बहुत कुछ खो दिया था। माता-पिता के साथ बैठकर बातें करने का समय नहीं था। पुराने मित्र दूर हो गए। समाज सेवा पूरी तरह छूट गई। सुबह से रात तक केवल मीटिंग, मोबाइल और व्यापार ही उसकी दुनिया बन गए।
एक रात देर तक काम करते हुए अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई। डॉक्टर ने जाँच के बाद कहा, “आपके शरीर से ज़्यादा आपका मन थक चुका है। आपको आराम, परिवार और मानसिक शांति की आवश्यकता है।”
डॉक्टर की बात सुनते ही सोहन को वर्षों पहले विवेक जी की सीख याद आ गई।
अगले ही रविवार वह उसी सेवा संस्था पहुँचा। वहाँ सब कुछ पहले जैसा ही था। उसने बिना कुछ कहे झाड़ू उठाई और पूरे मन से सफ़ाई करने लगा।
कुछ देर बाद विवेक जी वहाँ आए। उन्होंने मुस्कुराकर पूछा, “कैसे हो सोहन? सुना है अब तुम बहुत बड़े उद्योगपति बन गए हो।”
सोहन की आँखें भर आईं। वह बोला, “सर, मैंने वह सब पा लिया जिसके लिए कभी आपके पास आता था। धन मिला, सम्मान मिला, सफलता मिली, लेकिन मन का सुकून कहीं खो गया। अब समझ आया कि सबसे बड़ी गरीबी पैसों की नहीं, बल्कि मन की शांति की होती है।”
विवेक जी मुस्कुराए और बोले, “बेटा, तुमने मुझसे सफलता माँगी थी, शांति नहीं। इसलिए तुम्हें वही मिला जो तुमने माँगा था।”
यह सुनकर सोहन भावुक हो गया। वह विवेक जी के चरणों में बैठ गया और बोला, “सर, अब मुझे धन, प्रसिद्धि या कोई और इच्छा नहीं चाहिए। बस मुझे फिर से सेवा करने दीजिए। इस बार किसी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि अपने मन की शांति के लिए।”
विवेक जी ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “याद रखना, जो सेवा किसी स्वार्थ से की जाती है, उसका फल सीमित होता है। लेकिन जो सेवा निःस्वार्थ भाव से की जाती है, वही मन को सच्ची शांति देती है। पैसा जीवन को सुविधाएँ दे सकता है, पर मन की शांति, परिवार का प्रेम और दूसरों के लिए जीने का आनंद केवल सेवा और संतुलित जीवन से मिलता है।”
उस दिन के बाद सोहन ने अपने जीवन की दिशा बदल दी। उसने व्यापार जारी रखा, लेकिन परिवार के लिए समय निकालना शुरू किया। हर सप्ताह समाज सेवा करने लगा, गरीब बच्चों की शिक्षा का खर्च उठाया और अपने कर्मचारियों के जीवन को बेहतर बनाने का संकल्प लिया।
धीरे-धीरे उसके चेहरे पर वही मुस्कान लौट आई, जिसे करोड़ों रुपये भी कभी नहीं खरीद सके थे।
शिक्षा:
धन कमाना गलत नहीं है, लेकिन यदि धन कमाने की दौड़ में मन की शांति, परिवार, रिश्ते और सेवा-भाव खो जाएँ, तो वह सफलता अधूरी है। सच्चा सुख निःस्वार्थ सेवा, संतोष और जीवन के संतुलन में ही छिपा है।
जय श्री राम
डॉ.विशाल जोशी
सदैव प्रसन्न रहिये!!
जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!















