जब पवनसुत ने सीना चीरकर दिखाया: “मेरे रोम-रोम में बसते हैं राम!”
त्रेतायुग के अंत में जब रावण का वध करके प्रभु श्रीराम माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे, तो पूरी नगरी में दीवाली मन गई। इसके बाद आया वह ऐतिहासिक क्षण जब श्रीराम का भव्य राज्याभिषेक हुआ। सुग्रीव, विभीषण, अंगद—सबको उनकी सेवाओं के लिए बड़े-बड़े उपहार मिले । लेकिन दरबार के एक कोने में हाथ जोड़े खड़े हनुमान जी मौन थे; उन्होंने कुछ नहीं माँगा, क्योंकि उनके लिए उनके राम का दर्शन ही सबसे बड़ा वरदान था।
मोतियों की माला और अज्ञानियों का भ्रम
माता सीता ने प्रसन्न होकर अपनी गले की बेहद मूल्यवान और कीमती मोतियों की माला हनुमान जी को उपहार में दी। पूरा दरबार यह सोचकर उत्सुक था कि हनुमान इसे बड़े चाव से पहनेंगे।
लेकिन हनुमान जी ने उस माला को लिया और एक-एक मोती को अपने दाँतों से तोड़कर फेंकने लगे।
दरबार में मौजूद कुछ ईर्ष्यालु दरबारी हँस पड़े और तंज कसने लगे— “देखो इस वानर को, इसे मोतियों की परख ही नहीं है!”
जब एक दरबारी ने गुस्से में आकर पूछा कि तुमने इतनी कीमती माला क्यों तोड़ी, तो पवनसुत ने जो उत्तर दिया, उसने सबका सिर झुका दिया:
”मैं हर मोती में यह तलाश रहा था कि क्या इसमें मेरे राम या मेरी सीता बसते हैं? जिस वस्तु में मेरे राम न हों, वह मेरे लिए एक साधारण कंकड़ के समान व्यर्थ है।”
जब हनुमान ने चीर दिया अपना सीना
तभी भीड़ से किसी ने कटाक्ष किया— “अगर तुम्हारे हृदय में हर जगह राम हैं, तो क्या तुम्हारे अपने शरीर और दिल में भी राम बसते हैं? साबित करके दिखाओ!”
हनुमान जी मुस्कुराए। उन्होंने प्रभु श्रीराम की ओर देखा और अनुमति पाकर अपने दोनों हाथों से अपना सीना पकड़कर बीच से चीर डाला।
जैसे ही सीना चीरा गया, वहाँ से कोई साधारण रक्त नहीं, बल्कि एक दिव्य और अलौकिक प्रकाश फूट पड़ा, जिसने पूरे अयोध्या दरबार को रोशन कर दिया। सबने देखा कि हनुमान जी के उस खुले हृदय में कोई साधारण मांस-पिंड नहीं, बल्कि साक्षात सिंहासन पर विराजे भगवान राम और माता सीता विराजमान थे, और चरणों में स्वयं हनुमान जी उनकी सेवा में लीन थे!
यह अदृश्य दृश्य देखकर पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। अज्ञानियों की आँखें खुल गईं, माता सीता दौड़कर हनुमान से लिपट गईं, और प्रभु श्रीराम ने अपने प्रिय भक्त को गले से लगाकर अमर होने का वरदान दे दिया।
इस महागाथा से मिलने वाले 4 अनमोल संदेश:
भौतिक वस्तुओं से परे प्रेम: सच्ची भक्ति कीमती मोतियों या दिखावे की मोहताज नहीं होती, यह केवल शुद्ध और निश्छल प्रेम चाहती है।
भक्त और भगवान का एक होना: जब भक्ति पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है, तो भक्त के भीतर स्वयं ईश्वर का वास हो जाता है।
नश्वर शरीर और अमर आत्मा: यह शरीर मिट्टी है, असली अहमियत उस चेतना और आत्मा की है जिसमें प्रभु का नाम बसता है।
राम तक पहुँचने का द्वार: संत तुलसीदास ने भी लिखा है —”राम दुआरे तुम रखवारे”। हनुमान जी की कृपा के बिना राम की प्राप्ति असंभव है।
यह कथा हमें सिखाती है कि यदि हमारा हृदय भी निश्चल प्रेम और राम-नाम की ऊर्जा से भर जाए, तो हमारे भीतर भी उसी दिव्य शक्ति का अहसास होगा जो हनुमान जी की पहचान है।
जय श्री राम
प्रदीप गुप्त एडवोकेट श्री अयोध्या जी 9616153273🌹















