एक बार बैसली में भयंकर अकाल और महामारी फैली गौतम बुद्ध वहां कदम रखते ही मूसलाधार बारिश हुई और उन्होंने संकट दूर करने के लिए ‘रतन सुत्त’ का पाठ किया, जिससे महामारी शांत हो गई।

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गृहत्याग करने के बाद ज्ञान की खोज में राजकुमार सिद्धार्थ सबसे पहले वैशाली ही आए थे। यहाँ उन्होंने आलार कलाम और उद्रक रामपुत्र जैसे गुरुओं से प्रारंभिक आध्यात्मिक प्रशिक्षण और ध्यान की शिक्षा ली थी।

ज्ञान प्राप्ति के बाद एक बार वैशाली में भयंकर अकाल और महामारी (प्लेग/बुरी आत्माओं का प्रकोप) फैल गया था। तब वहां के लिच्छवी राजकुमारों के आमंत्रण पर बुद्ध वैशाली गए। मान्यता है कि उनके वहां कदम रखते ही मूसलाधार बारिश हुई और उन्होंने संकट दूर करने के लिए ‘रतन सुत्त’ (Ratana Sutta) का पाठ किया, जिससे महामारी शांत हो गई।

भिक्षुणी संघ की स्थापना करने: बौद्ध धर्म के इतिहास में वैशाली का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यहीं पर बुद्ध ने महिलाओं को बौद्ध संघ में शामिल होने की अनुमति दी थी। उनकी विमाता महाप्रजापति गौतमी के अनुरोध पर वैशाली में ही भिक्षुणी संघ की शुरुआत हुई।
आम्रपाली (अंबपाली) को दीक्षा देने: वैशाली की प्रसिद्ध नगरवधू (नर्तकी) आम्रपाली बुद्ध के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थी। उसने बुद्ध को अपने घर भोजन पर आमंत्रित किया और बाद में अपनी धन-दौलत और प्रसिद्ध आम्रवाटिका (आम का बगीचा) बौद्ध संघ को दान कर दी और स्वयं भिक्षुणी बन गई।
अंतिम वर्षावास और निर्वाण की घोषणा: बुद्ध ने अपने जीवन का अंतिम वर्षावास (चतुर्मास) वैशाली के समीप बेलुवाग्राम में बिताया था। यहीं पर उन्होंने अपने महापरिनिर्वाण (संसार से प्रस्थान) की तीन महीने पहले ही घोषणा कर दी थी और अपना अंतिम उपदेश दिया था