कोणार्क सूर्य मंदिर
निर्माण: 13वीं सदी (1243-1255) में गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम ने बनवाया। 12 साल, 1200 कारीगर।
शैली: कलिंग शैली का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण, यूनेस्को विश्व धरोहर 1984 से।
स्वरूप: यह मंदिर सूर्य देव के विशाल रथ जैसा है
- 7 घोड़े – सप्ताह के 7 दिन
- 12 जोड़ी पहिये (24 पहिये) – साल के 12 महीने, हर पहिया एक सुन्दर धूप-घड़ी है
- 3 मुख्य भाग थे – देउल (गर्भगृह – जहाँ सूर्य देव थे), जगमोहन (मुख्य मंडप), नाटमंदिर
असली रहस्य – दरवाजा बंद क्यों है?

मंदिर 15वीं-18वीं सदी में मुस्लिम आक्रमणकारी कालापहाड़ के हमले, समुद्री तूफान और नमक वाली हवा से बहुत कमजोर हो गया। उसका शिखर (देउल) ढह गया।
अंग्रेजों को लगा कि बचा हुआ हॉल जगमोहन भी गिर जाएगा। तो 1901 में बंगाल के गवर्नर सर जॉन वुडबर्न ने आदेश दिया – इसके चारों दरवाजों पर दीवार उठा कर अंदर पूरी तरह रेत और पत्थर भर दो ताकि अंदर से सहारा मिले और यह ढहे नहीं।
यह काम 1903 में पूरा हुआ और तब से 122 साल तक वह गर्भगृह बंद रहा।
यह कोई श्राप नहीं, अंग्रेजों का अस्थायी उपाय था जो स्थायी बन गया।
अब क्या हो रहा है?
आपके लिए अच्छी खबर है। ASI ने अब इसे खोलना शुरू किया है।
- दिसंबर 2025 में 9 मीटर की नो-वाइब्रेशन कोर ड्रिलिंग करके रास्ता मिला
- अंदर 17 फीट तक घनी रेत भरी है, ऊपर लोहे के बीम लटके हैं
- CBRI रुड़की और IIT मद्रास लेजर स्कैनिंग और रोबोटिक कैमरे से जांच कर रहे हैं
- रेत हटाकर स्टील की छड़ों से मजबूत किया जाएगा। काम 2026 तक चलेगा
- इसके बाद पर्यटक अंदर जा सकेंगे, पर पूजा नहीं होगी, क्योंकि यह अब स्मारक है
3 प्रसिद्ध रहस्य-कथाएं
1. 52 टन का चुम्बक: कहते हैं शिखर पर 52 टन का चुम्बक था, जो सूर्य की मूर्ति को हवा में लटकाए रखता था। और समुद्र से जहाज खिंच कर टकरा जाते थे, इसलिए पुर्तगाली नाविकों ने इसे निकाल दिया। इसी कारण विदेशी इसे Black Pagoda कहते थे। वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला, पर लोहे के बीम आज भी बिना जंग के हैं।
2. धर्मपाद की कथा: 1200 कारीगर 12 साल में मंदिर नहीं बना पाए तो राजा ने सबको मारने का आदेश दिया। तब 12 साल के लड़के धर्मपाद ने, जो मुखिया के बेटे थे, अकेले कलश स्थापित कर दिया और फिर जान बचाने के लिए समुद्र में कूद गए ताकि किसी को सजा न मिले।
3. साम्ब की कथा: भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हुआ था। उन्होंने यहाँ 12 साल सूर्य की तपस्या की और ठीक हो गए, इसलिए उन्होंने पहला सूर्य मंदिर बनवाया।

कोणार्क सिर्फ मंदिर नहीं, एक विज्ञान की किताब है। दीवारों पर जो मैथुन मूर्तियां हैं, वो काम-शास्त्र नहीं, जीवन-चक्र दिखाती हैं – कि जीवन से ही सृष्टि चलती है।
कोणार्क के सूर्य मंदिर का चक्र एक विशाल और सुंदर पत्थर का पहिया है, जो धूप से सटीक समय बताने वाली घड़ी (सनडायल) की तरह काम करता है। इस मंदिर में कुल 24 पहिए हैं, जो साल के 24 पक्षों या महीनों को दर्शाते हैं।
चक्र की बनावट और विशेषताएं
आकार: यह एक सुंदर सजावट और बारीक नक्काशी से सजा हुआ पहिया है।
तीलियां (Spokes): प्रत्येक चक्र में 16 तीलियां हैं, जिनमें से 8 मोटी और 8 पतली तीलियां होती हैं।
समय की गणना: इन पहियों की परछाई को देखकर दिन का सटीक समय जाना जा सकता है। मोटी और पतली तीलियों के बीच का अंतर पहर और घंटों की सही जानकारी देता है।











