लक्ष्मी इंदिरा पांडा ओडिशा की वो वीरांगना थीं जिन्हें “ओडिशा की झाँसी की रानी” भी कहा जाता है
1. कौन थीं लक्ष्मी इंदिरा पांडा?
- जन्म: लगभग 1930, रंगून, बर्मा [अब म्यांमार] के पास
- मृत्यु: 7 अक्टूबर 2008, AIIMS दिल्ली
- पहचान: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की INA में शामिल होने वाली इकलौती ओड़िया महिला f18e
2. आजादी की लड़ाई में योगदान
- मात्र 14 साल की उम्र में INA की रानी झाँसी रेजिमेंट में शामिल हो गई थीं
- कैप्टन लक्ष्मी सहगल और नेताजी के साथ बर्मा में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ीं
- INA की सबसे कम उम्र की सदस्यों में से एक थीं f18e1794
3. संघर्ष और सम्मान
- भूली-बिसरी हीरोइन: आजादी के बाद उनके बारे में बहुत कम लोगों को पता था।
- 2007 में इतिहासकार अनिल धीर ने रिसर्च के दौरान उनका नाम ढूंढा
- जीवन के आखिरी दिनों में घरेलू नौकरानी का काम करती थीं और ओडिशा स्वतंत्रता सेनानी पेंशन के लिए संघर्ष कर रही थीं
- 25 अक्टूबर 2008 को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उन्हें “राष्ट्रीय स्वतंत्रता सैनिक सम्मान” दिया
- ओडिशा सरकार ने जयपुर में उनकी मूर्ति लगाने की घोषणा की 1794f18e
4. अंत
- 7 अक्टूबर 2008 को लंबी बीमारी के बाद AIIMS दिल्ली में निधन हुआ
- ओडिशा पुलिस ने राजकीय सम्मान और गार्ड ऑफ ऑनर के साथ अंतिम संस्कार किया f18e
लक्ष्मी इंदिरा पांडा की कहानी याद दिलाती है कि आजादी के लिए सिर्फ बड़े नेता ही नहीं, 14 साल की बच्चियों ने भी जान दांव पर लगाई थी।

लक्ष्मी इंदिरा पांडा और रानी झाँसी रेजिमेंट की कहानी सीधी दिल छू लेने वाली है।
1. INA में एंट्री कैसे हुई?
14 साल की उम्र में लक्ष्मी बर्मा में रहती थीं।
1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने रानी झाँसी रेजिमेंट बनाई — ये पूरी तरह महिलाओं की फौज थी।
उद्देश्य था: “आजादी की लड़ाई में महिलाएं भी कंधे से कंधा मिलाकर लड़ें”।
लक्ष्मी ने नेताजी का भाषण सुना और घर छोड़कर INA जॉइन कर ली।
उन्होंने खुद कहा था: “मुझे लगा अगर मैं नहीं लड़ी तो मेरे देश को आजादी नहीं मिलेगी”।
2. रानी झाँसी रेजिमेंट में क्या करती थीं?
- ट्रेनिंग: बंदूक चलाना, प्राथमिक चिकित्सा, जंगल में जीवित रहना, खुफिया काम
- काम: घायल सैनिकों की सेवा, संदेश पहुँचाना, कई बार फ्रंट लाइन पर भी गईं
- कैप्टन लक्ष्मी सहगल इनकी कमांडर थीं। लक्ष्मी इंदिरा पांडा कैप्टन पद तक पहुंचीं
बर्मा के जंगलों में भूख, बीमारी, बमबारी सब झेला, लेकिन हिम्मत नहीं हारी।
3. आजादी के बाद का दर्द
1945 में INA टूट गई।
लक्ष्मी वापस ओडिशा आईं, लेकिन सरकार ने उनकी कुर्बानी को सालों तक पहचाना नहीं।
पति खगेश्वर पांडा के साथ साधारण जीवन बिताया, आखिर में घरेलू नौकरानी का काम करना पड़ा।
पेंशन के लिए सालों संघर्ष किया।
2007 में जब इतिहासकार अनिल धीर ने उन्हें ढूंढा, तब जाकर देश को पता चला कि नेताजी की फौज की एक जिंदा वीरांगना ओडिशा में भुला दी गई थी।
4. रानी झाँसी रेजिमेंट का महत्व
ये दुनिया की पहली महिला कॉम्बैट रेजिमेंट मानी जाती है।
नेताजी का मानना था: “आजादी तब तक अधूरी है जब तक नारी शक्ति न जागे”।
लक्ष्मी इंदिरा पांडा उसी सोच की जीती-जागती मिसाल थीं।
14 साल की उम्र में जो लड़की बंदूक उठा सकती है, वो डर क्या जाने?
लक्ष्मी इंदिरा पांडा की जिंदगी यही सिखाती है: “इज्जत पद से नहीं, जज्बे से मिलती है”।

नवीन पटनायक की ओडिशा सरकार ने लक्ष्मी इंदिरा पांडा को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा और पेंशन दिलवाई।
क्या हुआ था:
1. संघर्ष
लक्ष्मी इंदिरा पांडा आखिरी दिनों में दिल्ली में रहकर घरों में नौकरानी का काम करती थीं।
वो ओडिशा स्वतंत्रता सेनानी पेंशन के लिए लड़ रही थीं, लेकिन उनकी पहचान ही नहीं थी।
2. मदद कैसे मिली
2007 में इतिहासकार अनिल धीर ने रिसर्च के दौरान उन्हें ढूंढा।

उनके पोते ने अखबारों में खबर फैलाई। खबर छपने के बाद मामला सरकार तक पहुंचा।
3. ओडिशा सरकार का फैसला
नवीन पटनायक सरकार ने:
- उन्हें स्वतंत्रता सेनानी पेंशन दिलवाई
- 25 अक्टूबर 2008 को “राष्ट्रीय स्वतंत्रता सैनिक सम्मान” दिलवाने में मदद की
- जयपुर में उनकी मूर्ति लगाने की घोषणा की
7 अक्टूबर 2008 को उनका निधन हो गया, लेकिन मरने से 2 हफ्ते पहले ही उन्हें ये सम्मान मिला।
सार ये है: लक्ष्मी इंदिरा पांडा को INA में लड़ने का सम्मान तो 1940s में मिल गया था, लेकिन ओडिशा की पहचान और पेंशन नवीन पटनायक सरकार के समय मिली।












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