ग्रैंड ट्रंक रोड (Grand Trunk Road – GT Road) एशिया की सबसे पुरानी और लंबी प्रमुख सड़कों में से एक है। कई साम्राज्य से जुड़ा हुआ है
मुख्य ऐतिहासिक चरण:
- प्राचीन काल (मौर्य साम्राज्य / उत्तरापथ):
- इस सड़क की नींव प्राचीन काल में पड़ी थी, जब इसे ‘उत्तरापथ’ के नाम से जाना जाता था।
- महाभारत और मौर्य काल (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) में चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के शासनकाल में इस मार्ग का विस्तार और विकास किया गया। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने भी अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में इस व्यापारिक मार्ग का उल्लेख किया है।
- मध्यकाल (शेरशाह सूरी का योगदान):
- 16वीं शताब्दी (लगभग 1540-1545 ई.) में अफगान शासक शेरशाह सूरी ने इस पुराने रास्ते को नए सिरे से संरेखित और पक्का करवाया।
- उन्होंने इसे ‘सड़क-ए-आजम’ या ‘बादशाही सड़क’ का नाम दिया।
- शेरशाह सूरी ने यात्रियों की सुविधा के लिए इस मार्ग पर करीब 1,700 सरायें, पेड़ और हर दो कोस पर ‘कोस मीनारें’ बनवाईं, जिससे व्यापार और सेना की आवाजाही आसान हुई।
- ब्रिटिश काल (नामकरण और पुनर्निर्माण):
- 1833 से 1860 के बीच ब्रिटिश राज के दौरान अंग्रेजों ने इस सड़क का बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण और आधुनिकीकरण किया।
- भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड ऑकलैंड के समय में इसका नाम बदलकर ‘ग्रैंड ट्रंक रोड’ रखा गया। अंग्रेजों ने इसकी देखरेख के लिए रुड़की में इंजीनियरिंग कॉलेज (जो बाद में IIT रुड़की बना) की स्थापना की।
- विभाजन और वर्तमान स्थिति:
- भारत के विभाजन के समय (1947) इस सड़क का उपयोग शरणार्थियों के आवागमन के लिए बड़े पैमाने पर किया गया।
- वर्तमान में यह मार्ग बांग्लादेश (चटगाँव/सोनारगाँव), भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान (काबुल) तक फैला हुआ है। भारत में इसका अधिकांश हिस्सा वर्तमान राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-19 और NH-44) का हिस्सा है।















