जब भक्त की जिद के आगे भगवान भी असहाय हुए
॥ रामायण का अनुपम प्रसंग ॥
— भक्त और भगवान का प्रेमपूर्ण संवाद
“माँगी नाव ना केवट आना।
कहइ तुम्हार मरम मैं जाना।।
चरन-कमल रज कहुँ सबु कहई।
मानुष करनि मुरि कछु अहई।।”
(रामचरितमानस)
इस चौपाई में पहला ही शब्द “माँगी” आया है — अर्थात स्वयं भगवान श्रीराम माँग रहे हैं, किन्तु भक्त केवट लाने को तैयार नहीं। यहाँ एक अद्वितीय प्रेमपूर्ण झगड़ा है — न तो केवट प्रणाम करता है, न स्वागत; क्योंकि वह भलीभाँति जानता है कि यदि पहले ही प्रणाम कर दिया, तो जो आदेश प्रभु देंगे, वही करना पड़ेगा। अतः वह नमस्कार भी नहीं करता।
▪︎ श्रीराम के सम्मुख विकट स्थिति आ खड़ी हुई — उन्हें गंगा पार करनी है। वे दूर बैठे केवट को नाव लाने को कहते हैं, किन्तु केवट उनकी वाणी को अनसुना कर देता है। वह कहता है — “मैं तुम्हारे वचनों में नहीं फँसने वाला। मैं तुम्हें पहचानता हूँ, तुम्हारे मरम और सामर्थ्य से परिचित हूँ। जब तक आपके चरणों को पखारने की अनुमति नहीं मिलती, मैं नाव पर चढ़ने नहीं दूँगा।”
▪︎ केवट के हृदय की छिपी आकांक्षा
आखिर वह इतना उतावला क्यों है प्रभु के चरण धोने को? इसके पीछे उसका गूढ़ रहस्य है — वह जानता है कि यह अवसर जन्म-जन्मान्तर के पुण्यों का फल है। उसके भीतर का पशुत्व अब क्षणभर भी नहीं टिकना चाहता। वह चरणामृत पान कर इस भवसागर से मुक्त होना चाहता है।
“सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन।।”
राम मंद-मंद मुस्कराते हैं, क्योंकि वे उसकी अंतरात्मा को समझ रहे हैं। देवताओं और असुरों के संहार हेतु अवतीर्ण परमेश्वर इस समय केवट के सम्मुख खड़े हैं। वह सोचता है — “वामन रूप में प्रभु ने तीन पग में जगत नापा था, आज एक छोटी नदी नहीं पार कर सकते!”
▪︎ केवट चालाकी से अपनी इच्छा प्रकट करता है — “हे राम! आपके चरणों में मुरि नामक औषधि है, जो जिस वस्तु को छू दे, उसे मानव रूप में बदल देती है। पत्थर भी आपके चरण-स्पर्श से सुंदरी बन गया था। यदि मेरी नाव भी नारी बन गई, तो मेरा जीवन-यापन कैसे होगा?”
“छुअत शिला भई नारी सुहाई।
पाहन तें न काठ कठिनाई।।
एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारु।
नहिं जानउँ कछु और कबारु।।”
इसलिए वह आग्रह करता है — पहले चरण पखारने दें, ताकि वह मुरि औषधि धुल जाए और मेरी जीविका बनी रहे।
▪︎. लीला की अद्भुत विडम्बना — भवसागर पार कराने वाले राम एक छोटी नदी पार करने के लिए याचना कर रहे हैं — “मुझे पार लगाओ।”
यह भक्त-भगवान का अप्रमेय खेल है। जिसने भगवान को पहचान लिया, वह केवट की भाँति अपने जीवन को सार्थक बना लेता है।
▪︎ केवट ने ठान लिया है — या तो प्रभु के समक्ष अपने जीवन का त्याग करेगा, या उनके चरणामृत का पान कर पूर्ण मानव बनेगा। वह कहता है — “हे नाथ! मैं दशरथ जी की शपथ खाकर कहता हूँ, पार कराने के बाद आपसे उतराई भी नहीं लूँगा। चाहे लक्ष्मण के बाण से प्राण भी गँवाने पड़ें, किन्तु चरण पखारे बिना पार नहीं कराऊँगा।”
सत्य ही है — पारस के सम्मुख होकर भी जो लोहा स्वर्ण न बने, वह लोहे की बदकिस्मती है।
▪︎ भगवान उसकी भक्ति की गहराई समझते हैं, किन्तु लीला के नियम निभाने को वे केवल मुस्कराकर कहते हैं —
“सोइ करु जेहि तव नाव न जाई।”
— जो करना हो, शीघ्र करो और हमें पार उतारो।












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