संसार एक नदी के समान है। सुख और दुख इस संसार रूपी नदी के दो किनारे हैं। “जैसे दो किनारों के बीच में नदी का पानी बहता है, ऐसे ही सुख दुख रूपी दो किनारों के बीच में सबका जीवन चलता रहता है.”

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यह संसार एक नदी के समान है। सुख और दुख इस संसार रूपी नदी के दो किनारे हैं। “जैसे दो किनारों के बीच में नदी का पानी बहता है, ऐसे ही सुख दुख रूपी दो किनारों के बीच में सबका जीवन चलता रहता है.”
“संसार में कुछ लोग उत्साही होते हैं, जो प्रतिकूल परिस्थिति आने पर भी निराश नहीं होते।” “और कुछ लोग निराशावादी होते हैं। वे लोग परिस्थिति अनुकूल न होने पर दुखी उदास एवं निराश हो जाते हैं,” और सोचते हैं, कि “हमारा यह दुख कब हटेगा?”
जब जीवन है ही ऐसा,कि “इसमें सुख और दुख दोनों आते रहते हैं। और दोनों में से सदा कोई भी नहीं टिकता। बारी बारी से दोनों आते हैं, और चले भी जाते हैं।”
तो ऐसी स्थिति में यदि आपके जीवन में भी कभी कोई दुख आ जाए, तो उस समय आप घबराएं नहीं, निराशावादी न हों, बल्कि आशावादी बनें। और ऐसा सोचें कि “आज यह दुख आया है, तो कल यह चला भी जाएगा। फिर सुख भी आएगा।”
*”यदि ऐसा विचार आप अपने मन में बनाए रखें, और दुख के निवारण तथा सुख प्राप्ति के लिए पूर्ण पुरुषार्थ भी करें। तो कुछ ही समय बाद निश्चित रूप से आपका वह दुख भी हट जाएगा, और आपको सुख भी मिलेगा।”