!!दीपक और आँधी!!
एक छोटे से गाँव में एक बुजुर्ग कुम्हार रहता था। वह हर शाम अपने घर के बाहर एक छोटा सा दीपक जलाता और चुपचाप बैठकर उसे देखता रहता। गाँव के लोग अक्सर उससे पूछते—“बाबा, इस छोटे से दीपक से क्या होता है? इससे तो अँधेरा खत्म नहीं होगा।”
बुजुर्ग मुस्कुराकर कहते—“अँधेरा खत्म करना मेरा काम नहीं, लेकिन रोशनी करना मेरा धर्म है।”
एक दिन अचानक गाँव में तेज आँधी आ गई। पेड़ हिलने लगे, दरवाजे चरमराने लगे और हर घर के दीये बुझने लगे। लोग अपने-अपने घरों में दुबक गए। उस कुम्हार के घर के बाहर भी वही छोटा सा दीपक जल रहा था।
आँधी इतनी तेज थी कि कोई भी दीया टिक नहीं पा रहा था। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि कुम्हार का दीपक अब भी जल रहा था। एक युवक यह देखकर उसके पास पहुँचा और पूछा—“बाबा, इतनी तेज आँधी में भी आपका दीपक कैसे जल रहा है?”
कुम्हार ने शांत स्वर में कहा—“मैंने इसे आँधी से बचाने के लिए अपने हाथों की ढाल बना दी है। जब तक मेरे हाथ मजबूत हैं, यह दीपक नहीं बुझेगा।”
युवक ने कहा—“लेकिन इससे क्या फायदा? एक छोटा सा दीपक पूरी दुनिया को रोशन नहीं कर सकता।”
बाबा ने उत्तर दिया—“बेटा, जब तक यह दीपक जल रहा है, तब तक मेरे आसपास अँधेरा नहीं है। और शायद किसी राह भटके हुए को यह छोटी सी रोशनी रास्ता दिखा दे।”
युवक ने यह बात दिल से लगा ली। अगले दिन उसने भी अपने घर के बाहर एक दीपक जलाया। धीरे-धीरे पूरे गाँव में यह परंपरा बन गई। अब हर घर के बाहर दीपक जलने लगा।
कुछ ही दिनों में वह गाँव, जो पहले अँधेरे में डूबा रहता था, रात में भी जगमगाने लगा।
शिक्षा:
जीवन में हम अक्सर सोचते हैं कि “मैं अकेला क्या बदल सकता हूँ?”
लेकिन सच्चाई यह है कि बदलाव की शुरुआत हमेशा एक छोटे कदम से होती है।
परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर आपके इरादे मजबूत हैं, तो आप अपनी “रोशनी” को बुझने नहीं देंगे।
इसलिए हमेशा याद रखें:
“अँधेरे को कोसने से बेहतर है, एक छोटा सा दीपक जलाना।”















